क्यों हो रही है महिलाये हैवानियत का शिकार ?

Editorial
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लेखक:मणि दीप मिश्रा

कुछ बात है जो हस्ती मिटती,  नहीं हमारी सदियों रहा है |

दुश्मन दौर- ए – जहां  हमारा  यूनान ,मिश्र ,रोमा  सब मिट गए जहा से बाकि है मगर अब तक हिंदोस्ता हमारा||

                                                                                                                                                   ( मो . इकबाल “तराना-ए-हिंदी”)

 जो की  हमारे महान  भारत देश  के अपने सामने खड़े शत्रु के समक्ष ना झुकने  का दृणसंकल्प को दर्शाती है  आज हमारे भारत देश को अंग्रेजो के चंगुल से आजाद हुए 80  वर्ष हो चुके है | भारत  ने बाहरी शत्रुओ से तो  आजादी हासिल  करली  परन्तु  आतंरिक शत्रुओ शायद अभी तक  नहीं  हो पाया है | जी हां आज भी  हमारे भारत देश मे महलाये सुरक्षित  नहीं है |एक समय था जब महिलाओ  को लेकर हमारे  महान  भारत देश का इतिहास  अलग ही रहा है|

“भारतीय संस्कृति में नारी को सिर्फ एक स्त्री नहीं, बल्कि शक्ति और देवी के रूप में देखा गया है। दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती और काली जैसे देवी स्वरूपों में स्त्री शक्ति की पूजा की जाती है। ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता’ जैसी प्रसिद्ध उक्ति भी नारी के सम्मान को महत्वपूर्ण मानती है। लेकिन इतिहास का दूसरा पक्ष यह भी है कि धार्मिक सम्मान और महिलाओं को मिले वास्तविक सामाजिक अधिकार हमेशा एक जैसे नहीं रहे।”

अगर कहा जाए तो  नारी सम्मान  मे  भारतीय इतिहास की एक अलग रूप रेखा है वैदिक साहित्य में गार्गी और मैत्रेयी जैसी महिलाओं का उल्लेख मिलता है। गार्गी का दार्शनिक संवादों में भाग लेना और मैत्रेयी का ज्ञान को लेकर संवाद इस बात के उदाहरण हैं कि कुछ महिलाओं को बौद्धिक और धार्मिक जीवन में स्थान प्राप्त था। हालांकि, इसे उस समय की हर महिला की स्थिति नहीं माना जा सकता। क्योकि प्रत्येक काल मे  महिलाओ ने एक समय के साथ भारतीय समाज के कई हिस्सों में महिलाओं की स्वतंत्रता और शिक्षा पर प्रतिबंध बढ़े। बाल विवाह, पर्दा, विधवाओं की कठिन सामाजिक स्थिति और सती जैसी प्रथाएं महिलाओं के जीवन को प्रभावित करती थीं। इन प्रथाओं का प्रभाव पूरे भारत में एक जैसा नहीं था और अलग-अलग क्षेत्रों व समुदायों में स्थितियां अलग थीं।

अगर मध्यकाल की बात करे  तो इस  दौर में रज़िया सुल्तान, रानी दुर्गावती और अहिल्याबाई होल्कर जैसी महिलाओं ने सत्ता और प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यानी सामाजिक प्रतिबंधों के बावजूद महिलाओं के नेतृत्व के उदाहरण मौजूद रहे |  हमारे महान भारत  की आजादी में भी महिलाओ  का योगदान भी काफी सराहनीय  रहा है  स्वतंत्रता आंदोलन ने भी बड़ी संख्या में महिलाओं को सार्वजनिक और राजनीतिक गतिविधियों में आने का अवसर दिया। सरोजिनी नायडू, कस्तूरबा गांधी, अरुणा आसफ अली और उषा मेहता जैसी महिलाओं ने आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई| 1950 में लागू संविधान ने महिलाओं को कानूनी समानता और भेदभाव से सुरक्षा का संवैधानिक आधार दिया। इसके बाद महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और राजनीति में भागीदारी बढ़ी। अब आप लोग सोच रहे है की जब बात महिलाओ  के सुरक्षा की हो रही है थो यह  सारि  बात बताने का मतलब क्या है  तो  इसका उत्तर बड़े ही आसान शब्दों मे  उन  घटिया सोच वाले लोगो को देना चाहूंगा  जो आज भी महिलाओ को  सम्म्मान की नज़रो से नहीं बल्कि हैवानियत  और तुच्छ नज़रो से देखते  आ रहे है |  अगर  गौर किया जाए थो हमारे भारत देश के संविधान  में  महिलाओ   की सुरक्षाओं के लिए   36   कानूनी  प्रावधान है  पर इतने कानून  लौ होने के बावजूद भी आज भी महिलाये हैवानियत  का शिकार  हो रही है |  और हम लोग क्या कर  रहे है , बस कोई भी घटना होती थी  तो  इंस्टाग्राम और फेसबुक पर रील चलाएंगे  और  आवाज़ उठाने  की बजाये  हाथ में  मोमबती  को लेकर आपस मे  गुट  बनाकर गुस्सा निकलते है  और फिर घर जा कर अपने अपने  काम मे  लग जाते है  और सोचते है हमारा फ़र्ज़ खत्म शायद यही कारण  है  कि  16  दिसंबर 2012  को हुए निर्भया रेप  कांड  मे  पीड़िता  निर्भया को  इन्साफ पाने में  8 वर्ष  का समय  लगा| उस पीड़िता को जिसे  हमारे देश ने देश की बेटी का पद   दिया था | फिर भी यह हैवानियत का सिलसिला रुका नहीं |

