ब्रिक्स से भारत को कितना फायदा? चीन के प्रभाव के बीच बड़ी चुनौती

Editorial
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नई दिल्ली भारत चौथी बार ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है। नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इस तेजी से बदलते समूह से भारत को कितना फायदा हो रहा है? एक तरफ ब्रिक्स का विस्तार हुआ है और इसमें कई नए देश शामिल हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ सदस्य देशों के बीच राजनीतिक और रणनीतिक मतभेद भी लगातार सामने आ रहे हैं।भारत के लिए इस बार ब्रिक्स की अध्यक्षता इसलिए भी चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि समूह में ऐसे देश शामिल हैं जिनके बीच गंभीर तनाव है। ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब जैसे देशों के हित कई मुद्दों पर अलग-अलग हैं। वहीं रूस-यूक्रेन युद्ध, मध्य पूर्व का संकट, अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता और वैश्विक व्यापार की बदलती तस्वीर ने ब्रिक्स के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।

ब्रिक्स में बढ़ी चुनौतियां, भारत के सामने कूटनीतिक परीक्षा

ब्रिक्स की शुरुआत 2006 में ब्राजील, रूस, भारत और चीन के साथ हुई थी। बाद में दक्षिण अफ्रीका भी इसका हिस्सा बना। उस समय यह पांच देशों का समूह था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसका विस्तार हुआ है। अब मिस्र, इथियोपिया, ईरान, इंडोनेशिया और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश भी इसके सदस्य हैं। सऊदी अरब की सदस्यता की स्थिति को लेकर अलग-अलग आकलन सामने आते रहे हैं।समूह का विस्तार होने के साथ उसकी आर्थिक ताकत और वैश्विक महत्व बढ़ा है, लेकिन इसके साथ ही सदस्य देशों के बीच मतभेद भी बढ़े हैं। यही वजह है कि भारत के लिए इस बार ब्रिक्स की अध्यक्षता आसान नहीं मानी जा रही है।मई में भारत की मेजबानी में हुई ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक संयुक्त बयान के बिना समाप्त हुई थी। मध्य पूर्व के संकट को लेकर सदस्य देशों के बीच सहमति नहीं बन सकी। अब शिखर सम्मेलन में भी यह चुनौती बनी हुई है कि सभी देशों को एक साझा मंच पर कैसे लाया जाए।

क्या चीन ब्रिक्स का इस्तेमाल अपने हित में कर सकता है?

ब्रिक्स को लेकर विशेषज्ञों की राय एक जैसी नहीं है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफेसर राजेश राजगोपाल का मानना है कि चीन ब्रिक्स के बढ़ते प्रभाव का इस्तेमाल अपने रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए कर सकता है।उनके अनुसार, अगर ब्रिक्स भविष्य में एक प्रभावी और शक्तिशाली समूह बनता है तो चीन उसके भीतर अपने प्रभाव का विस्तार कर सकता है। इससे भारत के लिए चुनौती बढ़ सकती है, क्योंकि चीन के मुकाबले भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपने अन्य रणनीतिक साझेदारों की भी जरूरत है।इस नजरिए से देखा जाए तो भारत के सामने एक बड़ा सवाल यह है कि वह ब्रिक्स को मजबूत करते हुए चीन के बढ़ते प्रभाव को किस तरह संतुलित करे।

विशेषज्ञों का दूसरा पक्ष भी महत्वपूर्ण

सभी विशेषज्ञ ब्रिक्स को भारत के लिए खतरा नहीं मानते। फ्रांस में भारत के पूर्व राजदूत मोहन कुमार का मानना है कि ब्रिक्स आने वाले समय में भारत के लिए रणनीतिक विकल्प बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण मंच साबित हो सकता है।उनके मुताबिक दुनिया तेजी से बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। ऐसे में भारत को केवल किसी एक शक्ति या गुट पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग देशों के साथ अपने संबंध मजबूत करने की जरूरत है।ब्रिक्स भारत को रूस, चीन, पश्चिम एशिया, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों के साथ एक ही मंच पर संवाद करने का अवसर देता है। यही इसकी सबसे बड़ी रणनीतिक उपयोगिता मानी जा सकती है।मोहन कुमार के अनुसार ब्रिक्स अब इतना बड़ा समूह बन चुका है कि इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि संगठन को ऐसे भू-राजनीतिक विवादों में उलझने से बचना होगा, जिन पर सदस्य देशों के बीच सहमति बनाना बेहद मुश्किल है।

भारत बनना चाहता है ‘ब्रिज बिल्डर’

