1885: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना – आज़ादी की लड़ाई की सबसे बड़ी शुरुआत

Editorial
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भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में वर्ष 1885 एक ऐतिहासिक पड़ाव माना जाता है। यही वह वर्ष था जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Indian National Congress) की स्थापना हुई। उस समय शायद किसी ने भी यह नहीं सोचा था कि यह संगठन आगे चलकर अंग्रेज़ी साम्राज्य की सबसे बड़ी चुनौती बन जाएगा और भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का सबसे शक्तिशाली मंच बनेगा।28 दिसंबर 1885 को मुंबई (तत्कालीन बंबई) के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज में कांग्रेस का पहला अधिवेशन आयोजित हुआ। इस अधिवेशन में देश के विभिन्न हिस्सों से आए 72 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इसकी अध्यक्षता प्रसिद्ध वकील व्योमेश चंद्र बनर्जी (डब्ल्यू.सी. बनर्जी) ने की।

कांग्रेस की स्थापना क्यों हुई?

19वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में भारत अंग्रेजों के अधीन था। भारतीयों को शासन में बहुत कम अधिकार दिए जाते थे। प्रशासन, न्याय व्यवस्था और सरकारी नौकरियों में अंग्रेजों का ही दबदबा था। भारतीयों के साथ भेदभाव आम बात थी।ऐसे समय में एक ऐसे राष्ट्रीय मंच की जरूरत महसूस की गई, जहां देश के अलग-अलग हिस्सों के शिक्षित और जागरूक लोग एकजुट होकर अपनी समस्याओं को सरकार के सामने रख सकें। इसी सोच के साथ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का जन्म हुआ।

ए.ओ. ह्यूम की अहम भूमिका

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना का श्रेय ब्रिटिश अधिकारी एलन ऑक्टेवियन ह्यूम (A.O. Hume) को दिया जाता है। ह्यूम भारतीय समाज की परिस्थितियों को अच्छी तरह समझते थे। उनका मानना था कि यदि भारतीयों को अपनी बात रखने का लोकतांत्रिक मंच नहीं मिला तो भविष्य में व्यापक असंतोष हिंसक रूप ले सकता है।उन्होंने भारत के प्रमुख बुद्धिजीवियों और नेताओं को एक मंच पर लाने का प्रयास किया। इसी पहल का परिणाम था भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना।हालांकि कांग्रेस केवल ए.ओ. ह्यूम की संस्था नहीं थी। इसमें दादाभाई नौरोजी, फिरोजशाह मेहता, बदरुद्दीन तैयबजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, आनंद मोहन बोस और कई भारतीय नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

पहला अधिवेशन और ऐतिहासिक शुरुआत

28 दिसंबर 1885 को कांग्रेस का पहला अधिवेशन आयोजित हुआ।इस अधिवेशन में कुल 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।पहले अध्यक्ष बने व्योमेश चंद्र बनर्जी।यह पहली बार था जब देश के अलग-अलग प्रांतों के लोग एक राष्ट्रीय मंच पर इकट्ठा हुए और पूरे भारत के हितों की बात की।

कांग्रेस के शुरुआती उद्देश्य

शुरुआत में कांग्रेस का उद्देश्य अंग्रेजों से सीधी लड़ाई नहीं था। उसके मुख्य लक्ष्य थे—

  • भारतीयों को राजनीतिक रूप से जागरूक बनाना।
  • विभिन्न प्रांतों के लोगों को एक मंच पर लाना।
  • सरकार तक भारतीयों की समस्याएं पहुंचाना।
  • प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाना।
  • संवैधानिक और शांतिपूर्ण तरीकों से सुधारों की मांग करना।

उस समय कांग्रेस के नेताओं को उदारवादी (Moderates) कहा जाता था।

धीरे-धीरे बदली कांग्रेस की भूमिका

समय के साथ अंग्रेजों का रवैया और कठोर होता गया। भारतीयों की मांगों को लगातार नजरअंदाज किया जाने लगा।इसके बाद कांग्रेस के भीतर एक नया विचार उभरा।बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल जैसे नेताओं ने अधिक आक्रामक आंदोलन की शुरुआत की।यहीं से कांग्रेस केवल सुधार मांगने वाला संगठन नहीं रही, बल्कि स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाला राष्ट्रीय आंदोलन बन गई।

