नई दिल्ली IDBI बैंक की हिस्सेदारी बिक्री को लेकर देश की राजनीति में एक बार फिर बहस तेज हो गई है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने केंद्र सरकार के फैसले पर सवाल उठाते हुए बैंक के कर्मचारियों को अपना समर्थन दिया है। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक धन से बने संस्थान जनता के होते हैं और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को केवल संपत्ति की तरह बेचने का फैसला नहीं किया जाना चाहिए। राहुल गांधी ने कर्मचारियों के नाम एक पत्र साझा करते हुए कहा कि वह उनके संघर्ष में उनके साथ खड़े हैं।राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी पोस्ट में कांग्रेस और मोदी सरकार के कार्यकाल की तुलना करते हुए केंद्र पर निशाना साधा। उन्होंने लिखा कि कांग्रेस के समय में देश के उद्योगों को मजबूत करने के लिए IDBI की स्थापना हुई, जबकि मौजूदा सरकार के समय बैंक बेचे जा रहे हैं। उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब केंद्र सरकार IDBI बैंक में अपनी और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) की बड़ी हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया आगे बढ़ा रही है।

कर्मचारियों को पत्र लिखकर जताया समर्थन
राहुल गांधी ने 29 अक्टूबर को IDBI बैंक के कर्मचारियों के नाम एक पत्र साझा किया। इसमें उन्होंने पिछले साल मार्च में संसद भवन में बैंक कर्मचारियों के एक प्रतिनिधिमंडल से हुई मुलाकात का जिक्र किया। राहुल के मुताबिक, कर्मचारियों ने उनसे सवाल किया था कि जिस बैंक को उन्होंने मेहनत से घाटे से निकालकर मुनाफे की स्थिति में पहुंचाया, सरकार उसे बेचने की तैयारी क्यों कर रही है।राहुल गांधी ने कहा कि कर्मचारियों की इस चिंता को उन्होंने लोकसभा में भी उठाया था। उन्होंने सरकार से पूछा था कि एक मुनाफे में चल रहे सार्वजनिक बैंक को बेचने की जरूरत क्या है और इसके कर्मचारियों तथा जमाकर्ताओं के हितों की सुरक्षा किस तरह सुनिश्चित की जाएगी। राहुल ने आरोप लगाया कि सरकार की ओर से उन्हें इन सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं मिला।उन्होंने कर्मचारियों को भरोसा दिलाया कि उनकी जायज मांगों और अधिकारों की लड़ाई में कांग्रेस उनके साथ खड़ी रहेगी।

Fairfax को बेची जानी है 60.72 फीसदी हिस्सेदारी
IDBI बैंक की प्रस्तावित रणनीतिक बिक्री के तहत केंद्र सरकार और LIC मिलकर बैंक की कुल 60.72 फीसदी हिस्सेदारी बेचने जा रहे हैं। इस सौदे में केंद्र सरकार अपनी 30.48 फीसदी हिस्सेदारी और LIC अपनी 30.24 फीसदी हिस्सेदारी बेचने की योजना पर आगे बढ़ रही है। खरीदार के रूप में कनाडा की वित्तीय सेवा कंपनी Fairfax Financial Holdings का नाम सामने आया है।केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 14 अक्टूबर को इस रणनीतिक बिक्री को मंजूरी दी थी। प्रस्तावित सौदे का मूल्य करीब 52,878 करोड़ रुपये बताया गया है। इस प्रक्रिया के पूरा होने पर बैंक का प्रबंधन नियंत्रण भी नए निवेशक के पास जा सकता है।यही मुद्दा अब राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है। राहुल गांधी का कहना है कि सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि बैंक की हिस्सेदारी बेचने से कर्मचारियों, ग्राहकों और जमाकर्ताओं के हित किस तरह सुरक्षित रहेंगे।

