मिर्जापुर बाण सागर विभाग के निर्माण कार्यों में कथित अनियमितताओं को लेकर सवाल उठ रहे हैं। नहर के किनारे बनाई जा रही सुरक्षा दीवार के निर्माण में खुदाई से निकले पत्थरों के इस्तेमाल और खनन विभाग के MM-11 परमिट से जुड़े आरोपों ने पूरे मामले को जांच के दायरे में लाने की जरूरत बढ़ा दी है। आरोप है कि नहर की खुदाई के दौरान निकले पत्थरों को उठाने के लिए जारी परमिट का इस्तेमाल निर्धारित तरीके से नहीं किया गया और अब उन्हीं पत्थरों से दांती क्षेत्र में सुरक्षा दीवार का काम कराया जा रहा है।दाढ़ी राम क्षेत्र के दांती में चल रहे निर्माण कार्य को लेकर उठे इन सवालों के बीच अब यह जानना जरूरी हो गया है कि पत्थरों का वास्तविक स्रोत क्या है, उनके परिवहन और इस्तेमाल के लिए कौन-से दस्तावेज जारी किए गए और निर्माण कार्य में विभागीय नियमों का पालन किया जा रहा है या नहीं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित विभाग का आधिकारिक पक्ष सामने आना बाकी है।

नहर की सुरक्षा दीवार के निर्माण पर उठे सवाल
बाण सागर नहर परियोजना सिंचाई व्यवस्था के लिहाज से महत्वपूर्ण है। नहरों और उनसे जुड़ी संरचनाओं की मजबूती सीधे तौर पर सिंचाई व्यवस्था, किसानों की जरूरतों और सरकारी धन के सही इस्तेमाल से जुड़ी होती है। ऐसे में नहर के किनारे बनने वाली सुरक्षा दीवार के निर्माण में किसी भी तरह की अनियमितता का आरोप गंभीरता से जांचा जाना चाहिए।स्थानीय स्तर पर लगाए जा रहे आरोपों के मुताबिक, दांती क्षेत्र में सुरक्षा दीवार का निर्माण कराया जा रहा है। इस काम में इस्तेमाल हो रहे पत्थरों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि निर्माण के लिए बाहर से निर्धारित प्रक्रिया के तहत सामग्री मंगाने के बजाय नहर की खुदाई के दौरान निकले पत्थरों का इस्तेमाल किया जा रहा है।केवल खुदाई से निकले पत्थरों का इस्तेमाल होना अपने आप में भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं है। इसकी वैधता इस बात पर निर्भर करेगी कि पत्थरों के निस्तारण, स्वामित्व, परिवहन और निर्माण में इस्तेमाल को लेकर क्या सरकारी आदेश और अनुमति लागू हैं तथा संबंधित दस्तावेज क्या बताते हैं।
MM-11 परमिट को लेकर क्या है आरोप?
इस मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू खनन विभाग की ओर से जारी MM-11 परमिट बताया जा रहा है। खनिजों के परिवहन से संबंधित दस्तावेजों की भूमिका यह सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण होती है कि सामग्री कहां से आई, कितनी मात्रा में ले जाई गई और उसका इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया गया।आरोप है कि ठेकेदारों को पत्थरों के परिवहन के लिए MM-11 परमिट जारी किए गए थे, लेकिन पत्थरों को उठाने के बजाय परमिट बेच दिए गए। इसके बाद अब उसी सामग्री को कथित तौर पर निर्माण कार्य में इस्तेमाल किए जाने की बात कही जा रही है।यदि ऐसा हुआ है, तो संबंधित परमिट, जारी की गई मात्रा, परिवहन रिकॉर्ड और निर्माण स्थल पर मौजूद पत्थरों का मिलान कराना जरूरी होगा। जांच में यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि परमिट किन व्यक्तियों या फर्मों के नाम जारी हुए थे, क्या उनका हस्तांतरण नियमों के अनुरूप था और वास्तव में कितनी सामग्री का परिवहन हुआ।इन बिंदुओं की पुष्टि बिना दस्तावेजों और संबंधित पक्षों के बयान के नहीं की जा सकती। इसलिए फिलहाल इसे आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
क्या सरकारी राजस्व को नुकसान हुआ?
