शी जिनपिंग का भारत दौरा: आखिरी वक्त तक क्यों रहा सस्पेंस? मोदी से मुलाकात पर नजर

Editorial
10 Min Read

नई दिल्ली भारत की मेजबानी में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को लेकर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भारत दौरे पर आखिरी समय तक बना सस्पेंस अब खत्म हो गया है। चीन ने गुरुवार को आधिकारिक तौर पर पुष्टि की कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स लीडर्स समिट में शामिल होंगे। खास बात यह रही कि उनकी यात्रा की पुष्टि सम्मेलन के मुख्य कार्यक्रम से करीब 48 घंटे पहले हुई।शी जिनपिंग का भारत दौरा इसलिए भी बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि यह करीब सात साल बाद उनकी भारत यात्रा होगी। इससे पहले वर्ष 2019 में उन्होंने तमिलनाडु के महाबलीपुरम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अनौपचारिक शिखर वार्ता की थी। ऐसे में इस बार दोनों नेताओं की संभावित मुलाकात पर भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की नजर है।लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब शी जिनपिंग के ब्रिक्स सम्मेलन में शामिल होने की संभावना पहले से जताई जा रही थी, तो चीन ने इसकी आधिकारिक पुष्टि आखिरी वक्त तक क्यों रोके रखी? क्या इसके पीछे कोई कूटनीतिक रणनीति थी या फिर भारत के साथ होने वाली बातचीत से जुड़ी कुछ अहम शर्तों पर सहमति बनाने की कोशिश चल रही थी?

आखिरी वक्त तक जानकारी रोकना चीन की रणनीति का हिस्सा?

विशेषज्ञों के मुताबिक, चीन की ओर से किसी बड़े नेता की विदेश यात्रा को लेकर अंतिम समय तक आधिकारिक जानकारी नहीं देना कोई नई बात नहीं है। बीजिंग अक्सर राष्ट्रपति की विदेश यात्राओं और महत्वपूर्ण कूटनीतिक कार्यक्रमों की जानकारी सीमित समय पहले सार्वजनिक करता है।डिफेंस एनालिस्ट लेफ्टिनेंट कर्नल (रिटायर्ड) जेएस सोढ़ी के मुताबिक, चीन की कूटनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि वह अपने सभी पत्ते पहले से नहीं खोलता। इससे बातचीत के दौरान उसके पास रणनीतिक विकल्प खुले रहते हैं और वह परिस्थितियों के हिसाब से अपना रुख तय कर सकता है।भारत और चीन के रिश्ते पिछले कुछ वर्षों से बेहद संवेदनशील रहे हैं। सीमा विवाद, वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC पर तनाव और व्यापार से जुड़े मुद्दों के बीच दोनों देश कई स्तरों पर बातचीत करते रहे हैं। ऐसे में शी जिनपिंग की भारत यात्रा को बीजिंग ने भी काफी सावधानी से आगे बढ़ाया है।

शी जिनपिंग का भारत दौरा
शी जिनपिंग का भारत दौरा

मोदी-शी मुलाकात पर सबसे ज्यादा नजर

ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय बातचीत की संभावना सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक मानी जा रही है। अगर दोनों नेताओं के बीच मुलाकात होती है तो सीमा विवाद, व्यापार, आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दे बातचीत के केंद्र में रह सकते हैं।जानकारों का मानना है कि चीन ने यात्रा की घोषणा में देरी करके संभावित द्विपक्षीय बातचीत के एजेंडे को अंतिम समय तक लचीला बनाए रखा होगा। हालांकि, भारत की ओर से किसी भी ऐसी शर्त को स्वीकार किए जाने की संभावना कम मानी जाती है, जो देश के रणनीतिक हितों के खिलाफ हो। किसी बहुपक्षीय सम्मेलन से पहले नेताओं की द्विपक्षीय बैठक को लेकर एजेंडा और प्रोटोकॉल तय करने में काफी कूटनीतिक तैयारी होती है। चीन की ओर से शी की यात्रा को अंतिम समय तक सार्वजनिक नहीं करने से उसे बातचीत के अलग-अलग विकल्पों पर विचार करने का अतिरिक्त समय मिल सकता था।

शी जिनपिंग का भारत दौरा
शी जिनपिंग का भारत दौरा

नई दिल्ली घोषणा पर भी नजर

ब्रिक्स सम्मेलन में होने वाली चर्चाओं का केंद्र केवल भारत-चीन संबंध नहीं होंगे। वैश्विक अर्थव्यवस्था, विकासशील देशों की भूमिका, व्यापार, बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार और ग्लोबल साउथ से जुड़े मुद्दे भी अहम रहेंगे।ऐसे में चीन की कोशिश हो सकती है कि सम्मेलन की बातचीत मुख्य रूप से आर्थिक और वैश्विक शासन से जुड़े मुद्दों तक सीमित रहे। इससे ऐसे मुद्दों पर सार्वजनिक टकराव की संभावना कम हो सकती है, जिन पर भारत और चीन के बीच मतभेद मौजूद हैं।नई दिल्ली घोषणा को लेकर होने वाली बातचीत भी महत्वपूर्ण होगी। किसी भी बहुपक्षीय मंच पर अंतिम घोषणा से पहले सदस्य देशों के बीच शब्दों और मुद्दों को लेकर लंबी चर्चा होती है। ऐसे में चीन का आखिरी समय तक अपना रुख सार्वजनिक नहीं करना उसकी कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है।