बैंक के मुनाफे का हवाला देकर सरकार से सवाल
राहुल गांधी ने अपने पत्र में IDBI बैंक की वित्तीय स्थिति में आए बदलाव का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि करीब सात साल पहले बैंक घाटे में था, लेकिन कर्मचारियों की मेहनत से उसने दोबारा मजबूत स्थिति हासिल की। राहुल के मुताबिक, पिछले वित्त वर्ष में बैंक ने 9,000 करोड़ रुपये से अधिक का मुनाफा कमाया।उन्होंने इस बदलाव का श्रेय बैंक के कर्मचारियों को देते हुए सवाल उठाया कि जब किसी सार्वजनिक बैंक की स्थिति सुधर रही है और वह मुनाफा कमा रहा है, तो उसे निजी हाथों में सौंपने की जरूरत क्यों पड़ रही है।राहुल गांधी ने यह भी कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक केवल कारोबार करने वाली संस्थाएं नहीं हैं, बल्कि देश के आर्थिक विकास और आम लोगों को बैंकिंग सुविधाएं उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
आरक्षण और कर्मचारियों की सेवा शर्तों पर जताई चिंता
IDBI बैंक की हिस्सेदारी बिक्री का विरोध करते हुए राहुल गांधी ने कर्मचारियों के भविष्य को लेकर कई आशंकाएं जताई हैं। उन्होंने कहा कि निजी स्वामित्व आने के बाद अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों के लिए आरक्षण से जुड़े प्रावधान प्रभावित हो सकते हैं।उन्होंने कर्मचारियों की सेवा शर्तों को लेकर भी चिंता जाहिर की। राहुल का तर्क है कि निजीकरण के बाद कर्मचारियों को मिलने वाली संस्थागत सुरक्षा कमजोर पड़ सकती है। हालांकि, आरक्षण और सेवा शर्तों पर पड़ने वाले वास्तविक प्रभाव को लेकर अंतिम स्थिति संबंधित कानूनी प्रावधानों, कर्मचारियों की सेवा शर्तों और सौदे की शर्तों से स्पष्ट होगी।राहुल गांधी ने अपने पत्र में कहा कि कांग्रेस मजबूत सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र, दोनों की भूमिका में विश्वास करती है। सार्वजनिक बैंक देश के निर्माण में अहम भूमिका निभाते हैं और उन्हें केवल बिक्री योग्य संपत्ति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
2003 के आश्वासन का भी किया जिक्र
राहुल गांधी ने अपने पत्र में वर्ष 2003 में संसद में दिए गए एक आश्वासन का भी उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि उस समय सरकार ने IDBI बैंक में कम से कम 51 फीसदी हिस्सेदारी बनाए रखने की बात कही थी।राहुल ने कहा कि भले ही यह आश्वासन कानून में दर्ज न हो, लेकिन संसद में किया गया वादा जनता के प्रति जवाबदेही से जुड़ा होता है। उन्होंने मौजूदा हिस्सेदारी बिक्री के फैसले को इसी संदर्भ में सवालों के घेरे में रखा है।
राजनीतिक बहस तेज, कर्मचारियों की मांगों पर नजर
IDBI बैंक की हिस्सेदारी बिक्री को लेकर बैंक कर्मचारियों और संगठनों की चिंताएं पहले से सामने आती रही हैं। अब राहुल गांधी के समर्थन के बाद यह मुद्दा राजनीतिक रूप से भी चर्चा में आ गया है। कांग्रेस इसे सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों और कर्मचारियों के अधिकारों से जुड़ा मामला बता रही है।दूसरी ओर, केंद्र सरकार की रणनीतिक बिक्री प्रक्रिया का उद्देश्य बैंक में हिस्सेदारी बेचकर प्रबंधन नियंत्रण नए निवेशक को सौंपना है। इस फैसले को लेकर कर्मचारियों के हित, बैंक की भविष्य की कार्यप्रणाली और ग्राहकों की सुरक्षा जैसे सवाल अहम बने हुए हैं।फिलहाल राहुल गांधी के बयान ने IDBI बैंक के प्रस्तावित निजीकरण को लेकर राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि सरकार कर्मचारियों की चिंताओं पर क्या जवाब देती है और प्रस्तावित सौदे की शर्तों में उनके हितों की सुरक्षा के लिए क्या प्रावधान किए जाते हैं।
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