मिल्कीपुर में बाबा गोरखनाथ की सियासी पहचान बरकरार

Editorial
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अयोध्या की सुरक्षित विधानसभा सीट मिल्कीपुर उत्तर प्रदेश की उन सीटों में शामिल है, जहां पिछले कुछ विधानसभा चुनावों में भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच मुकाबला देखने को मिला है। इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में भाजपा नेता बाबा गोरखनाथ का नाम भी मिल्कीपुर की राजनीति में लगातार चर्चा में रहा है। 2017 में भाजपा के टिकट पर विधानसभा चुनाव जीतने वाले बाबा गोरखनाथ 2022 में समाजवादी पार्टी के अवधेश प्रसाद से चुनाव हार गए। इसके बावजूद क्षेत्र में उनकी सक्रियता और समर्थकों के बीच संपर्क की चर्चा बनी हुई है।2025 के मिल्कीपुर उपचुनाव में भाजपा ने बाबा गोरखनाथ की जगह चंद्रभानु पासवान को उम्मीदवार बनाया। चंद्रभानु पासवान ने समाजवादी पार्टी के अजीत प्रसाद को 61,710 वोटों के अंतर से हराकर सीट भाजपा के खाते में वापस ला दी। अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मिल्कीपुर में भाजपा की राजनीति और संभावित दावेदारों को लेकर चर्चाएं फिर तेज हो रही हैं।

2017 में पहली बार विधानसभा पहुंचे बाबा गोरखनाथ

बाबा गोरखनाथ ने 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर मिल्कीपुर सीट से चुनाव लड़ा था। उस चुनाव में उन्होंने समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता अवधेश प्रसाद को 28,276 वोटों के अंतर से हराया था। चुनाव में बाबा गोरखनाथ को 86,960 वोट मिले, जबकि अवधेश प्रसाद को 58,684 वोट प्राप्त हुए थे।2017 की यह जीत बाबा गोरखनाथ के राजनीतिक सफर का महत्वपूर्ण पड़ाव रही। जीत के बाद वह पहली बार विधानसभा पहुंचे और मिल्कीपुर क्षेत्र में भाजपा के प्रमुख चेहरों में शामिल हो गए।

मिल्कीपुर में बाबा गोरखनाथ की सियासी पहचान बरकरार
मिल्कीपुर में बाबा गोरखनाथ की सियासी पहचान बरकरार

2022 में बदला चुनावी समीकरण

2017 के बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में मिल्कीपुर में एक बार फिर बाबा गोरखनाथ और अवधेश प्रसाद आमने-सामने थे। इस बार चुनावी नतीजा बदल गया। समाजवादी पार्टी के अवधेश प्रसाद ने बाबा गोरखनाथ को 13,338 वोटों के अंतर से हराया।अवधेश प्रसाद को 1,03,905 वोट मिले, जबकि भाजपा के बाबा गोरखनाथ को 90,567 वोट प्राप्त हुए। इस परिणाम के साथ मिल्कीपुर सीट एक बार फिर समाजवादी पार्टी के खाते में चली गई।चुनावी हार के बाद भी बाबा गोरखनाथ की क्षेत्रीय गतिविधियां पूरी तरह समाप्त नहीं हुईं। उनके समर्थकों का कहना है कि वह लगातार लोगों के संपर्क में रहते हैं और क्षेत्र से जुड़े मुद्दों को संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।

अवधेश प्रसाद के सांसद बनने के बाद खाली हुई सीट

2024 के लोकसभा चुनाव में अवधेश प्रसाद फैजाबाद लोकसभा सीट से निर्वाचित हुए। इसके बाद मिल्कीपुर विधानसभा सीट रिक्त हुई और फरवरी 2025 में उपचुनाव कराया गया।इस उपचुनाव में भाजपा ने बाबा गोरखनाथ को उम्मीदवार नहीं बनाया। पार्टी ने चंद्रभानु पासवान को मैदान में उतारा, जबकि समाजवादी पार्टी ने अवधेश प्रसाद के बेटे अजीत प्रसाद को प्रत्याशी बनाया। चुनाव परिणाम में चंद्रभानु पासवान ने 1,46,397 वोट हासिल किए और अजीत प्रसाद को 84,687 वोट मिले। जीत का अंतर 61,710 वोट रहा।