यदि खनिजों के परिवहन या इस्तेमाल में नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो इससे सरकारी राजस्व और निर्माण कार्यों की जवाबदेही से जुड़े सवाल उठ सकते हैं। लेकिन इस मामले में राजस्व के नुकसान की कोई प्रमाणित राशि उपलब्ध नहीं है।खनन विभाग और बाण सागर विभाग के अधिकारियों को कथित अनियमितताओं की जांच के लिए परमिट रजिस्टर, स्टॉक रिकॉर्ड, माप पुस्तिका, निर्माण सामग्री के बिल और कार्यस्थल के निरीक्षण रिकॉर्ड का मिलान करना चाहिए। इससे पता चल सकेगा कि सामग्री की मात्रा और इस्तेमाल का विवरण सरकारी रिकॉर्ड से मेल खाता है या नहीं।यदि जांच में गड़बड़ी प्रमाणित होती है, तो जिम्मेदार पक्षों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है। दूसरी ओर, यदि दस्तावेजों से पता चलता है कि सामग्री का इस्तेमाल वैध अनुमति के तहत हुआ है, तो विभाग को यह तथ्य भी सार्वजनिक करना चाहिए।
दांती में चल रहे काम का तकनीकी परीक्षण जरूरी
दाढ़ी राम क्षेत्र के दांती में चल रहे निर्माण कार्य की गुणवत्ता और सामग्री के स्रोत की जांच इस मामले का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सुरक्षा दीवार का उद्देश्य नहर के किनारे की मिट्टी और संरचना को सुरक्षित रखना होता है। इसलिए निर्माण में इस्तेमाल की गई सामग्री की गुणवत्ता, दीवार की मजबूती और स्वीकृत तकनीकी मानकों का पालन सुनिश्चित करना जरूरी है।जांच के दौरान अधिकारियों को यह देखना चाहिए कि निर्माण कार्य स्वीकृत नक्शे और तकनीकी अनुमान के मुताबिक हो रहा है या नहीं। साथ ही, निर्माण स्थल पर उपलब्ध पत्थरों की मात्रा का आकलन कर उसे विभागीय रिकॉर्ड और खरीद या निस्तारण से जुड़े दस्तावेजों से मिलाया जाना चाहिए।यदि निर्माण में निर्धारित मानकों की अनदेखी पाई जाती है, तो उससे दीवार की टिकाऊ क्षमता प्रभावित होने की आशंका का तकनीकी मूल्यांकन किया जाना चाहिए। मौजूदा जानकारी के आधार पर दीवार की गुणवत्ता खराब होने या भविष्य में उसके क्षतिग्रस्त होने का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
विभागीय जांच से ही सामने आएगी सच्चाई
बाण सागर विभाग और खनन विभाग के सामने अब इन आरोपों पर स्थिति स्पष्ट करने की जिम्मेदारी है। संबंधित अधिकारियों को यह बताना चाहिए कि दांती में चल रहे निर्माण कार्य के लिए पत्थर कहां से लाए गए, MM-11 परमिट किस उद्देश्य से जारी हुए और उनके इस्तेमाल की निगरानी किस स्तर पर की गई।स्थानीय स्तर पर उठाए गए सवालों की निष्पक्ष जांच होने से न केवल वास्तविक स्थिति सामने आएगी, बल्कि सरकारी निर्माण कार्यों में पारदर्शिता भी सुनिश्चित हो सकेगी। जांच में दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कार्रवाई और आरोप प्रमाणित न होने पर स्थिति स्पष्ट करना—दोनों ही जरूरी हैं।
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