कजाखस्तान की सुलेमान डेमिरेल यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर राज कुमार शर्मा के अनुसार भारत एक मजबूत ब्रिक्स चाहता है, लेकिन वह नहीं चाहता कि यह समूह चीन के रणनीतिक प्रभाव का साधन बन जाए।ऐसे में भारत के सामने संतुलन बनाने की चुनौती है। भारत को ब्रिक्स के भीतर अपनी भूमिका एक ‘ब्रिज बिल्डर’ यानी अलग-अलग हितों वाले देशों के बीच संवाद कराने वाले देश के रूप में मजबूत करनी होगी।भारत की विदेश नीति लंबे समय से रणनीतिक स्वायत्तता पर जोर देती रही है। यही वजह है कि नई दिल्ली एक तरफ रूस के साथ अपने पारंपरिक संबंधों को बनाए रखना चाहती है तो दूसरी तरफ अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ भी रणनीतिक साझेदारी मजबूत कर रही है।विदेश मंत्री एस जयशंकर भी कह चुके हैं कि ब्रिक्स का सदस्य होना भारत को पश्चिम-विरोधी नहीं बनाता। भारत अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर अमेरिका और रूस दोनों के साथ मजबूत संबंध रख सकता है।

ब्रिक्स से भारत को क्या फायदे हो सकते हैं?

ब्रिक्स का सबसे बड़ा फायदा भारत को वैश्विक मंच पर अपनी आवाज मजबूत करने के रूप में मिल सकता है। विकासशील देशों की भूमिका बढ़ाने, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व और वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में सुधार जैसे मुद्दों पर भारत ब्रिक्स के माध्यम से अपनी स्थिति रख सकता है।ब्रिक्स अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने और स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की दिशा में भी चर्चा करता रहा है। इसके अलावा ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, सप्लाई चेन, जलवायु परिवर्तन, तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे मुद्दे भी भारत के लिए महत्वपूर्ण हैं।भारत तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है और उसे ऊर्जा, तकनीक, निवेश तथा नए बाजारों की जरूरत है। ब्रिक्स के जरिए भारत को एशिया, अफ्रीका, पश्चिम एशिया और लैटिन अमेरिका के देशों के साथ आर्थिक सहयोग बढ़ाने का अवसर मिल सकता है।

अमेरिका के साथ संबंधों पर भी नजर

ब्रिक्स को अक्सर पश्चिमी नेतृत्व वाले वैश्विक संस्थानों के विकल्प या संतुलनकारी मंच के रूप में देखा जाता है। अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच ब्रिक्स की भूमिका और महत्वपूर्ण हो गई है।अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ब्रिक्स की कुछ पहलों को लेकर पहले भी नाराजगी जाहिर कर चुके हैं और सदस्य देशों पर टैरिफ बढ़ाने की धमकी दे चुके हैं।हालांकि भारत के लिए चुनौती यह है कि वह ब्रिक्स में सक्रिय भूमिका निभाते हुए अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंधों को भी संतुलित रखे। यही भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी परीक्षा है।

युद्ध, एआई और जलवायु संकट बने बड़ी चुनौती

ब्रिक्स के सामने केवल भू-राजनीतिक विवाद ही चुनौती नहीं हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य पूर्व के संघर्ष का असर वैश्विक व्यापार, ऊर्जा और खाद्य कीमतों पर पड़ रहा है।इसके अलावा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तेजी से दुनिया की अर्थव्यवस्था को बदल रहा है। एआई के कारण रोजगार और तकनीकी असमानता को लेकर भी चिंताएं बढ़ रही हैं। विकासशील देशों के लिए यह जरूरी है कि वे नई तकनीकों और डिजिटल बुनियादी ढांचे में पीछे न छूटें।जलवायु परिवर्तन भी ब्रिक्स देशों के लिए साझा चुनौती है। ऊर्जा सुरक्षा और स्वच्छ ऊर्जा के बीच संतुलन बनाना आने वाले वर्षों में भारत समेत सभी सदस्य देशों के लिए महत्वपूर्ण होगा। ब्रिक्स भारत के लिए अवसर और चुनौती दोनों है। समूह के बढ़ते आकार से भारत को नए बाजारों, निवेश, ऊर्जा सहयोग और वैश्विक कूटनीति में अपनी भूमिका मजबूत करने का मौका मिलता है। लेकिन चीन के बढ़ते प्रभाव और सदस्य देशों के बीच गहरे राजनीतिक मतभेद भारत के लिए बड़ी चुनौती भी हैं।भारत की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह ब्रिक्स को किसी एक देश के प्रभाव का मंच बनने से रोकते हुए इसे बहुध्रुवीय और अधिक प्रतिनिधित्व वाली वैश्विक व्यवस्था के लिए प्रभावी मंच बना पाता है या नहीं। नई दिल्ली शिखर सम्मेलन इसी रणनीतिक संतुलन की बड़ी परीक्षा माना जा रहा है।

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