पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है। सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के तीन बैंक खातों को लेकर शुरू हुई जांच ने पार्टी के भीतर और बाहर दोनों जगह हलचल मचा दी है। उत्तर 24 परगना जिले की साइबर पुलिस ने इन खातों के पिछले पांच वर्षों के वित्तीय लेन-देन की गहन पड़ताल शुरू कर दी है। आरोप इतने गंभीर हैं कि जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि इन खातों में जमा होने वाला पैसा आखिर कहां से आया और किन लोगों तक पहुंचाया गया। मामला तब और गंभीर हो गया जब जांच के शुरुआती चरण में संबंधित बैंक को तीनों खातों पर डेबिट फ्रीज लगाने का निर्देश दिया गया। इसके बाद राजनीतिक गलियारों में सवाल उठने लगे कि क्या इन खातों का इस्तेमाल केवल पार्टी गतिविधियों के लिए किया जा रहा था या फिर इनके जरिए किसी बड़े वित्तीय नेटवर्क को संचालित किया जा रहा था। सूत्रों के अनुसार साइबर पुलिस केवल बैंकिंग ट्रांजैक्शन ही नहीं, बल्कि इन खातों के पूरे इतिहास को खंगाल रही है। जांचकर्ता यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि खाते कब खोले गए, किसके नाम पर पंजीकृत हैं, किन-किन लोगों को इन्हें संचालित करने का अधिकार दिया गया था और वर्षों तक इन खातों से किस प्रकार का लेन-देन होता रहा। जांच की दिशा उस समय और तेज हो गई जब टीएमसी के कुछ बागी विधायकों ने साइबर क्राइम थाने में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में दावा किया गया कि कथित तौर पर जबरन वसूली और गैर-कानूनी कमीशन से प्राप्त धनराशि को इन तीन बैंक खातों में जमा किया जाता था। आरोप यह भी है कि बाद में इसी रकम का इस्तेमाल अन्य संदिग्ध गतिविधियों में किया गया।

इन्हीं आरोपों के आधार पर पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की। अब अधिकारियों की टीम पिछले पांच वर्षों के बैंक रिकॉर्ड, जमा राशि, निकासी और खातों से जुड़े सभी वित्तीय दस्तावेजों का विश्लेषण कर रही है। यदि आरोपों की पुष्टि होती है तो यह मामला राज्य की राजनीति में बड़े वित्तीय घोटाले के रूप में सामने आ सकता है। इस पूरे घटनाक्रम ने टीएमसी के अंदरूनी संघर्ष को भी उजागर कर दिया है। पार्टी के पूर्व कोषाध्यक्ष और ममता बनर्जी सरकार में खेल एवं बिजली मंत्री रह चुके अरूप बिस्वास ने कुछ दिन पहले संबंधित निजी बैंक को पत्र लिखकर खातों को फ्रीज करने का अनुरोध किया था। अपने पत्र में उन्होंने पार्टी के भीतर फंड नियंत्रण को लेकर चल रहे विवाद का उल्लेख किया था। यही वह बिंदु है जहां मामला केवल वित्तीय जांच तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि राजनीतिक टकराव का रूप भी ले लेता है। टीएमसी के भीतर एक धड़ा ऐसा है जो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व के साथ खड़ा है। इस धड़े ने खातों को फ्रीज किए जाने के फैसले को चुनौती देते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।हाईकोर्ट में दायर याचिका में मांग की गई है कि यह स्पष्ट किया जाए कि आखिर किसके आदेश पर और किन कानूनी आधारों पर इन खातों पर डेबिट फ्रीज लगाया गया। पार्टी का तर्क है कि बैंकिंग प्रक्रिया और राजनीतिक संगठन की वित्तीय गतिविधियों को लेकर पारदर्शिता आवश्यक है और बिना स्पष्ट कारण खातों को फ्रीज करना उचित नहीं माना जा सकता। दूसरी ओर जांच एजेंसियों का मानना है कि वित्तीय लेन-देन की प्रकृति और शिकायतों की गंभीरता को देखते हुए खातों की गतिविधियों पर तत्काल रोक लगाना जरूरी था। जांचकर्ता अब बैंकिंग दस्तावेजों के साथ-साथ उन व्यक्तियों की भूमिका भी खंगाल रहे हैं जो वर्षों से इन खातों के अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह मामला केवल बैंक खातों तक सीमित नहीं है। यदि जांच में आरोप सही साबित होते हैं तो इसका असर सीधे राज्य की सियासत पर पड़ सकता है। विपक्ष पहले से ही टीएमसी पर भ्रष्टाचार और कटमनी संस्कृति के आरोप लगाता रहा है। ऐसे में बैंक खातों की जांच विपक्ष को सरकार पर हमला बोलने का नया मौका दे सकती है।फिलहाल बंगाल की राजनीति की नजरें साइबर पुलिस की जांच और हाईकोर्ट की सुनवाई पर टिकी हुई हैं। आने वाले दिनों में यह साफ हो सकेगा कि तीन बैंक खातों का यह मामला केवल पार्टी के अंदरूनी विवाद का नतीजा है या फिर इसके पीछे वास्तव में किसी बड़े वित्तीय खेल की परतें छिपी हुई हैं।एक बात तय है कि पांच साल के बैंकिंग रिकॉर्ड की जांच से जो तथ्य सामने आएंगे, वे पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा असर डाल सकते हैं। अब सबकी निगाहें जांच एजेंसियों की अगली कार्रवाई और अदालत के फैसले पर टिकी हैं।
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