चीन में आंतरिक राजनीति भी एक वजह

विशेषज्ञ चीन की इस गोपनीयता को वहां की आंतरिक राजनीतिक व्यवस्था से भी जोड़कर देखते हैं। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी में शीर्ष नेतृत्व से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले बेहद नियंत्रित तरीके से सामने आते हैं।राष्ट्रपति की विदेश यात्रा के दौरान सुरक्षा, कार्यक्रम, बैठकें और बातचीत का पूरा एजेंडा पहले से बेहद सीमित लोगों तक रखा जाता है। किसी भी अंतरराष्ट्रीय यात्रा की घोषणा तभी की जाती है, जब सभी प्रमुख प्रशासनिक और सुरक्षा पहलुओं को अंतिम रूप दे दिया जाए।यही कारण है कि पश्चिमी देशों की तुलना में चीन के राष्ट्रपति की विदेश यात्राओं को लेकर सार्वजनिक जानकारी कई बार काफी देर से सामने आती है।

सुरक्षा और प्रोटोकॉल भी अहम कारण

शी जिनपिंग जैसे शीर्ष नेता की विदेश यात्रा में सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में शामिल होती है। एयरस्पेस, रूट, होटल, कार्यक्रम स्थल, सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय और स्थानीय प्रशासन से जुड़ी तैयारियां पूरी होने के बाद ही आधिकारिक घोषणा की जाती है।ब्रिक्स जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष और सरकारों के प्रमुख शामिल होते हैं। ऐसे में सुरक्षा व्यवस्था और प्रोटोकॉल पहले से तय करना बेहद जरूरी होता है।विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सुरक्षा कारणों से ही यात्रा की घोषणा में देरी हुई, ऐसा मानना पूरी तस्वीर नहीं होगी। इसके पीछे कूटनीतिक गणना भी महत्वपूर्ण हो सकती है।

सात साल बाद भारत लौटेंगे शी जिनपिंग

शी जिनपिंग का भारत दौरा दोनों देशों के संबंधों के लिहाज से खास है। वर्ष 2019 में महाबलीपुरम में मोदी और शी के बीच हुई अनौपचारिक मुलाकात के बाद भारत-चीन संबंधों में कई उतार-चढ़ाव आए।सीमा पर तनाव ने दोनों देशों के रिश्तों को प्रभावित किया। इसके बावजूद आर्थिक और व्यापारिक संबंध पूरी तरह खत्म नहीं हुए। दोनों पक्षों ने कई स्तरों पर संवाद जारी रखा।अब ब्रिक्स सम्मेलन के मंच पर दोनों नेताओं की संभावित बातचीत को इसी व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है। दुनिया के सामने यह संदेश भी महत्वपूर्ण होगा कि भारत और चीन मतभेदों के बावजूद बहुपक्षीय मंच पर संवाद का रास्ता बनाए रखना चाहते हैं।

ग्लोबल साउथ के लिए भी अहम है ब्रिक्स

ब्रिक्स के विस्तार के बाद संगठन का महत्व और बढ़ गया है। इसमें अलग-अलग क्षेत्रों की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं और विकासशील देशों की भागीदारी बढ़ी है। ऐसे में भारत में होने वाला सम्मेलन केवल सदस्य देशों की बैठक नहीं, बल्कि ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने के एक बड़े मंच के रूप में भी देखा जा रहा है।चीन की भागीदारी इस लिहाज से महत्वपूर्ण है। बीजिंग ब्रिक्स को पश्चिमी देशों के प्रभाव से अलग एक महत्वपूर्ण बहुपक्षीय मंच के तौर पर देखता रहा है। भारत में शी जिनपिंग की मौजूदगी चीन को इस समूह के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाने का अवसर भी देगी।

क्या कोई बड़ी घोषणा होगी?

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग की संभावित बातचीत में क्या कोई बड़ा संदेश या फैसला सामने आएगा। हालांकि, किसी ठोस समझौते या घोषणा को लेकर अभी निश्चित तौर पर कुछ कहना जल्दबाजी होगी।फिर भी सीमा, व्यापार, निवेश और द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य बनाने की कोशिश जैसे मुद्दे बातचीत का हिस्सा बन सकते हैं। दोनों देशों के रिश्तों में मौजूद जटिलताओं को देखते हुए हर छोटी कूटनीतिक प्रगति भी महत्वपूर्ण मानी जाएगी।शी जिनपिंग के भारत दौरे की आखिरी समय तक पुष्टि ने इस यात्रा को लेकर उत्सुकता और बढ़ा दी है। चीन की रणनीति को केवल गोपनीयता नहीं, बल्कि कूटनीतिक लचीलापन बनाए रखने के प्रयास के रूप में भी देखा जा रहा है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि नई दिल्ली में प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग के बीच बातचीत किस दिशा में आगे बढ़ती है और ब्रिक्स सम्मेलन भारत-चीन संबंधों के लिए क्या नया संदेश लेकर आता है।

Read on:http://मायावती का सपा-कांग्रेस पर हमला, बोलीं- नीला रंग पहनने से नहीं बदलेगी सोच

Advertisement visit our office:http://3RD FLOOR, lekhraj market, bansal Complex, Lucknow, Uttar Pradesh 226016

TAGGED:
Share This Article
Leave a Comment