उपचुनाव में टिकट नहीं मिला, फिर भी चर्चा में नाम

2025 के उपचुनाव में टिकट नहीं मिलने के बावजूद बाबा गोरखनाथ का नाम मिल्कीपुर की राजनीति में चर्चा से बाहर नहीं हुआ। उनके समर्थक क्षेत्र में उनके पुराने संपर्क और राजनीतिक गतिविधियों का उल्लेख करते हैं।मिल्कीपुर जैसी सुरक्षित विधानसभा सीट पर स्थानीय संगठन, कार्यकर्ताओं के साथ संपर्क और क्षेत्रीय मुद्दों को लेकर सक्रियता चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ऐसे में बाबा गोरखनाथ की क्षेत्र में मौजूदगी को लेकर राजनीतिक चर्चाएं समय-समय पर सामने आती रही हैं।2027 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की ओर से उम्मीदवार कौन होगा, इसे लेकर अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। इसलिए बाबा गोरखनाथ की संभावित उम्मीदवारी को फिलहाल राजनीतिक चर्चा के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

मिल्कीपुर में लगातार बदलते रहे चुनावी नतीजे

मिल्कीपुर के हालिया चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो यहां पिछले कुछ चुनावों में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच मुकाबला बदलता रहा है। 2012 में समाजवादी पार्टी के अवधेश प्रसाद ने जीत दर्ज की थी। 2017 में भाजपा के बाबा गोरखनाथ विजयी रहे। 2022 में अवधेश प्रसाद ने फिर सीट पर कब्जा किया और 2025 के उपचुनाव में भाजपा के चंद्रभानु पासवान ने जीत हासिल की।इन परिणामों से यह स्पष्ट है कि मिल्कीपुर में अलग-अलग चुनावों में मतदाताओं का समर्थन अलग-अलग दलों और उम्मीदवारों की ओर गया है। यही वजह है कि 2027 के चुनाव से पहले इस सीट पर राजनीतिक गतिविधियों और संभावित उम्मीदवारों को लेकर चर्चा बनी हुई है।

क्षेत्र में जनसंपर्क पर समर्थकों का जोर

बाबा गोरखनाथ के समर्थकों के अनुसार, चुनाव हारने के बाद भी उन्होंने क्षेत्र से संपर्क बनाए रखा। उनके आवास पर आने वाले लोगों की समस्याएं सुनने और उन्हें संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाने का प्रयास किए जाने का दावा किया जाता है।स्थानीय राजनीति में किसी नेता की सक्रियता को केवल चुनावी नतीजों से नहीं, बल्कि क्षेत्र में उसके संपर्क और संगठनात्मक गतिविधियों से भी जोड़ा जाता है। हालांकि, इन दावों का स्वतंत्र मूल्यांकन स्थानीय स्तर पर उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड और गतिविधियों के आधार पर ही किया जा सकता है।

2027 से पहले मिल्कीपुर की राजनीति पर नजर

2027 के विधानसभा चुनाव में अभी समय है, लेकिन मिल्कीपुर को लेकर राजनीतिक गतिविधियों पर नजर बनी हुई है। 2025 के उपचुनाव में भाजपा की बड़ी जीत के बाद पार्टी संगठन की स्थिति पर भी चर्चा हुई है। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी के लिए भी यह सीट महत्वपूर्ण बनी हुई है।ऐसे राजनीतिक माहौल में बाबा गोरखनाथ की क्षेत्रीय सक्रियता और उनका पुराना चुनावी रिकॉर्ड उन्हें मिल्कीपुर की राजनीति में एक चर्चित नाम बनाए हुए है। हालांकि, आगामी विधानसभा चुनाव में उनकी भूमिका क्या होगी, यह भाजपा के संगठनात्मक फैसलों और उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगा।फिलहाल इतना जरूर है कि 2017 की जीत, 2022 की हार और 2025 में टिकट नहीं मिलने के बावजूद बाबा गोरखनाथ का नाम मिल्कीपुर की सियासी चर्चा में बना हुआ है। अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले क्षेत्र की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ती है और भाजपा की ओर से उम्मीदवार चयन में किन नामों पर विचार होता है, इस पर सभी की नजर रहेगी।

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