मल्लिकार्जुन मंदिर:आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम में विराजते हैं भगवान शिव, जानें 12 ज्योतिर्लिंगों में क्यों खास है यह मंदिर

Editorial
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दक्षिण भारत की आध्यात्मिक धरती पर स्थित श्रीशैलम का मल्लिकार्जुन मंदिर भगवान शिव के प्रमुख तीर्थस्थलों में गिना जाता है। नल्लमाला की पहाड़ियों के बीच स्थित यह पवित्र धाम धार्मिक आस्था, प्राचीन परंपराओं, इतिहास और प्राकृतिक सुंदरता का अनोखा संगम है। यहां भगवान शिव मल्लिकार्जुन स्वामी और देवी पार्वती भ्रमराम्बिका देवी के रूप में पूजित हैं।श्रीशैलम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग और देवी शक्ति का स्वरूप एक ही तीर्थ परिसर में विद्यमान है। श्रीशैल देवस्थानम के अनुसार मल्लिकार्जुन स्वामी 12 ज्योतिर्लिंगों में शामिल हैं, जबकि भ्रमराम्बिका देवी को 18 महाशक्ति पीठों में स्थान प्राप्त है।

श्रीशैलम का मल्लिकार्जुन मंदिर कहां है?

मल्लिकार्जुन मंदिर आंध्र प्रदेश के नंद्याल जिले में स्थित श्रीशैलम में है। यह क्षेत्र नल्लमाला की पहाड़ियों से घिरा हुआ है और अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ धार्मिक महत्व के लिए भी प्रसिद्ध है। श्रीशैल देवस्थानम के अनुसार श्रीशैलम को प्राचीन काल से ही अत्यंत पवित्र तीर्थ माना जाता रहा है।श्रीशैलम को अलग-अलग कालखंडों में श्रीगिरि, श्रीपर्वत और श्रीनगम जैसे नामों से भी जाना गया है। धार्मिक परंपरा में इसे धरती का कैलास कहा जाता है।

12 ज्योतिर्लिंगों में मल्लिकार्जुन का विशेष स्थान

हिंदू धर्म में भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों का विशेष महत्व माना जाता है। श्रीशैलम में भगवान शिव मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हैं।श्रीशैल देवस्थानम की आधिकारिक जानकारी के अनुसार मल्लिकार्जुन स्वामी ज्योतिर्लिंग के साथ इसी परिसर में भ्रमराम्बिका देवी का शक्तिस्वरूप भी प्रतिष्ठित है। यही विशेषता श्रीशैलम को अन्य प्रमुख शिव तीर्थों से अलग पहचान देती है।यहां श्रद्धालु भगवान मल्लिकार्जुन के दर्शन के बाद देवी भ्रमराम्बिका के दर्शन करते हैं। इस तरह एक ही तीर्थ परिसर में शिव और शक्ति की आराधना का अवसर मिलता है।

मल्लिकार्जुन नाम के पीछे क्या है कहानी?

मल्लिकार्जुन नाम से जुड़ी धार्मिक मान्यता भी बेहद रोचक है। श्रीशैल देवस्थानम की परंपरा के अनुसार भगवान शिव ने श्रीशैलम में ज्योतिर्लिंग स्वरूप में निवास किया। एक धार्मिक कथा में भगवान शिव के अर्जुन वृक्ष और चमेली की बेल से जुड़े स्वरूप का उल्लेख मिलता है।एक अन्य कथा भक्त चंद्रावती से जुड़ी है। मंदिर की आधिकारिक जानकारी के अनुसार चंद्रावती भगवान शिव की भक्त थीं और उन्होंने भगवान को मल्लिका यानी चमेली के फूलों की माला अर्पित की। इसी धार्मिक परंपरा से भगवान के मल्लिकार्जुन नाम की व्याख्या की जाती है।यह कथा भक्त और भगवान के बीच अटूट आस्था तथा समर्पण का प्रतीक मानी जाती है।

माता भ्रमराम्बिका का मंदिर क्यों है खास?

श्रीशैलम में भगवान मल्लिकार्जुन के साथ देवी भ्रमराम्बिका की पूजा होती है। मंदिर की आधिकारिक जानकारी के अनुसार भ्रमराम्बिका देवी को 18 महाशक्ति पीठों में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।यही कारण है कि श्रीशैलम को शिव और शक्ति दोनों की उपासना का प्रमुख केंद्र माना जाता है। धार्मिक दृष्टि से यहां भगवान शिव और देवी पार्वती की संयुक्त उपस्थिति इस तीर्थ की विशेष पहचान है।श्रद्धालुओं के लिए यह स्थान केवल एक शिव मंदिर नहीं, बल्कि शक्ति उपासना का भी महत्वपूर्ण केंद्र है।

