Uttarakhand Power Project: अडानी PPA पर घिरी धामी सरकार, कांग्रेस ने पूछे 6 बड़े सवाल

Editorial
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देहरादून उत्तराखंड में बिजली परियोजना और पावर परचेज एग्रीमेंट यानी PPA को लेकर सियासी बहस तेज हो गई है। कांग्रेस ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार पर प्रस्तावित पावर प्रोजेक्ट की प्रक्रिया और टेंडर की शर्तों को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस की ओर से आरोप लगाया गया है कि परियोजना से जुड़ी टेंडर प्रक्रिया में कई शर्तों में बदलाव किए गए और ऐसी व्यवस्थाएं रखी गईं, जिनसे एक निजी कंपनी को फायदा पहुंचने की आशंका पैदा होती है।कांग्रेस के AICC मीडिया एवं पब्लिसिटी विभाग के चेयरमैन ने सवाल उठाते हुए पूछा कि आखिर UJVN और THDC से जुड़े प्रस्तावित प्रोजेक्ट को क्यों खत्म किया गया? टेंडर की 84 शर्तों में बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी? पावर प्लांट को उत्तराखंड से बाहर लगाने की संभावना वाली शर्त क्यों रखी गई? इसके अलावा कांग्रेस ने अडानी पावर के साथ 25 साल के बिजली खरीद समझौते को लेकर भी सरकार से जवाब मांगा है। इन सवालों और आरोपों को फिलहाल कांग्रेस के राजनीतिक दावों के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। उपलब्ध सार्वजनिक रिपोर्टों में सरकार की ओर से इन सभी आरोपों का विस्तृत जवाब सामने नहीं आया है।

25 साल के बिजली खरीद समझौते पर सवाल

मामले का सबसे अहम पहलू अडानी पावर के साथ 25 साल के बिजली खरीद समझौते को लेकर है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक उत्तराखंड सरकार ने अडानी पावर से दीर्घकालिक बिजली खरीद की व्यवस्था को मंजूरी दी है। इस व्यवस्था के तहत राज्य को लंबे समय तक बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने का उद्देश्य बताया गया है।वहीं कांग्रेस नेता यशपाल आर्य ने सरकार के इस फैसले पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि उत्तराखंड की बिजली और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े फैसलों में राज्य के हितों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इस मुद्दे को लेकर विपक्ष सरकार से प्रक्रिया, दर और समझौते की शर्तों पर पारदर्शिता की मांग कर रहा है।

 अडानी PPA पर घिरी धामी सरकार
अडानी PPA पर घिरी धामी सरकार

UJVN और THDC प्रोजेक्ट को लेकर क्या सवाल?

कांग्रेस ने यह सवाल भी उठाया है कि जब UJVN और THDC जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां बिजली परियोजनाओं के विकास से जुड़ी हैं, तो प्रस्तावित परियोजना को आगे बढ़ाने के बजाय निजी कंपनी से बिजली खरीद की व्यवस्था क्यों की गई।UJVN उत्तराखंड सरकार की पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी है और वर्तमान में राज्य में कई जलविद्युत परियोजनाओं का संचालन करती है। कंपनी के आधिकारिक विवरण के मुताबिक उसकी संचालित परियोजनाओं की कुल क्षमता 1,440.60 मेगावाट है।वहीं THDC India Limited एक सार्वजनिक क्षेत्र की बिजली कंपनी है। ऐसे में कांग्रेस का सवाल है कि राज्य की अपनी या सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओं की भूमिका को किस आधार पर बदला गया और निजी क्षेत्र के साथ दीर्घकालिक बिजली खरीद व्यवस्था क्यों चुनी गई।

84 टेंडर शर्तों में बदलाव का मुद्दा

कांग्रेस की ओर से टेंडर की 84 शर्तों में बदलाव का दावा करते हुए सरकार से इसका कारण सार्वजनिक करने की मांग की गई है। विपक्ष का सवाल है कि यदि टेंडर प्रक्रिया में इतने बड़े स्तर पर बदलाव हुए तो उनकी आवश्यकता क्या थी और इन बदलावों से बोली प्रक्रिया पर क्या असर पड़ा।यह भी सवाल उठाया गया है कि क्या टेंडर की शर्तों में किए गए बदलावों से प्रतिस्पर्धा का दायरा प्रभावित हुआ। हालांकि, उपलब्ध स्रोतों में 84 बदलावों की पूरी सूची या प्रत्येक बदलाव का आधिकारिक विवरण सामने नहीं मिला है। इसलिए इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि के लिए मूल टेंडर दस्तावेज और संशोधित शर्तों को देखना जरूरी होगा।

प्लांट उत्तराखंड से बाहर लगाने की शर्त क्यों?