महात्मा गांधी के आने से आया बड़ा बदलाव

1915 में महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे।इसके बाद कांग्रेस का स्वरूप पूरी तरह बदल गया।गांधी जी ने कांग्रेस को गांव-गांव तक पहुंचाया और आम जनता को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ दिया।

उनके नेतृत्व में कांग्रेस ने कई ऐतिहासिक आंदोलन चलाए—

  • असहयोग आंदोलन (1920)
  • नमक सत्याग्रह (1930)
  • सविनय अवज्ञा आंदोलन
  • भारत छोड़ो आंदोलन (1942)

इन आंदोलनों ने अंग्रेजी शासन की नींव हिला दी।

देश के महान नेताओं का मंच बनी कांग्रेस

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने देश को अनेक महान नेता दिए।इन्हीं नेताओं ने भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई को नई दिशा दी।

इनमें प्रमुख थे—

  • महात्मा गांधी
  • पंडित जवाहरलाल नेहरू
  • सरदार वल्लभभाई पटेल
  • मौलाना अबुल कलाम आजाद
  • डॉ. राजेंद्र प्रसाद
  • सुभाष चंद्र बोस (कुछ समय तक कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे)
  • गोपाल कृष्ण गोखले
  • बाल गंगाधर तिलक

इन नेताओं ने अपने-अपने तरीके से देश की आजादी में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

कांग्रेस और आज़ादी की निर्णायक लड़ाई

1942 का भारत छोड़ो आंदोलन स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा जनआंदोलन साबित हुआ।”करो या मरो” के नारे ने पूरे देश में नई ऊर्जा भर दी।लाखों लोग जेल गए।हजारों लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी।लगातार बढ़ते जनदबाव और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कमजोर हो चुके ब्रिटेन को अंततः भारत छोड़ना पड़ा।15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ।

स्वतंत्र भारत में कांग्रेस की भूमिका

आज़ादी के बाद कांग्रेस देश की पहली सत्तारूढ़ पार्टी बनी।पंडित जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री बने।इसके बाद कई दशकों तक कांग्रेस भारतीय राजनीति की सबसे प्रभावशाली पार्टी रही।देश के संविधान के लागू होने, लोकतंत्र की स्थापना, पंचवर्षीय योजनाओं, सार्वजनिक संस्थानों की स्थापना और औद्योगिक विकास में कांग्रेस सरकारों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

इतिहास में कांग्रेस का महत्व

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस केवल एक राजनीतिक दल नहीं थी।यह भारत की राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बनी।इसने देश के अलग-अलग धर्म, भाषा, जाति और क्षेत्रों के लोगों को एक सूत्र में बांधने का काम किया।कांग्रेस ने भारतीयों को यह एहसास कराया कि वे केवल अलग-अलग प्रांतों के निवासी नहीं, बल्कि एक राष्ट्र के नागरिक हैं।1885 में स्थापित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारत के इतिहास की दिशा बदल दी। ए.ओ. ह्यूम की पहल से शुरू हुआ यह संगठन आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत बना। महात्मा गांधी, नेहरू, पटेल, तिलक और सुभाष बोस जैसे नेताओं के नेतृत्व में कांग्रेस ने अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी और करोड़ों भारतीयों को आज़ादी की लड़ाई में एकजुट किया।आज कांग्रेस का राजनीतिक स्वरूप समय के साथ बदल चुका है, लेकिन भारतीय इतिहास में उसकी भूमिका हमेशा याद रखी जाएगी। यह वही संगठन है जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को संगठित दिशा दी, राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया और अंततः देश को आज़ादी की मंजिल तक पहुंचाने में ऐतिहासिक योगदान दिया।

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