हर छापे में ‘सफेद बोरी’ ही क्यों? तस्करों की पसंद या पुलिस की ‘कॉपी-पेस्ट’ कहानी, उठे बड़े सवाल

Editorial
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कानपुर में अवैध शराब और नशीले पदार्थों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई लगातार जारी है। शहर के अलग-अलग इलाकों से पुलिस द्वारा की जा रही गिरफ्तारियों में एक ऐसा पैटर्न सामने आया है जिसने अब कानून व्यवस्था और जांच प्रक्रिया पर नया सवाल खड़ा कर दिया है। गंगा बैराज रोड हो, दादानगर की ढाल, हैलट की नहरिया हो या फिर घाटमपुर रेलवे क्रॉसिंग—लगभग हर मामले में पुलिस की बरामदगी रिपोर्ट में एक चीज कॉमन दिखाई दे रही है, और वह है “सफेद प्लास्टिक की बोरी”। दिलचस्प बात यह है कि पिछले कई महीनों में दर्जनों मामलों में पुलिस ने जब भी किसी आरोपी को अवैध शराब या अन्य प्रतिबंधित सामान के साथ गिरफ्तार किया, तो बरामदगी के विवरण में सफेद प्लास्टिक की बोरी का जिक्र जरूर मिला। अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या सचमुच तस्करों की पहली पसंद यही सफेद बोरी है या फिर पुलिस की कार्रवाई में इस्तेमाल होने वाली फर्द (रिकवरी मेमो) का यह एक रटा-रटाया हिस्सा बन चुका है।

कानपुर में मार्च से जून तक हुई कई गिरफ्तारियों के रिकॉर्ड पर नजर डालें तो यह पैटर्न और भी स्पष्ट दिखाई देता है। 20 मार्च को साइन डम पार्क के पास से पवन दीक्षित को 17 पैकेट के साथ पकड़ा गया। 21 मार्च को अरौल पुलिस ने बिरर्खनपुर से गोपाली को 17 पैकेटों के साथ गिरफ्तार किया। 22 मार्च को अर्मापुर पुलिस ने मजार वाली रोड से सोहन यादव को 16 पैकेटों के साथ दबोचा। 23 अप्रैल को बिठूर पुलिस ने ब्लूवर्ल्ड तिराहे के पास दीपक पाल को 20 पैकेटों के साथ पकड़ा। 4 जून को अरौल पुलिस ने नानामऊ तिराहे के पास राजीव को 20 पैकेटों के साथ गिरफ्तार किया। 7 जून को कलक्टरगंज पुलिस ने कोपरगंज इलाके से पिलू को 17 पैकेटों के साथ पकड़ा, जबकि 12 जून को जूही पुलिस ने जाहिद को 18 पैकेट शराब के साथ गिरफ्तार किया। इन लगभग सभी मामलों में बरामदगी के दौरान सफेद प्लास्टिक बोरी का उल्लेख किया गया।यही वह बिंदु है जिसने अब बहस को जन्म दे दिया है। आम लोगों के साथ-साथ कानूनी विशेषज्ञ भी सवाल उठा रहे हैं कि आखिर हर मामले में एक जैसी बोरी और एक जैसी कहानी कैसे सामने आ रही है। क्या यह महज संयोग है या फिर जांच प्रक्रिया में कहीं कोई ऐसा तयशुदा प्रारूप इस्तेमाल हो रहा है जो हर केस में लगभग एक जैसी भाषा और विवरण दर्ज करता है?

“जो मिलता है, वही फर्द में लिखा जाता है” — पुलिस का पक्ष

इस पूरे विवाद पर कानपुर पुलिस का कहना है कि इसमें किसी तरह का रहस्य तलाशना उचित नहीं है।

एडिशनल पुलिस कमिश्नर (कानून-व्यवस्था) डॉ. विपिन ताडा ने कहा—

“शराब की अवैध बिक्री में शामिल लोग अक्सर साधारण बैग या प्लास्टिक की बोरियों का इस्तेमाल करते हैं। यह आसानी से उपलब्ध होती हैं और कम खर्च में मिल जाती हैं। बरामदगी के समय जो सामान मिलता है, उसी का उल्लेख फर्द में किया जाता है।”

पुलिस अधिकारियों का तर्क है कि सफेद प्लास्टिक की बोरी हल्की, सस्ती और आसानी से उपलब्ध होती है। इसके अलावा इसमें रखा गया सामान बाहर से सामान्य दिखाई देता है, जिससे संदेह कम होता है। यही वजह है कि तस्कर इसका ज्यादा इस्तेमाल करते हैं।

“रटी-रटाई फर्द अदालत में कमजोर पड़ जाती है” — वरिष्ठ अधिवक्ता

हालांकि कानूनी जानकार इस तर्क से पूरी तरह सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि लगातार एक जैसे विवरण सामने आना संदेह पैदा करता है।

वरिष्ठ फौजदारी अधिवक्ता अमित सिंह राठौर ने कहा—

“शराब, चरस, असलहा और अन्य बरामदगी के मामलों में पुलिस की फर्द की भाषा अक्सर रटी-रटाई होती है। कई बार बरामदगी स्थल और परिस्थितियां भी लगभग एक जैसी दर्ज होती हैं। कोर्ट में गवाही की पेचीदगी से बचने के लिए ऐसा पैटर्न अपनाया जाता है। यही कारण है कि कई मुकदमों में बचाव पक्ष के सवालों पर पुलिस के गवाह उलझ जाते हैं और बरामदगी पर संदेह खड़ा हो जाता है।”

अमित सिंह राठौर का यह बयान इस पूरे मामले को और गंभीर बना देता है। उनका कहना है कि अगर हर केस में एक जैसी कहानी दर्ज होगी तो अदालत में उसकी विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।

सवाल सिर्फ बोरी का नहीं, जांच की विश्वसनीयता का है

असल सवाल यह नहीं है कि सफेद बोरी में शराब मिली या नहीं। सवाल यह है कि क्या हर मामले में जांच और दस्तावेजीकरण पूरी पारदर्शिता और सटीकता के साथ किया जा रहा है? यदि वास्तव में हर आरोपी सफेद प्लास्टिक की बोरी का इस्तेमाल कर रहा है तो यह भी जांच का विषय है कि आखिर यह पैटर्न इतना समान क्यों है। और यदि ऐसा नहीं है तो फिर रिकवरी मेमो में बार-बार एक जैसी भाषा और एक जैसे विवरण क्यों दिखाई दे रहे हैं।कानपुर में सामने आए इन मामलों ने पुलिस की कार्यप्रणाली और दस्तावेजीकरण प्रक्रिया पर नई बहस छेड़ दी है। जहां पुलिस इसे तस्करों की कार्यशैली बता रही है, वहीं कानूनी विशेषज्ञ इसे जांच प्रक्रिया की एक बड़ी कमजोरी मान रहे हैं। अब बड़ा सवाल यही है कि क्या हर केस में मिलने वाली “सफेद बोरी” महज संयोग है, या फिर यह पुलिस फाइलों में दर्ज एक ऐसी कहानी बन चुकी है जो हर बरामदगी के साथ खुद-ब-खुद जुड़ जाती है? जवाब चाहे जो भी हो, लेकिन यह बहस कानून व्यवस्था और न्यायिक प्रक्रिया दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण बन गई है।

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