लखनऊ उत्तर प्रदेश की राजनीति और नौकरशाही में जितनी चर्चा फैसलों की होती है, उतनी ही सुर्खियां उन किस्सों की भी बटोरती हैं जो आधिकारिक फाइलों में दर्ज नहीं होते, लेकिन सत्ता के गलियारों में फुसफुसाहट बनकर तेजी से फैल जाते हैं। इन्हीं चर्चित अंदरूनी चर्चाओं को लेकर एक बार फिर राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में तीन किस्से चर्चा का विषय बने हुए हैं। इनमें एक ऐसे नेता की कहानी है जो सत्ता में होने के बावजूद खुद को हाशिये पर महसूस कर रहे हैं, दूसरी एक ऐसी वरिष्ठ अधिकारी की, जिन्हें मोबाइल फोन से ही भय लगने लगा है और तीसरी एक ऐसे पुलिस कप्तान की, जिन्होंने प्रोटोकॉल को लेकर नई बहस छेड़ दी।इन तीनों घटनाओं ने राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में खूब हलचल मचा रखी है। हालांकि इन किस्सों की आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन सत्ता के गलियारों में इन्हें लेकर खूब कानाफूसी हो रही है।
‘आसमान से गिरे, खजूर पर अटके’ वाले माननीय
राजधानी के राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा एक ऐसे वरिष्ठ नेता की है, जिनकी पहचान कभी अपने भाषणों और तुकबंदी से बनी थी। चुनावी राजनीति में बड़ी सफलता भले ही उनके खाते में न हो, लेकिन पार्टी नेतृत्व का भरोसा उन्हें पहली सरकार में मंत्री पद तक ले गया था।बताया जाता है कि दूसरी सरकार बनने के बाद उनकी राजनीतिक गाड़ी पटरी से उतर गई। हाल ही में हुए मंत्रिमंडल विस्तार से उन्हें काफी उम्मीदें थीं कि दोबारा सरकार में जगह मिलेगी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। अब उनकी नजरें दिल्ली की राजनीति पर टिकी हैं और उम्मीद है कि केंद्रीय संगठन में कोई अहम जिम्मेदारी मिल सकती है।हालांकि राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि वहां भी फिलहाल उनके लिए रास्ते आसान नजर नहीं आ रहे। इसी वजह से माननीय लगातार तनाव में बताए जा रहे हैं। सत्ता में रहते हुए भी खुद को किनारे महसूस करना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। यही कारण है कि राजनीतिक गलियारों में लोग उनकी स्थिति की तुलना कहावत “आसमान से गिरे, खजूर पर अटके” से कर रहे हैं।

मोबाइल से डरती हैं मैडम!
दूसरा किस्सा स्वास्थ्य विभाग की एक वरिष्ठ महिला अधिकारी से जुड़ा बताया जा रहा है। विभागीय चर्चाओं के मुताबिक मैडम को मोबाइल फोन से कुछ ज्यादा ही एहतियात है। चाहे कोई मुलाकात हो या विभागीय समीक्षा बैठक, उनकी पहली नजर इस बात पर रहती है कि कहीं कोई मोबाइल फोन तो साथ नहीं लाया गया।बताया जाता है कि कुछ दिन पहले एक अधिकारी बैठक में मोबाइल लेकर पहुंच गया। इसके बाद मैडम का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। मामला इतना बढ़ गया कि अब बैठक कक्ष के बाहर विशेष कर्मचारी की ड्यूटी लगा दी गई है।बताया जाता है कि इस कर्मचारी का काम सिर्फ इतना है कि बैठक में प्रवेश करने वाले हर अधिकारी और कर्मचारी के पास मोबाइल है या नहीं, इसकी जांच करे। बिना उसकी अनुमति के किसी को बैठक में प्रवेश नहीं मिलता।यानी बैठक में शामिल होने से पहले अधिकारियों को मानो “मोबाइल एनओसी” लेनी पड़ती है। विभाग के अंदर यह व्यवस्था चर्चा का विषय बनी हुई है।दिलचस्प बात यह है कि एक ओर सरकार डिजिटल प्रशासन और ई-गवर्नेंस को बढ़ावा देने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, वहीं दूसरी ओर विभाग में मोबाइल पर इस तरह की सख्ती कई सवाल भी खड़े कर रही है।
प्रोटोकॉल भूल गए कप्तान साहब?
तीसरा किस्सा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक जिले का है, जिसने प्रशासनिक हलकों में खूब चर्चा बटोरी है।बताया जाता है कि जिले में आयोजित होने वाले एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम की तैयारियों का निरीक्षण करने के लिए डीआईजी स्तर के अधिकारी पहुंचे थे। प्रोटोकॉल के अनुसार जिले के पुलिस कप्तान की भी मौके पर मौजूदगी जरूरी थी।कप्तान साहब पहुंचे भी, लेकिन उनका अंदाज सबके लिए हैरानी का विषय बन गया। चर्चा है कि वे बिना वर्दी, बिना पुलिस जूते और सामान्य स्लीपर पहनकर निरीक्षण करते नजर आए, जबकि डीआईजी पूरी वर्दी और औपचारिक प्रोटोकॉल के साथ कार्यक्रम स्थल का निरीक्षण कर रहे थे।मौके पर मौजूद अधिकारियों के बीच यह दृश्य चर्चा का विषय बन गया। कई लोगों ने इसे प्रोटोकॉल की अनदेखी माना, जबकि कुछ लोगों का कहना था कि यह केवल कार्यशैली का हिस्सा था।
ऊपर तक मजबूत पकड़ की भी चर्चा
प्रशासनिक हलकों में यह भी चर्चा है कि संबंधित पुलिस कप्तान की शीर्ष स्तर तक मजबूत पहुंच मानी जाती है। अवैध निर्माणों के खिलाफ लगातार कार्रवाई कर उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई है। शायद यही कारण है कि स्थानीय स्तर पर उन्हें लेकर अलग तरह की धारणा बनी हुई है।हालांकि प्रोटोकॉल को लेकर उठे सवालों ने प्रशासनिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है कि वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में निर्धारित मर्यादाओं और औपचारिकताओं का पालन कितना जरूरी है।
सत्ता और सिस्टम के गलियारों में क्यों गूंजते हैं ऐसे किस्से?
राजनीति और प्रशासन में अक्सर ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं जो आधिकारिक रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं बनतीं, लेकिन कर्मचारियों, नेताओं और अधिकारियों के बीच चर्चा का बड़ा विषय बन जाती हैं। इन्हें कोई आधिकारिक बयान नहीं मिलता, फिर भी ये सत्ता के गलियारों में तेजी से फैलती हैं और लोगों की जिज्ञासा का कारण बनती हैं।कभी मंत्री पद की उम्मीदें, कभी अधिकारियों की कार्यशैली और कभी प्रोटोकॉल से जुड़े विवाद—ये सभी घटनाएं यह बताती हैं कि सत्ता के भीतर सिर्फ फैसले ही नहीं, बल्कि व्यक्तित्व, व्यवहार और कार्यशैली भी चर्चा का विषय बन जाती है।फिलहाल यूपी के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में यही तीन किस्से सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोर रहे हैं। हालांकि इन चर्चाओं की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन सत्ता के गलियारों में इन्हें लेकर चल रही कानाफूसी ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि राजनीति और प्रशासन में हर छोटी-बड़ी घटना अपने पीछे कई सवाल और कई कहानियां छोड़ जाती है।
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