
लखनऊ की पहचान सिर्फ नवाबों, तहजीब, कबाब और इमामबाड़ों से ही नहीं है, बल्कि यहां की धार्मिक परंपराएं भी पूरे देश में अपनी अलग छाप छोड़ती हैं। इन्हीं परंपराओं में एक है ज्येष्ठ माह के मंगलवार, जिन्हें आम बोलचाल में “बड़ा मंगल” कहा जाता है। यह ऐसा धार्मिक और सामाजिक आयोजन है, जिसकी मिसाल देश के किसी अन्य शहर में शायद ही देखने को मिले। ज्येष्ठ माह के प्रत्येक मंगलवार को लखनऊ की सड़कें भक्ति, सेवा और सामाजिक समरसता का अद्भुत संगम बन जाती हैं। खास बात यह है कि यहां लगने वाले विशाल भंडारे न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि देश-विदेश तक प्रसिद्ध हैं। बड़ा मंगल भगवान हनुमान की आराधना को समर्पित है। मान्यता है कि ज्येष्ठ माह के मंगलवार को हनुमान जी की पूजा-अर्चना करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और जीवन के संकट दूर होते हैं। लखनऊ में इस परंपरा का इतिहास करीब 400 वर्ष पुराना माना जाता है। कहा जाता है कि अवध के नवाबी दौर में एक बेगम को स्वप्न में हनुमान जी के दर्शन हुए थे। इसके बाद अलीगंज क्षेत्र में प्रसिद्ध हनुमान मंदिर की स्थापना हुई। तभी से यहां ज्येष्ठ माह के मंगलवारों पर विशेष पूजा और भंडारों की परंपरा शुरू हुई, जो समय के साथ पूरे शहर में फैल गई।बड़ा मंगल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सेवा का महापर्व भी है। इस दिन शहर के लगभग हर मोहल्ले, बाजार, सड़क और चौराहे पर भंडारे आयोजित किए जाते हैं। कहीं शरबत बांटा जाता है, कहीं पूड़ी-सब्जी, कहीं छोले-चावल, तो कहीं हलवा और प्रसाद का वितरण किया जाता है। हजारों स्वयंसेवक सुबह से देर रात तक लोगों की सेवा में जुटे रहते हैं। इन भंडारों में जाति, धर्म, वर्ग और समुदाय की कोई दीवार नहीं होती। जो भी आता है, उसे सम्मानपूर्वक भोजन और प्रसाद दिया जाता है।लखनऊ के बड़ा मंगल भंडारों की प्रसिद्धि का एक बड़ा कारण उनका विशाल स्वरूप है। कई स्थानों पर एक दिन में हजारों से लेकर लाखों लोगों तक को भोजन कराया जाता है। शहर के प्रमुख मार्गों पर दर्जनों भंडारे एक साथ चलते दिखाई देते हैं। लोग अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार इसमें योगदान देते हैं। कई परिवार पीढ़ियों से भंडारे आयोजित करते आ रहे हैं और इसे अपने परिवार की धार्मिक विरासत मानते हैं। बड़ा मंगल के दौरान लखनऊ का नजारा किसी उत्सव से कम नहीं होता। अलीगंज का प्राचीन हनुमान मंदिर श्रद्धालुओं से खचाखच भरा रहता है। सुबह से ही दर्शन के लिए लंबी कतारें लग जाती हैं। मंदिर परिसर में सुंदरकांड पाठ, हनुमान चालीसा का सामूहिक पाठ और विशेष आरतियों का आयोजन होता है। श्रद्धालु दूर-दूर से यहां पहुंचकर बजरंगबली का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इस परंपरा की एक और खास बात यह है कि इसमें केवल हिंदू समुदाय ही नहीं, बल्कि अन्य धर्मों के लोग भी बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं। कई मुस्लिम परिवार और कारोबारी भी भंडारे आयोजित करते हैं या उनमें सहयोग देते हैं। यही गंगा-जमुनी तहजीब लखनऊ की असली पहचान है और बड़ा मंगल इस सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रूप में प्रस्तुत करता है।

ज्येष्ठ माह में पड़ने वाली भीषण गर्मी के बीच शरबत, ठंडा पानी, फल और अन्य खाद्य पदार्थों का वितरण लोगों को राहत भी पहुंचाता है। कई स्थानों पर चिकित्सा शिविर और सामाजिक सेवा कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। इस प्रकार बड़ा मंगल केवल धार्मिक आस्था का नहीं, बल्कि जनसेवा का भी बड़ा माध्यम बन चुका है।समय के साथ इस आयोजन का स्वरूप और भी भव्य होता गया है। सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों के दौर में अब देश-विदेश में रहने वाले लखनऊवासी भी इस परंपरा से जुड़े रहते हैं। कई लोग आर्थिक सहयोग भेजते हैं तो कई विशेष रूप से बड़ा मंगल के अवसर पर लखनऊ पहुंचते हैं। यही कारण है कि इस आयोजन की चर्चा अब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक होने लगी है।लखनऊ के बड़ा मंगल भंडारे विश्व प्रसिद्ध इसलिए माने जाते हैं क्योंकि यहां सेवा और श्रद्धा का जो अनूठा संगम दिखाई देता है, वह दुर्लभ है। यह केवल भोजन वितरण का कार्यक्रम नहीं, बल्कि मानवता, भाईचारे और निस्वार्थ सेवा का उत्सव है। शायद यही वजह है कि हर वर्ष लाखों लोग इस परंपरा का हिस्सा बनते हैं और बजरंगबली के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करते हैं।आज जब दुनिया तेजी से बदल रही है, तब भी लखनऊ का बड़ा मंगल अपनी मूल भावना को संजोए हुए है। यह आयोजन लोगों को यह संदेश देता है कि धर्म का सबसे बड़ा स्वरूप सेवा है और समाज को जोड़ने का सबसे सरल माध्यम प्रेम, सहयोग और परोपकार है। यही कारण है कि बड़ा मंगल केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि लखनऊ की आत्मा और उसकी सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा बन चुका है।
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