क्या रावण जन्म से राक्षस था? जानिए उससे जुड़े 6 सबसे बड़े मिथकों का असली सच

Editorial
8 Min Read

रावण का नाम सुनते ही अधिकांश लोगों के मन में एक ऐसे राक्षस की छवि बनती है, जिसने माता सीता का हरण किया, भगवान श्रीराम से युद्ध किया और अंत में अपने अहंकार के कारण मृत्यु को प्राप्त हुआ। हर साल दशहरे पर उसके पुतले का दहन किया जाता है और उसे बुराई का प्रतीक माना जाता है। लेकिन क्या रावण की पूरी कहानी केवल इतनी ही थी? क्या वह जन्म से ही राक्षस था? क्या उसके दस सिर वास्तव में थे? क्या वह केवल अत्याचारी राजा था या उसके व्यक्तित्व का दूसरा पक्ष भी था?धार्मिक ग्रंथों, पुराणों और रामायण में वर्णित घटनाओं को ध्यान से पढ़ने पर पता चलता है कि रावण से जुड़े कई ऐसे मिथक हैं, जिन्हें लोग वर्षों से सच मानते आ रहे हैं। आइए जानते हैं रावण से जुड़े छह बड़े मिथक और उनके पीछे की वास्तविकता।सबसे बड़ा मिथक यही है कि रावण जन्म से राक्षस था। वास्तव में ऐसा नहीं है। रावण का जन्म महर्षि विश्रवा और राक्षसी कुल की कैकसी से हुआ था। महर्षि विश्रवा महान ऋषि और ब्राह्मण थे, जबकि उनकी माता राक्षस कुल से थीं। इस कारण रावण में दोनों वंशों के गुण मौजूद थे। उसने वेद, उपनिषद, आयुर्वेद, ज्योतिष, तंत्र और संगीत का गहन अध्ययन किया था। वह भगवान शिव का परम भक्त था और संस्कृत का प्रकांड विद्वान माना जाता था। यानी जन्म से वह केवल राक्षस नहीं, बल्कि एक अत्यंत विद्वान ब्राह्मण भी था। उसके कर्मों ने उसे इतिहास में खलनायक बना दिया, जन्म ने नहीं।

दूसरा बड़ा मिथक यह है कि रावण के सचमुच दस सिर थे। रामायण की कई व्याख्याओं में दस सिरों का उल्लेख मिलता है, लेकिन अनेक विद्वान इसे प्रतीकात्मक मानते हैं। दस सिर ज्ञान, बुद्धि और दस प्रकार की विद्या या फिर मनुष्य के दस प्रमुख अवगुणों और गुणों का प्रतीक माने जाते हैं। कुछ मान्यताओं के अनुसार रावण के पास ऐसी मायावी शक्ति थी, जिससे वह दस सिरों वाला दिखाई देता था। इसलिए यह जरूरी नहीं कि उसके वास्तव में दस भौतिक सिर रहे हों। यह उसकी असाधारण बुद्धिमत्ता और मायावी शक्ति का भी प्रतीक माना जाता है।तीसरा मिथक यह है कि रावण केवल अत्याचारी और क्रूर शासक था। यह सच है कि उसके अहंकार और कुछ फैसलों ने विनाश का रास्ता तैयार किया, लेकिन लंका के शासन की बात करें तो उसे एक कुशल प्रशासक भी माना जाता है। कहा जाता है कि उसकी राजधानी सोने की लंका समृद्धि, संपन्नता और वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत विकसित थी। उसके राज्य में धन-धान्य की कमी नहीं थी और प्रशासन मजबूत था। यही कारण है कि कई ग्रंथों में उसे शक्तिशाली और योग्य शासक भी बताया गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व में अच्छाइयां और बुराइयां दोनों हो सकती हैं।चौथा मिथक यह है कि रावण ने माता सीता को छू लिया था। वाल्मीकि रामायण के अनुसार रावण ने माता सीता का हरण जरूर किया, लेकिन अशोक वाटिका में रहते हुए उसने कभी उनकी इच्छा के विरुद्ध उन्हें स्पर्श नहीं किया। इसके पीछे एक कारण यह भी बताया जाता है कि उसे श्राप मिला था कि यदि वह किसी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध स्पर्श करेगा, तो उसका विनाश निश्चित हो जाएगा। यही वजह थी कि उसने बार-बार सीता को विवाह के लिए मनाने का प्रयास किया, लेकिन बलपूर्वक उन्हें छूने का साहस नहीं किया। यह तथ्य उसके अपराध को कम नहीं करता, लेकिन इस मिथक का वास्तविक पक्ष अवश्य सामने लाता है।पांचवां मिथक यह है कि रावण केवल शक्ति के बल पर महान बना था। जबकि वास्तविकता यह है कि उसने भगवान ब्रह्मा की कठोर तपस्या करके अनेक वरदान प्राप्त किए थे। वर्षों तक कठिन तप करने के बाद उसे असाधारण शक्तियां मिलीं। वह महान योद्धा होने के साथ-साथ उत्कृष्ट संगीतज्ञ भी था। माना जाता है कि उसने भगवान शिव की स्तुति में प्रसिद्ध शिव तांडव स्तोत्र की रचना की थी, जिसे आज भी संस्कृत साहित्य की अद्भुत कृतियों में गिना जाता है। उसकी विद्वता और तपस्या को कई ग्रंथों में सम्मान के साथ वर्णित किया गया है।