कांग्रेस ने टेंडर से जुड़ी एक अन्य कथित शर्त पर भी सवाल उठाया है। विपक्ष के मुताबिक ऐसी व्यवस्था क्यों रखी गई कि प्रस्तावित पावर प्लांट उत्तराखंड की सीमा से बाहर भी लगाया जा सकता है।यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तराखंड प्राकृतिक संसाधनों और जलविद्युत क्षमता वाला राज्य है। यदि राज्य बिजली खरीदने के लिए किसी बाहरी क्षेत्र में स्थापित परियोजना पर निर्भर करता है तो उससे परियोजना की लागत, बिजली की उपलब्धता, ट्रांसमिशन व्यवस्था और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा जैसे मुद्दे जुड़े होते हैं।इस विशेष शर्त का आधिकारिक टेंडर दस्तावेज में सटीक स्वरूप और उसका औचित्य सार्वजनिक रिकॉर्ड से स्पष्ट होना अभी बाकी है।

‘मोडानी मॉडल’ पर कांग्रेस का हमला

कांग्रेस ने पूरे मामले को राजनीतिक रूप से ‘मोडानी मॉडल’ से जोड़ते हुए सरकार पर निशाना साधा है। विपक्ष का आरोप है कि नियमों और प्रक्रियाओं में बदलाव किसी खास कारोबारी समूह को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से किए गए।लेकिन किसी कंपनी या व्यक्ति को लाभ पहुंचाने के लिए नियम बदले गए, यह आरोप अभी राजनीतिक आरोप के स्तर पर है। इसे स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत करने के लिए टेंडर रिकॉर्ड, निर्णय प्रक्रिया, कैबिनेट दस्तावेज और संबंधित अधिकारियों के आधिकारिक स्पष्टीकरण जैसे प्रमाण आवश्यक होंगे।

सरकार और विपक्ष के बीच बढ़ सकती है तकरार

उत्तराखंड में बिजली की बढ़ती मांग के बीच दीर्घकालिक बिजली खरीद सरकार के लिए महत्वपूर्ण नीति विषय है। सरकार की ओर से ऐसे समझौतों को भविष्य की बिजली जरूरतों को पूरा करने के नजरिए से देखा जा सकता है। दूसरी ओर विपक्ष का जोर प्रक्रिया की पारदर्शिता, स्थानीय संसाधनों के उपयोग और राज्य के आर्थिक हितों पर है।अडानी पावर के साथ 25 साल की बिजली खरीद व्यवस्था को लेकर उपलब्ध रिपोर्टों में दीर्घकालिक बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने की बात कही गई है।अब राजनीतिक बहस इस बात पर केंद्रित है कि इस समझौते की दर क्या है, बिजली खरीद की शर्तें क्या हैं, जोखिम किस पक्ष पर है और राज्य को इससे लंबे समय में कितना आर्थिक लाभ या दायित्व होगा।

क्या है आगे की तस्वीर?

कांग्रेस के सवालों ने पावर प्रोजेक्ट और PPA को लेकर सरकार के सामने पारदर्शिता से जुड़े कई मुद्दे रख दिए हैं। खासतौर पर 84 टेंडर शर्तों में बदलाव, UJVN-THDC की भूमिका, प्लांट की लोकेशन और 25 साल के PPA जैसे सवालों पर दस्तावेजी जानकारी सामने आना इस बहस को स्पष्ट कर सकता है।फिलहाल इतना स्पष्ट है कि अडानी पावर के साथ 25 साल की बिजली खरीद व्यवस्था को लेकर उत्तराखंड की राजनीति में सवाल उठ रहे हैं, जबकि सरकार की ओर से इस फैसले का उद्देश्य दीर्घकालिक बिजली उपलब्धता से जुड़ा बताया गया है।अब निगाह इस बात पर है कि सरकार कांग्रेस के लगाए आरोपों पर क्या जवाब देती है और क्या टेंडर की मूल तथा संशोधित शर्तों को सार्वजनिक कर इस पूरे मामले पर स्थिति स्पष्ट की जाती है।

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