लखनऊ उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी के PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण को लेकर एक बार फिर सियासी बहस तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव लगातार PDA को पार्टी की राजनीतिक रणनीति और सामाजिक न्याय के प्रमुख आधार के तौर पर पेश करते रहे हैं। इसी बीच पार्टी से जुड़ी एक दलित महिला नेता के बयान ने संगठन के भीतर सम्मान और भागीदारी को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।जालौन जिले से सामने आए इस मामले में समाजवादी पार्टी की एससी प्रकोष्ठ की राष्ट्रीय सचिव बताई जा रहीं अनुराधा कठेरिया ने पार्टी के एक कार्यक्रम में अपने साथ कथित तौर पर हुए व्यवहार पर नाराजगी जताई है। उनका आरोप है कि लंबे समय से पार्टी के लिए काम करने के बावजूद उन्हें कार्यक्रम में वह सम्मान और मंच नहीं मिला, जिसकी वह अपेक्षा कर रही थीं।
दलित महिला नेता ने PDA पर उठाया सवाल
अनुराधा कठेरिया के बयान के मुताबिक, वह वर्ष 2012 से समाजवादी पार्टी के लिए सक्रिय रूप से काम कर रही हैं। उन्होंने दावा किया कि पार्टी के मुश्किल दौर में जमीनी कार्यकर्ताओं और नेताओं ने संगठन के लिए लगातार संघर्ष किया, लेकिन जब मंच, सम्मान और अपनी बात रखने का अवसर देने की बात आती है तो पुराने कार्यकर्ताओं को पीछे कर दिया जाता है।उनका आरोप है कि पार्टी के एक बड़े PDA कार्यक्रम में उनके साथ ऐसा व्यवहार किया गया, जिससे उन्हें काफी नाराजगी हुई। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर लंबे समय से संगठन के लिए काम करने वाली एक दलित महिला नेता को ही मंच पर सम्मान और जगह के लिए संघर्ष करना पड़े, तो पार्टी के PDA दावे को किस नजरिए से देखा जाए?हालांकि इस पूरे मामले में समाजवादी पार्टी की ओर से संबंधित आरोपों पर आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आना बाकी है।

‘मुश्किल समय में सड़क पर उतरते हैं कार्यकर्ता’
अनुराधा कठेरिया ने अपने बयान में कहा कि पार्टी पर जब भी संकट आता है तो जमीनी कार्यकर्ता और नेता संगठन के समर्थन में आगे आते हैं। उनका कहना है कि प्रदर्शन से लेकर आंदोलन तक में पुराने कार्यकर्ता सक्रिय भूमिका निभाते हैं।उनके मुताबिक, जमीनी स्तर पर काम करने वाली दलित महिलाएं भी पार्टी के कार्यक्रमों और आंदोलनों में लगातार भाग लेती हैं। लेकिन जब संगठनात्मक सम्मान, मंच और अपनी बात रखने का मौका देने की बात आती है तो उन्हें पीछे कर दिया जाता है।यही आरोप अब समाजवादी पार्टी के PDA मॉडल को लेकर राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है।
लगातार तीसरी बार व्यवहार का आरोप
अनुराधा कठेरिया ने दावा किया कि उनके साथ इस तरह का व्यवहार पहली बार नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि कथित तौर पर लगातार तीसरी बार उन्हें ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा है।उनके इस बयान के बाद सवाल उठ रहा है कि क्या पार्टी संगठन में पुराने और जमीनी कार्यकर्ताओं को पर्याप्त महत्व दिया जा रहा है? क्या पार्टी के भीतर महिला नेताओं और दलित पदाधिकारियों की भागीदारी केवल राजनीतिक संदेश तक सीमित है या वास्तव में उन्हें निर्णय प्रक्रिया और मंच पर बराबर स्थान मिल रहा है?इन सवालों का जवाब फिलहाल पार्टी नेतृत्व की प्रतिक्रिया के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।

