उत्तराखंड में जलवायु परिवर्तन का महाअलार्म! सूख रहे जलस्रोत, खत्म हो रही खेती, बढ़ता पलायन… 1700 गांव हुए वीरान

Editorial
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उत्तराखंड का हिमालय आज उस दौर से गुजर रहा है, जहां प्रकृति का संतुलन तेजी से बिगड़ता दिखाई दे रहा है। कभी बर्फ से ढकी रहने वाली चोटियां अब तेजी से अपना हिमावरण खो रही हैं। पहाड़ों के जीवन की धड़कन माने जाने वाले प्राकृतिक जलस्रोत सूख रहे हैं, खेत बंजर होते जा रहे हैं और गांव खाली हो रहे हैं। बदलते मौसम ने न केवल पर्यावरण बल्कि पहाड़ की पूरी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था को गहरे संकट में डाल दिया है।मिजोरम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विश्वंभर प्रसाद सती द्वारा किए गए हालिया अध्ययन ने उत्तराखंड के मध्य हिमालयी क्षेत्र की ऐसी तस्वीर पेश की है, जिसने वैज्ञानिकों के साथ-साथ नीति निर्माताओं की चिंता भी बढ़ा दी है। अध्ययन के अनुसार जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का खतरा नहीं, बल्कि वर्तमान की सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है।

20 प्रतिशत से ज्यादा आबादी ने छोड़ा गांव, 1700 से अधिक गांव हुए वीरान

रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा असर ग्रामीण जीवन पर दिखाई दे रहा है। खेती और बागवानी लगातार कमजोर होने से रोजगार के अवसर खत्म होते जा रहे हैं। यही वजह है कि उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों से 20 प्रतिशत से अधिक आबादी पलायन कर चुकी है।स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि राज्य में 1700 से अधिक गांव भुतहा (वीरान) हो चुके हैं। जिन गांवों में कभी बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं, वहां अब ताले लगे मकान और खाली खेत नजर आते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में पलायन का संकट और गहरा सकता है।

सूख रहे हैं पहाड़ों के जलस्रोत, गहराता जा रहा जल संकट

उत्तराखंड के हजारों गांव आज भी पारंपरिक प्राकृतिक जलस्रोतों पर निर्भर हैं। लेकिन अध्ययन में सामने आया है कि ये जलस्रोत तेजी से सूख रहे हैं।भूमि के बंजर होने और वर्षा जल के जमीन में पर्याप्त मात्रा में नहीं समाने के कारण भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। इसका सीधा असर पेयजल उपलब्धता पर पड़ रहा है। कई इलाकों में लोगों को पीने के पानी के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ रही है।विशेषज्ञों का कहना है कि यदि वर्षाजल संरक्षण और जल पुनर्भरण पर तत्काल प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में उत्तराखंड के कई हिस्सों में गंभीर जल संकट पैदा हो सकता है।

खत्म हो रही पारंपरिक खेती, बदल रहा पहाड़ का कृषि नक्शा

जलवायु परिवर्तन का असर खेती पर भी साफ दिखाई दे रहा है। तापमान बढ़ने और मौसम के असंतुलित होने से कई पारंपरिक फसलें या तो पूरी तरह समाप्त हो चुकी हैं या विलुप्ति के कगार पर पहुंच गई हैं।पहाड़ों की पहचान रही मोटे अनाज की खेती लगातार घट रही है, जिससे खाद्य सुरक्षा पर भी खतरा मंडरा रहा है। वहीं कभी निचले हिमालयी क्षेत्रों की शान माने जाने वाले सेब और खट्टे फलों के बाग अब लगभग खत्म होने लगे हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जलवायु परिवर्तन की यही रफ्तार जारी रही तो आने वाले समय में पहाड़ की पारंपरिक कृषि व्यवस्था पूरी तरह बदल सकती है।