बल्कि आज भी अभी हमारे  महान भारत देश  मे  कोई न कोई महिला किसी के हैवानियत  का शिकार हो जाती है , और इसका शिकार मात्र महिलाये नहीं बल्कि  3 – 4  वर्ष  की  छोटी छोटी बच्चियाँ  अपने घर  में  सुरक्षित नहीं है  इसका विशेष कारन कई मामले मे घरवालो   की लापरवाही  जो अपने गृहकार्य  मे  या ऑफिस के काम मे  इतना व्यस्त रहते है की अपने बच्चों को  गुड़ टच  बैड टच तक सीखने का समय नहीं है और कई मामलो मे  समाज के वो  समझदार लोग  भी आते  है  जो किसी महिला के साथ गलत होता देख सिर्फ  यह सोच कर आगे नहीं आते क्यों की वो पुलिस के मामले  मेँ  पड़ना नहीं चाहते , कुछ लोग इसलिए नहीं आगे आते क्योकि वो वीडियो बना रहे होते है  क्योकि उन्हें सोशल मीडिया  के लिए कंटेंट मिलता है और कुछ समझदार लोगो को इससे मतलब  ही नहीं  होता है इसलिए वो आगे  नहीं आते  जिससे समाज बड़ी समझदारी से अपराध को बढ़ावा देता हैं  | अगर कहा जाए  तो इस बात झुठलाया नहीं  जा सकता  है की  कुछ महिलाये ऐसी भी है जो अपने अधिकारों का गलत फायदा उठती है इसका परिणाम यह है की आज भी  कई बेक़सूर लड़के  इसके चपेट में  आज भी सजा काट रहे है  बात यह है की इसके कारण  वो महिलाये इसका शिकार बन जाती है जिनके साथ  वास्तविक में   अपराध हुआ  है|   समाज से हार मानने के बाद जब वो घर आती है तो  सोचती है  की उनका परिवार उनका साथ देगा  थो सहारा या ताकत बनने की बजाये  वो परिवार  उस पीड़िता  को चुप  रहने को और  पुलिस  के पास शिकायत करने से रोकता है  मै  तो कभी कबार यह सोच कर  हैरान रहता हूँ  हम उस भारत के वासी है जहा  एक समय ऐसा  था की एक महिला के सम्म्मान के लिए भाई अपने ही भाइयो  से लड़ पड़े जिसे हम सब महाभारत के नाम से जानते है  और आज का यह समाज महिला से साथ गलत होता देख या हैवानियत होता देख बड़ी बेशर्मी से मुँह मोड़ लेते है|पता नहीं वो दिन कब आएगा हमारे देश में  जब हमरे देश मे  महिलाओ को पुनः सम्मान की दृष्टि से देखा जाएगा आखिर सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बलात्कार के बाद दोषी को सजा कब मिलेगी।

असली सवाल यह है कि ऐसी घटनाएं बार-बार क्यों हो रही हैं और उन्हें रोकने के लिए समाज और व्यवस्था क्या कर रही है?

महिलाओं की सुरक्षा केवल कानून की किताबों में लिखे प्रावधानों से सुनिश्चित नहीं होगी। जरूरत है कि कानून का डर जमीन पर दिखाई दे, जांच निष्पक्ष और प्रभावी हो, पीड़िता की आवाज को दबाने के बजाय सुना जाए और उस सोच को चुनौती दी जाए जो महिलाओं की स्वतंत्रता और समानता को कमतर समझती है। किसी महिला के कपड़े, उसका समय, उसका व्यवहार या उसका किसी के साथ होना—किसी भी परिस्थिति में अपराध का कारण या औचित्य नहीं हो सकता। जिम्मेदारी हमेशा अपराध करने वाले की है। इसलिए बदलाव की शुरुआत सिर्फ अदालत से नहीं, घर, स्कूल, समाज और हमारी सोच से भी होनी होगी। महिलाओं की सुरक्षा कोई एहसान नहीं, उनका अधिकार है।अब समय है कि हम केवल घटनाओं पर दुख जताकर चुप न रहें। आवाज उठाएं, पीड़ित का साथ दें, गलत सोच का विरोध करें और कानून के प्रभावी पालन की मांग करें। हर व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी निभाए—तभी ऐसा समाज बनेगा जहां बेटियां और महिलाएं डर के साए में नहीं, बल्कि सम्मान, स्वतंत्रता और सुरक्षा के साथ जी सकेंगी।

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