हिमाचल में बौने सेब से विदेशी किस्मों को चुनौती

Digital Desk
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हिमाचल प्रदेश में सेब उत्पादन को लेकर एक नई कहानी लिखी जा रही है। राज्य के एक प्रगतिशील किसान सुनील ने बौने (ड्वार्फ) सेब पौधों की खेती कर न केवल उत्पादन बढ़ाया है, बल्कि अमेरिका और न्यूजीलैंड से आयातित सेब किस्मों को भी चुनौती दी है।

पारंपरिक ऊंचे सेब के पेड़ों की तुलना में बौने पौधों पर आधारित हाई-डेंसिटी प्लांटेशन मॉडल कम जगह में अधिक उत्पादन देने में सक्षम है। इससे किसानों की आय में वृद्धि हो रही है और बागवानी क्षेत्र में नई संभावनाएं खुल रही हैं।

हिमाचल प्रदेश पहले से ही देश का प्रमुख सेब उत्पादक राज्य है, लेकिन बदलते मौसम और घटती उत्पादकता के बीच यह नई तकनीक किसानों के लिए उम्मीद की किरण बनकर उभरी है।

सुनील, जो मध्य हिमाचल के एक छोटे से गांव से ताल्लुक रखते हैं, ने पारंपरिक बागवानी के बजाय आधुनिक तकनीक को अपनाया। उन्होंने बौने सेब पौधों की उन्नत किस्में लगाईं, जिनमें कम ऊंचाई पर अधिक फल लगते हैं और देखभाल आसान होती है।

सुनील का कहना है कि उन्होंने विदेशी तकनीकों का अध्ययन कर उन्हें स्थानीय जलवायु के अनुरूप ढाला। आज उनके बाग में प्रति हेक्टेयर उत्पादन पारंपरिक बागों की तुलना में कहीं अधिक है।

हाई-डेंसिटी प्लांटेशन का मॉडल

हाई-डेंसिटी प्लांटेशन में पौधों को कम दूरी पर लगाया जाता है, जिससे प्रति एकड़ अधिक संख्या में पौधे लग पाते हैं। ड्रिप इरिगेशन, ट्रेलिस सिस्टम और आधुनिक छंटाई तकनीक का उपयोग कर पौधों को संतुलित वृद्धि दी जाती है।

इस पद्धति से फलों का आकार, रंग और गुणवत्ता बेहतर होती है, जो बाजार में अच्छी कीमत दिलाती है।

अमेरिका और न्यूजीलैंड के सेब को चुनौती कैसे?

भारत में अक्सर अमेरिका और न्यूजीलैंड से आयातित सेब गुणवत्ता और चमक के कारण प्रीमियम दाम पर बिकते हैं। लेकिन सुनील के बाग में उगाए जा रहे सेब रंग, आकार और स्वाद के मामले में विदेशी सेबों को टक्कर दे रहे हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि स्थानीय स्तर पर उच्च गुणवत्ता वाले सेब का उत्पादन बढ़ता है तो आयात पर निर्भरता कम हो सकती है। इससे देश के किसानों को बेहतर बाजार मिलेगा और उपभोक्ताओं को ताजे फल मिलेंगे।

बदलती जलवायु में नई उम्मीद

हिमाचल में पिछले कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन के कारण पारंपरिक सेब उत्पादन प्रभावित हुआ है। बर्फबारी में कमी और तापमान में वृद्धि से फसल चक्र पर असर पड़ा है।

बौने पौधों की किस्में अपेक्षाकृत कम चिलिंग आवर में भी बेहतर उत्पादन दे सकती हैं। यही कारण है कि कई किसान अब इस तकनीक की ओर रुख कर रहे हैं।

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राज्य सरकार और बागवानी विभाग इस मॉडल को बढ़ावा दें, तो आने वाले वर्षों में हिमाचल का सेब उद्योग और मजबूत हो सकता है।

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उत्तर प्रदेश के लिए क्या सीख?

उत्तर प्रदेश के पहाड़ी और तराई क्षेत्रों में भी बागवानी की संभावनाएं हैं। हिमाचल के इस मॉडल से प्रेरणा लेकर यूपी के किसान भी उच्च घनत्व वाली फल खेती को अपना सकते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक तकनीक, गुणवत्तापूर्ण पौध सामग्री और बाजार से सीधा जुड़ाव किसानों की आय बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकता है।

सरकारी सहयोग और भविष्य की राह

हिमाचल प्रदेश सरकार बागवानी मिशन के तहत आधुनिक तकनीकों को प्रोत्साहन दे रही है। सब्सिडी, प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन के जरिए किसानों को हाई-डेंसिटी प्लांटेशन अपनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।

सुनील जैसे प्रगतिशील किसान न केवल अपनी आय बढ़ा रहे हैं, बल्कि अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणा बन रहे हैं। यदि यह मॉडल व्यापक स्तर पर अपनाया गया, तो भारत का सेब उत्पादन वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बन सकता है।

हिमाचल प्रदेश में बौने सेब पौधों की खेती एक नई क्रांति की शुरुआत है। सुनील की पहल यह दिखाती है कि आधुनिक तकनीक और नवाचार से स्थानीय किसान भी अमेरिका और न्यूजीलैंड जैसे देशों की उन्नत किस्मों को चुनौती दे सकते हैं।

बदलते समय में खेती के तरीकों में नवाचार ही किसानों की आय और देश की कृषि अर्थव्यवस्था को मजबूती दे सकता है।

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