मंदिर का इतिहास भी है बेहद समृद्ध

श्रीशैलम का इतिहास कई शताब्दियों में फैला हुआ है। श्रीशैल देवस्थानम के अनुसार यहां सातवाहन काल से जुड़े शिलालेखीय प्रमाण मिलते हैं। इसके बाद इक्ष्वाकु, काकतीय, रेड्डी और विजयनगर जैसे राजवंशों ने भी श्रीशैलम के विकास में योगदान दिया।विजयनगर साम्राज्य के दौर में श्रीशैलम को विशेष संरक्षण मिला। मंदिर परिसर में कई मंडप और स्थापत्य संरचनाएं विभिन्न शासकों के संरक्षण से विकसित हुईं। श्रीशैल देवस्थानम की जानकारी में विजयनगर शासक श्रीकृष्णदेवराय और उनके प्रशासन से जुड़े निर्माण कार्यों का भी उल्लेख मिलता है।मराठा शासक छत्रपति शिवाजी का नाम भी श्रीशैलम की धार्मिक परंपरा और इतिहास से जुड़ा हुआ है। मंदिर की आधिकारिक जानकारी के अनुसार उत्तरी गोपुरम के निर्माण से उनका संबंध बताया जाता है।

मंदिर की वास्तुकला और प्रमुख आकर्षण

मल्लिकार्जुन मंदिर अपनी धार्मिक महत्ता के साथ स्थापत्य के लिए भी जाना जाता है। मंदिर परिसर में विशाल मंडप, नक्काशीदार स्तंभ और विभिन्न देवी-देवताओं के मंदिर मौजूद हैं।श्रीशैल देवस्थानम की आधिकारिक सूची में मल्लिकार्जुन स्वामी के अलावा गणपति, वीरभद्र स्वामी, पांडव लिंग, उमामहेश्वर स्वामी, वृद्ध मल्लिकार्जुन और अन्य कई धार्मिक स्थलों का उल्लेख है। परिसर में भ्रमराम्बिका देवी सहित विभिन्न शक्ति स्वरूपों की भी पूजा होती है।मंदिर परिसर के आसपास कई पवित्र स्थल और जलकुंड भी धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

श्रीशैलम में दर्शन का अनुभव

श्रीशैलम पहुंचने वाले श्रद्धालु भगवान मल्लिकार्जुन और माता भ्रमराम्बिका के दर्शन करते हैं। मंदिर प्रशासन श्रद्धालुओं के लिए अलग-अलग दर्शन व्यवस्थाएं उपलब्ध कराता है।श्रीशैल देवस्थानम के अनुसार सामान्य दर्शन की सुविधा निशुल्क उपलब्ध है। मंदिर प्रशासन की जानकारी में विशेष दर्शन की व्यवस्था का भी उल्लेख है। दर्शन से संबंधित नियम और समय समय-समय पर बदल सकते हैं, इसलिए यात्रा से पहले मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट पर ताजा जानकारी देखना बेहतर रहता है।मंदिर प्रशासन की ओर से श्रद्धालुओं के लिए प्रसाद और अन्नप्रसाद की व्यवस्था भी की जाती है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार अन्नप्रसाद वितरण प्रतिदिन किया जाता है।

श्रीशैलम में और क्या है खास?

श्रीशैलम केवल मल्लिकार्जुन मंदिर तक सीमित नहीं है। यहां कई अन्य धार्मिक और प्राकृतिक स्थल भी श्रद्धालुओं तथा पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। मंदिर परिसर में साक्षी गणपति जैसे प्रमुख धार्मिक स्थल भी हैं।श्रीशैलम की भौगोलिक स्थिति भी इसे खास बनाती है। नल्लमाला की पहाड़ियों और आसपास का प्राकृतिक वातावरण इस धार्मिक यात्रा को अलग अनुभव देता है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए धार्मिक आस्था के साथ प्रकृति का सान्निध्य भी आकर्षण का केंद्र रहता है।

श्रीशैलम को क्यों कहा जाता है ‘धरती का कैलास’?

श्रीशैल देवस्थानम के अनुसार श्रीशैल महाक्षेत्र को ‘धरती का कैलास’ माना जाता है। धार्मिक परंपरा में यहां भगवान शिव के निवास का विशेष महत्व बताया गया है। अनेक संतों, आध्यात्मिक व्यक्तित्वों और राजाओं के श्रीशैलम आने का उल्लेख मंदिर के इतिहास में मिलता है।इसी वजह से सदियों से देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु यहां भगवान मल्लिकार्जुन और माता भ्रमराम्बिका के दर्शन के लिए आते रहे हैं।

यात्रा से पहले इन बातों का रखें ध्यान

अगर आप मल्लिकार्जुन मंदिर श्रीशैलम की यात्रा की योजना बना रहे हैं तो दर्शन के समय, विशेष पूजा, आवास, प्रवेश व्यवस्था और अन्य नियमों की ताजा जानकारी मंदिर प्रशासन के आधिकारिक पोर्टल से जरूर जांच लें। मंदिर प्रशासन ऑनलाइन सेवाओं और दर्शन से जुड़ी सुविधाएं भी उपलब्ध कराता है।धार्मिक स्थल पर स्थानीय परंपराओं और मंदिर प्रशासन के नियमों का सम्मान करना भी जरूरी है।

“श्रीशैलशृंगे विबुधातिसंगे तुलालद्रितुंगेऽपि मुदा वसंतम।
तमर्जुनं मल्लिकार्जुनमेकं नमामि संसारसमुद्रसेतुम॥”

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