MP दूषित पानी मामला: NGT ने बनाई 6 सदस्यीय समिति

Digital Desk
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मध्य प्रदेश में दूषित पेयजल से हो रही मौतों और सीवेज मिले पानी की आपूर्ति को गंभीर मानते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने कड़ा रुख अपनाया है। NGT की सेंट्रल जोन बेंच ने इस पूरे मामले की जांच के लिए 6 सदस्यीय विशेष समिति (स्पेशल-6) का गठन किया है। ट्रिब्यूनल ने समिति को 6 हफ्तों के भीतर विस्तृत रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है।

यह मामला केवल मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश सहित देश के कई राज्यों के लिए चेतावनी माना जा रहा है, जहां शहरी इलाकों में सीवेज और पीने के पानी की लाइनें पास-पास होने के कारण ऐसे खतरे बने रहते हैं।

क्या है पूरा मामला?

मध्य प्रदेश के कई शहरों में बीते समय से यह शिकायतें सामने आ रही थीं कि पीने के पानी में सीवेज मिल रहा है, जिससे लोग बीमार पड़ रहे हैं और कुछ मामलों में मौतें भी हुई हैं। स्थानीय लोगों की शिकायतों और मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर मामला NGT तक पहुंचा।

NGT ने इसे जनस्वास्थ्य से जुड़ा बेहद गंभीर मुद्दा मानते हुए स्वतः संज्ञान लिया और राज्य प्रशासन, नगर निगम तथा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की भूमिका पर सवाल खड़े किए।

NGT की सेंट्रल जोन बेंच का सख्त रुख

 दूषित पानी को बताया “मानव जीवन के लिए गंभीर खतरा”

NGT की सेंट्रल जोन बेंच ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सीवेज मिला पेयजल मानव जीवन के लिए बड़ा खतरा है और यह संविधान के तहत नागरिकों को मिले स्वच्छ पर्यावरण और सुरक्षित जीवन के अधिकार का उल्लंघन है।

बेंच ने टिप्पणी की कि अगर समय रहते इस पर सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो हालात और बिगड़ सकते हैं और बीमारियों का प्रकोप बढ़ सकता है।

 6 सदस्यीय जांच समिति में कौन शामिल?

NGT द्वारा गठित ‘स्पेशल-6’ समिति में प्रशासनिक अधिकारियों, पर्यावरण विशेषज्ञों और तकनीकी जानकारों को शामिल किया गया है। समिति का काम होगा:

  • पानी की सप्लाई सिस्टम की जांच

  • सीवेज और पेयजल लाइनों की स्थिति का आकलन

  • दूषण के स्रोतों की पहचान

  • जिम्मेदार विभागों की भूमिका तय करना

  • नगर निगम और प्रदूषण बोर्ड कटघरे में

    लापरवाही पर उठे सवाल

    NGT ने इस मामले में नगर निगम और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सीधे तौर पर कटघरे में खड़ा किया है। ट्रिब्यूनल का कहना है कि इन संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि वे यह सुनिश्चित करें कि नागरिकों को स्वच्छ और सुरक्षित पानी मिले।

    बेंच ने पूछा कि अगर पानी की गुणवत्ता लंबे समय से खराब थी, तो समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की गई? क्या नियमित जांच और मॉनिटरिंग की व्यवस्था सही ढंग से लागू की जा रही थी?

     जवाबदेही तय करने के संकेत

    NGT ने साफ किया कि जांच रिपोर्ट के आधार पर जिम्मेदार अधिकारियों और संस्थाओं पर कार्रवाई हो सकती है। इसमें जुर्माना, सुधारात्मक निर्देश और यहां तक कि कानूनी कार्रवाई भी शामिल हो सकती है।

    6 हफ्ते में मांगी गई रिपोर्ट में क्या होगा शामिल?

    NGT ने समिति को निर्देश दिया है कि वह 6 हफ्तों के भीतर जो रिपोर्ट देगी, उसमें निम्न बिंदुओं को शामिल किया जाए:

    • किन इलाकों में पानी सबसे ज्यादा दूषित है

    • दूषण के पीछे तकनीकी या प्रशासनिक कारण

    • कितने लोग प्रभावित हुए और स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ा

    • भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने के लिए ठोस सुझाव

    यह रिपोर्ट आने के बाद NGT आगे के निर्देश जारी करेगा।

  • जनस्वास्थ्य पर गंभीर असर

     बीमारियों और मौतों का खतरा

    दूषित पानी से डायरिया, टाइफाइड, हैजा, पीलिया जैसी बीमारियां तेजी से फैलती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि कमजोर इम्युनिटी वाले लोग, बच्चे और बुजुर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं।

    मध्य प्रदेश में सामने आए मामलों ने यह साफ कर दिया है कि पानी की गुणवत्ता में थोड़ी सी भी लापरवाही जानलेवा साबित हो सकती है

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