लेश यादव के PDA दावे पर सवाल
समाजवादी पार्टी पिछले कुछ समय से PDA को अपनी राजनीति के प्रमुख आधार के तौर पर आगे बढ़ा रही है। पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग को जोड़ने की रणनीति के तहत पार्टी लगातार सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व की बात करती है।अखिलेश यादव की राजनीति में PDA एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। ऐसे में पार्टी की ही एक दलित महिला नेता की ओर से संगठन के भीतर सम्मान को लेकर सवाल उठाया जाना राजनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है।हालांकि एक नेता के व्यक्तिगत अनुभव को पूरे संगठन की नीति का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा। लेकिन अगर ऐसे आरोप बार-बार सामने आते हैं तो पार्टी नेतृत्व के सामने संगठनात्मक स्तर पर उठ रहे सवालों का जवाब देना जरूरी हो जाता है।
महिला सम्मान और संगठन में भागीदारी का मुद्दा
इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू महिला नेताओं की संगठन में भूमिका से भी जुड़ा है। राजनीतिक दल महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने और उन्हें प्रतिनिधित्व देने की बात करते हैं। ऐसे में किसी वरिष्ठ महिला पदाधिकारी की ओर से सार्वजनिक रूप से सम्मान न मिलने का आरोप लगाया जाना पार्टी के लिए असहज सवाल पैदा कर सकता है।अनुराधा कठेरिया के बयान का केंद्र भी यही है कि जमीनी स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं को पार्टी के कार्यक्रमों में उचित सम्मान और अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए।अब देखना होगा कि समाजवादी पार्टी नेतृत्व इस मामले को किस तरह देखता है और क्या पार्टी की ओर से इस पर कोई स्पष्टीकरण दिया जाता है।

क्या PDA सिर्फ चुनावी मुद्दा है?
अनुराधा कठेरिया के आरोपों ने सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा किया है कि क्या PDA केवल चुनावी रणनीति है या संगठन के भीतर भी इसका वास्तविक असर दिखाई देता है?यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित और पिछड़ा वर्ग लंबे समय से निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। राजनीतिक दल इन वर्गों के समर्थन को हासिल करने के लिए लगातार रणनीति बनाते रहे हैं।समाजवादी पार्टी के लिए भी PDA 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दा है। ऐसे में पार्टी के भीतर से आने वाली किसी भी नाराजगी को राजनीतिक नजरिए से देखा जाना स्वाभाविक है।
अब पार्टी नेतृत्व के जवाब का इंतजार
फिलहाल इस मामले में अनुराधा कठेरिया का बयान सामने आया है, जिसमें उन्होंने अपने साथ कथित व्यवहार पर नाराजगी जताई है और पार्टी नेतृत्व से सवाल किया है। उनके आरोपों पर समाजवादी पार्टी या अखिलेश यादव की आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आने के बाद ही तस्वीर और स्पष्ट होगी।राजनीति में आरोप और जवाब दोनों महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए इस पूरे मामले में संबंधित पक्षों का पक्ष सामने आना जरूरी है।एक तरफ समाजवादी पार्टी PDA के जरिए पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों को राजनीतिक रूप से जोड़ने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी तरफ पार्टी से जुड़ी एक दलित महिला नेता का मंच और सम्मान को लेकर सवाल उठाना संगठन के लिए गंभीर आत्ममंथन का विषय बन सकता है।अब बड़ा सवाल यही है कि क्या समाजवादी पार्टी नेतृत्व अनुराधा कठेरिया की नाराजगी पर जवाब देगा और संगठन के भीतर जमीनी दलित महिला कार्यकर्ताओं के सम्मान को लेकर कोई स्पष्ट संदेश देगा? आने वाले दिनों में पार्टी की प्रतिक्रिया से यह साफ होगा कि इस विवाद को संगठन किस तरह संभालता है।
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