नोएडा के इन वीरों ने आजादी के लिए झेली जेल और यातनाएं, किसी ने काला पानी तो किसी ने चीन की कैद सही

Editorial
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नोएडा देश आज 80वां स्वतंत्रता दिवस पूरे उत्साह और गर्व के साथ मना रहा है। तिरंगे के सम्मान और आजादी के जश्न के बीच उन स्वतंत्रता सेनानियों और वीर जवानों को याद करना भी जरूरी है, जिन्होंने देश के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। नोएडा से जुड़ी कई ऐसी गुमनाम और प्रेरणादायी कहानियां हैं, जिनमें किसी ने अंग्रेजों की जेल में वर्षों बिताए, किसी ने भारत छोड़ो आंदोलन में गिरफ्तारी दी तो किसी ने युद्ध के दौरान दुश्मन की कैद और प्रताड़ना झेली। इन वीरों की कहानी आज भी नई पीढ़ी को देशप्रेम, साहस और त्याग का संदेश देती है।

पिथौरागढ़ में आजादी की अलख जगाने वाले गंगा दत्त शर्मा

नोएडा के सेक्टर-137 स्थित सुपरटेक इकोसिटी निवासी और सरकारी स्कूल की पूर्व प्रधानाचार्य एवं सेवानिवृत्त एनसीसी मेजर सरोज जोशी हर साल स्वतंत्रता दिवस पर अपने पिता गंगा दत्त शर्मा को याद करती हैं। उनके पिता ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान पिथौरागढ़ के सीमांत क्षेत्र में लोगों के बीच आजादी की भावना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।गंगा दत्त शर्मा वर्ष 1939 में कांग्रेस से जुड़े और 1940 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य बने। वर्ष 1942 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में चले भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने सक्रिय भागीदारी की। आंदोलन के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और छह महीने की कठोर सजा भुगतनी पड़ी।सरोज जोशी के अनुसार, उनके पिता ने जेल और संघर्ष के बावजूद देशभक्ति का रास्ता नहीं छोड़ा। उन्होंने भी अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाते हुए युवतियों को सेना के लिए तैयार करने और उनमें अनुशासन व राष्ट्रसेवा की भावना विकसित करने का काम किया।

विष्णु शरण दुबलिश ने करीब 20 साल जेल में बिताए

नोएडा के सेक्टर-105 में रहने वाला एक परिवार आज भी अपने पूर्वज क्रांतिकारी विष्णु शरण दुबलिश के संघर्ष को गर्व से याद करता है। मेरठ के मवाना में जन्मे विष्णु शरण दुबलिश का नाम काकोरी कांड से जुड़े क्रांतिकारियों में लिया जाता है।परिवार के अनुसार, उन्हें गिरफ्तार कर करीब 20 वर्षों तक जेल में रखा गया। अंग्रेजी शासन के दौरान उन्हें कठोर परिस्थितियों और यातनाओं का सामना करना पड़ा, लेकिन उनका हौसला कभी नहीं टूटा। जेल में क्रांतिकारियों के बीच उनकी मजबूत पकड़ और लोकप्रियता से अंग्रेज अधिकारी भी परेशान रहते थे।बताया जाता है कि एक बार जेलर विलियमसन ने गुस्से में उन पर राइफल तानने तक की कोशिश की, लेकिन दुबलिश अपने विचारों और संकल्प से पीछे नहीं हटे। उनका आत्मविश्वास इतना मजबूत था कि वे खुद को और अपने साथियों को प्रेरित करते हुए कहा करते थे कि “हम लोहे के चने हैं।”उनकी कहानी बताती है कि आजादी केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं थी, बल्कि इसके पीछे हजारों लोगों का वर्षों का त्याग और अटूट साहस भी था।

चीन की कैद में एक साल रहे इंद्रजीत सिंह

नोएडा के सेक्टर-49 बरौला निवासी राज सिंह के पिता इंद्रजीत सिंह भारतीय सेना में थे। उन्होंने भारत-पाकिस्तान युद्ध में हिस्सा लेने के साथ वर्ष 1962 में चीन के खिलाफ युद्ध में भी मोर्चा संभाला।1962 के युद्ध के दौरान चीनी सैनिकों ने उन्हें बंदी बना लिया। करीब एक वर्ष तक उन्हें कैद में रहना पड़ा। परिवार के अनुसार, इस दौरान उन्हें बेहद कठिन परिस्थितियों और प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। बाद में दोनों देशों के बीच हुए समझौते के बाद उन्हें रिहा किया गया।राज सिंह बताते हैं कि उनके पिता बचपन में उन्हें युद्ध के दिनों की कठिनाइयों और अपने अनुभवों के बारे में बताया करते थे। उनके लिए देश की सेवा जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य था।

बंटवारे की भयावह यादें आज भी हैं ताजा

नोएडा से जुड़े दर्शन लाल वोहरा की कहानी आजादी के साथ हुए भारत विभाजन की पीड़ा को भी सामने लाती है। रावलपिंडी से हरिद्वार पहुंचे दर्शन लाल वोहरा उस समय काफी छोटे थे। परिवार के साथ भारत आते समय उन्होंने रास्ते में हिंसा और आगजनी के भयावह दृश्य देखे।उन्होंने बताया कि ट्रेन से सफर के दौरान कई जगह घरों में आग लगी दिखाई देती थी। विभाजन की घटनाओं ने उनके बाल मन पर गहरा असर डाला। बाद में उनका परिवार बुलंदशहर क्षेत्र में बस गया और समय के साथ नोएडा से जुड़ गया।उनकी कहानी केवल विस्थापन की नहीं, बल्कि उस पीढ़ी के संघर्ष की कहानी है जिसने विभाजन की त्रासदी के बीच नए भारत में अपने जीवन की शुरुआत की।

लाल सिंह ने अंग्रेजी सेना छोड़कर आजाद हिंद फौज का साथ दिया

नोएडा के सेक्टर-61 से जुड़ी एक और प्रेरणादायी कहानी लाल सिंह की है। परिवार के मुताबिक, वह कभी अंग्रेजी सेना में रहे थे, लेकिन बाद में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व वाली आजाद हिंद फौज (INA) से जुड़ गए और अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष में योगदान दिया।द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान आजाद हिंद फौज के साथ उन्होंने सेवाएं दीं। देश की आजादी के बाद वह भारत लौटे और आगे का जीवन यहीं बिताया। वर्ष 2008 में उनका निधन हुआ, लेकिन परिवार आज भी उनकी देशभक्ति और साहस को याद करता है।

आजादी का जश्न, बलिदान को याद करने का भी अवसर

स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगा फहराते समय हम अक्सर आजादी को एक उत्सव के रूप में देखते हैं, लेकिन इसके पीछे अनगिनत संघर्षों की लंबी कहानी है। नोएडा के स्वतंत्रता सेनानियों और वीर जवानों की ये कहानियां याद दिलाती हैं कि देश की आजादी और सुरक्षा के लिए लोगों ने जेल, यातना, युद्ध और विस्थापन तक सहा।आज जब भारत विकास और नए भविष्य की ओर बढ़ रहा है, ऐसे वीरों की गाथाएं नई पीढ़ी को यह समझाने का काम करती हैं कि स्वतंत्रता केवल अधिकार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी है। 80वें स्वतंत्रता दिवस पर इन सभी वीरों को नमन करना ही उनके त्याग के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।

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