रिपोर्ट:दीपचंद्र दीक्षित
फर्रुखाबाद उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले के नवाबगंज विकासखंड स्थित उम्मरपुर प्राथमिक विद्यालय से शिक्षा व्यवस्था की एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। यहां पढ़ने वाले मासूम बच्चे रोजाना समय से पहले स्कूल पहुंचते हैं, लेकिन उन्हें पढ़ाई शुरू करने के बजाय विद्यालय के बंद गेट के बाहर खड़े होकर शिक्षकों का इंतजार करना पड़ता है। ग्रामीणों का आरोप है कि प्रधानाचार्य और शिक्षक नियमित रूप से निर्धारित समय से देर से विद्यालय पहुंचते हैं, जिससे बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है और सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।ग्रामीणों का कहना है कि सरकार जहां एक ओर परिषदीय विद्यालयों की शिक्षा व्यवस्था सुधारने, बच्चों की उपस्थिति बढ़ाने और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, वहीं दूसरी ओर कुछ शिक्षकों की लापरवाही इन प्रयासों पर पानी फेर रही है।
समय पर पहुंचते हैं बच्चे, देर से आते हैं शिक्षक
ग्रामीणों के मुताबिक विद्यालय का समय सुबह 7:30 बजे निर्धारित है। अधिकांश छात्र-छात्राएं रोजाना समय से पहले स्कूल पहुंच जाते हैं। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि स्कूल का मुख्य गेट ही बंद रहता है, क्योंकि न तो प्रधानाचार्य पहुंचे होते हैं और न ही अन्य शिक्षक।मजबूरन छोटे-छोटे बच्चे धूप, उमस या बारिश में स्कूल परिसर के बाहर खड़े होकर शिक्षकों के आने का इंतजार करते रहते हैं। शिक्षक जब विद्यालय पहुंचते हैं, तभी गेट खुलता है और उसके बाद पढ़ाई शुरू हो पाती है।स्थानीय लोगों का कहना है कि यह कोई एक-दो दिन की समस्या नहीं, बल्कि लंबे समय से चला आ रहा सिलसिला है।
हर दिन बर्बाद हो रहा पढ़ाई का समय
विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चों का कहना है कि वे अपने माता-पिता की सीख के अनुसार समय पर स्कूल पहुंचते हैं, लेकिन शिक्षकों के देर से आने के कारण रोज उनका महत्वपूर्ण पढ़ाई का समय बर्बाद हो जाता है।बच्चों का कहना है कि यदि शिक्षक समय पर विद्यालय पहुंचें तो कक्षाएं समय से शुरू होंगी और पढ़ाई भी बेहतर ढंग से हो सकेगी।शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि प्राथमिक स्तर पर पढ़ाई का हर मिनट महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में नियमित देरी बच्चों की सीखने की क्षमता और अनुशासन दोनों पर नकारात्मक असर डाल सकती है।

अभिभावकों में बढ़ रहा आक्रोश
विद्यालय की कार्यशैली को लेकर अभिभावकों में भी नाराजगी है। उनका कहना है कि बच्चों को रोज समय की पाबंदी सिखाई जाती है, लेकिन जब शिक्षक स्वयं निर्धारित समय का पालन नहीं करेंगे तो बच्चों में अनुशासन कैसे विकसित होगा?अभिभावकों का कहना है कि सरकारी शिक्षक अच्छी सुविधाएं और वेतन प्राप्त करते हैं। ऐसे में उनसे कम से कम समय पर विद्यालय पहुंचकर बच्चों को पढ़ाने की अपेक्षा तो की ही जा सकती है।उनका कहना है कि शिक्षक देर से आने के कारण बच्चों की पढ़ाई लगातार प्रभावित हो रही है और इसका सीधा असर उनके भविष्य पर पड़ रहा है।
पहले भी हुई शिकायत, लेकिन नहीं हुआ सुधार
ग्रामीणों का आरोप है कि इस समस्या को लेकर कई बार संबंधित अधिकारियों से शिकायत की जा चुकी है।इसके बावजूद अब तक न तो किसी शिक्षक पर कार्रवाई हुई और न ही व्यवस्था में कोई सुधार दिखाई दिया। यही कारण है कि ग्रामीणों में प्रशासन के प्रति भी नाराजगी बढ़ती जा रही है।ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते इस लापरवाही पर रोक नहीं लगाई गई तो बच्चों का शैक्षणिक नुकसान लगातार बढ़ता जाएगा।
सरकार के प्रयासों पर लग रहा ग्रहण
उत्तर प्रदेश सरकार लगातार बेसिक शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए नए-नए कदम उठा रही है। स्मार्ट क्लास, डिजिटल शिक्षा, निपुण भारत मिशन, मिड-डे मील और विद्यालयों के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने जैसी कई योजनाएं संचालित की जा रही हैं।लेकिन यदि विद्यालय स्तर पर शिक्षक ही समय का पालन नहीं करेंगे तो इन योजनाओं का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी स्कूल की सबसे बड़ी ताकत उसके शिक्षक होते हैं। यदि शिक्षक समय के प्रति गंभीर नहीं होंगे तो बच्चों में भी अनुशासन और शिक्षा के प्रति सकारात्मक माहौल विकसित नहीं हो पाएगा।
खंड शिक्षा अधिकारी ने क्या कहा?
इस पूरे मामले पर खंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) अमर सिंह राणा ने कहा कि उन्हें अभी तक इस संबंध में कोई औपचारिक जानकारी नहीं मिली है।उन्होंने आश्वासन दिया कि यदि शिक्षकों और प्रधानाचार्य के नियमित रूप से देर से विद्यालय पहुंचने की शिकायत मिली है तो पूरे मामले की जांच कराई जाएगी।उन्होंने कहा कि यदि जांच में आरोप सही पाए गए तो संबंधित शिक्षकों के खिलाफ विभागीय नियमों के अनुसार उचित कार्रवाई की जाएगी।
ग्रामीणों की मांग—बच्चों के भविष्य से न हो खिलवाड़
ग्रामीणों और अभिभावकों ने प्रशासन से मांग की है कि विद्यालय में शिक्षकों की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित कराई जाए और समय पालन को सख्ती से लागू किया जाए।उनका कहना है कि सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं। ऐसे में यदि उन्हें समय पर शिक्षा नहीं मिलेगी तो उनके भविष्य पर सीधा असर पड़ेगा।अब पूरे क्षेत्र की नजर शिक्षा विभाग की कार्रवाई पर टिकी है। सवाल यह है कि क्या जांच के बाद लापरवाह शिक्षकों पर कार्रवाई होगी या फिर मासूम बच्चे रोज की तरह बंद गेट के बाहर खड़े होकर अपने शिक्षकों का इंतजार करते रहेंगे? यही सवाल आज शिक्षा व्यवस्था की जवाबदेही पर भी खड़ा हो गया है।
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