कौशिकी अमावस्या पर कालीघाट पहुंचे मुख्यमंत्री
कौशिकी अमावस्या के अवसर पर कालीघाट मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन हुआ। इसी दौरान मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी मंदिर पहुंचे और मां काली के दर्शन किए। उन्होंने विधि-विधान से पूजा की और देवी को विभिन्न पूजन सामग्री अर्पित की।पूजा के बाद उन्होंने मंदिर में तैयार किए गए पारंपरिक भोग को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया। रिपोर्टों के अनुसार इस भोग में मछली फ्राई, मछली का सिर और बासंती पुलाव शामिल था। मुख्यमंत्री ने जमीन पर बैठकर प्रसाद ग्रहण किया।कालीघाट मंदिर में मछली का भोग बंगाल की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ा माना जाता है। इसी वजह से कौशिकी अमावस्या के दिन मुख्यमंत्री द्वारा मछली का प्रसाद ग्रहण करने को लेकर सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई।
क्या है बागेश्वर बाबा का विवाद?
दरअसल, यह पूरा विवाद बागेश्वर धाम के प्रमुख धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की हालिया टिप्पणी से जुड़ा है। रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहारी भोजन करने को लेकर सवाल उठाए थे और मांसाहार करने वालों पर टिप्पणी की थी। उनके बयान के बाद बंगाल में राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आईं।बंगाल की खान-पान संस्कृति में मछली का विशेष स्थान है। धार्मिक परंपराओं और स्थानीय रीति-रिवाजों के संदर्भ में भी मछली से जुड़े भोग की परंपरा कई स्थानों पर देखने को मिलती है। ऐसे में धीरेंद्र शास्त्री की टिप्पणी को लेकर बंगाल की संस्कृति और खान-पान की परंपरा का मुद्दा भी बहस के केंद्र में आ गया।
कालीघाट से क्या संदेश?
मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी का कालीघाट मंदिर पहुंचना और मछली का प्रसाद ग्रहण करना महज धार्मिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा। राजनीतिक विश्लेषण में इसे मौजूदा विवाद के बीच बंगाल की स्थानीय धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं के संदर्भ में देखा जा रहा है। कुछ रिपोर्टों ने इसे बंगाली हिंदू मतदाताओं तक राजनीतिक संदेश के तौर पर भी देखा है।मुख्यमंत्री की ओर से मंदिर में प्रसाद ग्रहण करना एक धार्मिक परंपरा का हिस्सा बताया जा सकता है। इसे सीधे तौर पर किसी राजनीतिक व्यक्ति के बयान का जवाब मानना भी उचित नहीं होगा। इसके बावजूद मौजूदा विवाद के कारण इस घटनाक्रम ने राजनीतिक महत्व जरूर हासिल कर लिया है।
सुवेंदु अधिकारी ने धीरेंद्र शास्त्री के बयान पर क्या कहा?
इस विवाद के बीच मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के बयान पर भी प्रतिक्रिया दी है। रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने कहा कि किसी संत या धार्मिक व्यक्ति को अपनी राय रखने का अधिकार है और लोग उनकी बात को स्वीकार करें या न करें, यह उनका अपना निर्णय है। मुख्यमंत्री ने धीरेंद्र शास्त्री की तस्वीर जलाए जाने की घटना पर भी कड़ा रुख अपनाया। रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने ऐसी घटनाओं में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए।इससे साफ है कि विवाद केवल खान-पान तक सीमित नहीं है, बल्कि अब यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक परंपराओं और बंगाल की सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ता जा रहा है।
बंगाल में मछली और धार्मिक परंपरा का सवाल
बंगाल की संस्कृति में मछली केवल भोजन नहीं बल्कि कई सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं का हिस्सा भी है। काली पूजा और कालीघाट जैसे धार्मिक स्थलों से जुड़ी कुछ परंपराओं में मछली और अन्य भोग का उल्लेख मिलता है।कौशिकी अमावस्या पर कालीघाट मंदिर में पूजा के बाद मछली का प्रसाद ग्रहण करने की घटना ने इसी सांस्कृतिक पहलू को फिर चर्चा में ला दिया है। एक तरफ जहां धीरेंद्र शास्त्री का बयान मांसाहारी भोजन को लेकर बहस छेड़ चुका है, वहीं दूसरी तरफ कालीघाट की परंपरा और मुख्यमंत्री का प्रसाद ग्रहण करना बंगाल की अलग धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान को सामने रख रहा है।
चुनावी राजनीति में भी दिख सकता है असर
पश्चिम बंगाल की राजनीति में धर्म और संस्कृति पहले से ही महत्वपूर्ण मुद्दे रहे हैं। ऐसे में बागेश्वर बाबा की टिप्पणी और उसके बाद मुख्यमंत्री का कालीघाट मंदिर जाना राजनीतिक दृष्टि से भी अहम माना जा रहा है।भाजपा और अन्य राजनीतिक दलों के नेता बंगाल की धार्मिक पहचान, सनातन परंपराओं और स्थानीय संस्कृति को लेकर लगातार अपनी-अपनी बात रखते रहे हैं। अब मांसाहार और धार्मिक आस्था का यह विवाद भी इसी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है।फिलहाल कालीघाट मंदिर में मुख्यमंत्री द्वारा पूजा और मछली का प्रसाद ग्रहण करने की तस्वीरें चर्चा में हैं। वहीं, धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की टिप्पणी पर राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का दौर भी जारी है। आने वाले दिनों में यह विवाद बंगाल की राजनीति और सांस्कृतिक बहस में किस दिशा में जाता है, इस पर सभी की नजर रहेगी।
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