छठा और सबसे चर्चित मिथक यह है कि रावण पूरी तरह बुरा था। भारतीय संस्कृति में रावण को बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है, लेकिन उसके जीवन का संदेश इससे कहीं बड़ा है। वह ज्ञानवान था, शक्तिशाली था, महान तपस्वी था और सफल शासक भी था। लेकिन उसका अहंकार, क्रोध, सत्ता का अभिमान और गलत निर्णय उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गए। यही कारण है कि इतना सामर्थ्यवान व्यक्ति भी अपने दोषों के कारण पतन की ओर चला गया। रामायण का सबसे बड़ा संदेश यही है कि केवल ज्ञान, शक्ति और वैभव किसी व्यक्ति को महान नहीं बनाते, बल्कि विनम्रता, मर्यादा और धर्म का पालन ही उसे सच्चा महान बनाता है।रावण के जीवन से आज भी कई महत्वपूर्ण सीख मिलती हैं। पहली सीख यह कि जन्म या परिवार किसी व्यक्ति की पहचान तय नहीं करता, बल्कि उसके कर्म करते हैं। दूसरी सीख यह कि ज्ञान तभी तक उपयोगी है, जब तक उसके साथ विनम्रता जुड़ी हो। तीसरी सीख यह कि अहंकार सबसे बड़े साम्राज्य को भी नष्ट कर सकता है। चौथी सीख यह कि शक्ति का उपयोग यदि धर्म और न्याय के लिए न हो, तो वही शक्ति विनाश का कारण बन जाती है।इसी कारण भगवान श्रीराम और रावण का युद्ध केवल दो राजाओं का युद्ध नहीं माना जाता, बल्कि यह धर्म और अधर्म, मर्यादा और अहंकार, संयम और स्वार्थ के बीच संघर्ष का प्रतीक माना जाता है। रावण का व्यक्तित्व जितना जटिल था, उतना ही शिक्षाप्रद भी था। उसके जीवन में जहां असाधारण ज्ञान, तपस्या और पराक्रम था, वहीं अहंकार और अधर्म ने उसकी सारी उपलब्धियों को धूमिल कर दिया।इसलिए रावण को केवल एक खलनायक के रूप में देखना उसकी पूरी कहानी को समझना नहीं है। वह एक ऐसा चरित्र था, जिसमें असाधारण प्रतिभा और गंभीर कमजोरियां दोनों मौजूद थीं। शायद यही कारण है कि हजारों वर्षों बाद भी रावण पर चर्चा केवल इसलिए नहीं होती कि वह श्रीराम का विरोधी था, बल्कि इसलिए भी होती है कि उसका जीवन यह सिखाता है कि यदि मनुष्य अपने अहंकार पर नियंत्रण नहीं रखता, तो उसकी सबसे बड़ी शक्तियां भी उसके पतन का कारण बन सकती हैं। यही रावण की कथा का सबसे बड़ा सत्य और सबसे महत्वपूर्ण संदेश है।

read on:https://news7hindi.com/bjps-big-bet-on-7-seats-of-uttarakhand-bjps-mission-wins-on-4-impenetrable-seats/

or advertisement visit our office:http://3RD FLOOR, lekhraj market, bansal Complex, Lucknow, Uttar Pradesh 226016

Share This Article
Leave a Comment