चीड़ के जंगल बढ़े, बांज के जंगल सिकुड़े

अध्ययन में वनस्पति संरचना में भी बड़े बदलाव सामने आए हैं। बढ़ते तापमान के कारण चीड़ के जंगल तेजी से ऊंचाई वाले क्षेत्रों की ओर फैल रहे हैं, जबकि पर्यावरणीय दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण बांज (ओक) के जंगल लगातार सिकुड़ रहे हैं।पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार बांज के जंगल जल संरक्षण और जैव विविधता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। इनके कम होने से जलस्रोतों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास भी प्रभावित होता है।

तेजी से पिघल रहे ग्लेशियर, खतरे में नदियों का भविष्य

रिपोर्ट के मुताबिक पिछले तीन दशकों में हिमालय के हिमावरण में भारी कमी दर्ज की गई है। ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और इसका सीधा असर गंगा की प्रमुख सहायक नदियों के जल प्रवाह पर पड़ रहा है।विशेष रूप से अलकनंदा और भागीरथी घाटियों में स्थिति अधिक चिंताजनक बताई गई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि ग्लेशियरों का पिघलना इसी गति से जारी रहा तो भविष्य में जल उपलब्धता के साथ-साथ करोड़ों लोगों की जल सुरक्षा पर भी असर पड़ सकता है।

बदलता मानसून बना आपदाओं की बड़ी वजह

उत्तराखंड में मानसून का स्वरूप भी तेजी से बदल रहा है। पहले जहां बारिश कई दिनों तक सामान्य रूप से होती थी, वहीं अब बहुत कम समय में अत्यधिक बारिश हो रही है।इस बदलाव के कारण बादल फटना, फ्लैश फ्लड, भूस्खलन और हिमनद झील फटने (GLOF) जैसी घटनाओं में तेजी आई है।अध्ययन के अनुसार वर्ष 2020 से 2022 के बीच उत्तराखंड में 200 से अधिक प्राकृतिक आपदाएं दर्ज की गईं। लगातार बढ़ती इन घटनाओं ने पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के जीवन और आजीविका दोनों को खतरे में डाल दिया है।

वनाग्नि भी बन रही बड़ी चुनौती

बढ़ते तापमान और लंबे शुष्क मौसम के कारण जंगलों में आग लगने की घटनाएं भी लगातार बढ़ रही हैं। वनाग्नि केवल जंगलों को ही नुकसान नहीं पहुंचा रही, बल्कि वन्यजीवों, जैव विविधता और स्थानीय जलवायु पर भी गंभीर असर डाल रही है।विशेषज्ञों का कहना है कि यदि वन प्रबंधन, जल संरक्षण और हरित आवरण बढ़ाने की दिशा में प्रभावी रणनीति नहीं बनाई गई तो आने वाले वर्षों में हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है।

विशेषज्ञों की चेतावनी—अब नहीं संभले तो भविष्य होगा भयावह

जलवायु वैज्ञानिकों का मानना है कि हिमालय विश्व के सबसे संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में से एक है। यहां तापमान में मामूली वृद्धि भी बड़े पर्यावरणीय बदलाव ला सकती है।विशेषज्ञों ने सरकार और समाज दोनों से अपील की है कि जल संरक्षण, वनों का संरक्षण, सतत कृषि, वैज्ञानिक विकास योजनाओं और जलवायु अनुकूल नीतियों को प्राथमिकता दी जाए। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो उत्तराखंड ही नहीं, पूरे हिमालयी क्षेत्र को आने वाले वर्षों में जल संकट, खाद्य संकट, बड़े पैमाने पर पलायन और विनाशकारी प्राकृतिक आपदाओं जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।हिमालय केवल पहाड़ नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन, जल और भविष्य का आधार है। यदि हिमालय सुरक्षित रहेगा, तभी उत्तराखंड और पूरे उत्तर भारत की जल, पर्यावरण और जीवन सुरक्षा सुनिश्चित हो सकेगी।

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