लाशों के ढेर पर खड़ा विकास! हमीरपुर में बेतवा नदी पर बन रहा पुल बना मजदूरों की कब्र, ढह गया विशाल स्लैब, 6 की मौत से मचा कोहराम

Editorial
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हमीरपुर में बेतवा नदी की लहरों के बीच हुआ यह दिल दहला देने वाला हादसा प्रकृति की मार कम और सिस्टम की खूनी लापरवाही का सबूत ज्यादा है। मवई जार और कुरारा को आपस में जोड़ने के लिए सालों से करोड़ों की लागत से बन रहे इस पुल का एक विशालकाय स्लैब गुरुवार की काली रात में मौत का साया बनकर टूटा। रात के करीब तीन बजे, जब पूरी दुनिया गहरी नींद में सो रही थी, तब आसमान में कड़कती बिजली और मूसलाधार बारिश के बीच आए एक भयानक चक्रवाती तूफान ने तबाही की इबारत लिख दी। हवा की रफ्तार इतनी खौफनाक थी कि निर्माणाधीन पुल का भारी-भरकम कंक्रीट का ढांचा अपना संतुलन खो बैठा और ताश के पत्तों की तरह भरभराकर नीचे आ गिरा।

इस भयावह चीख-पुकार के बीच बांदा के रहने वाले लोकेंद्र निषाद, कुलदीप निषाद, सावंत यादव, सभाजीत और हमीरपुर के पुष्पेंद्र सिंह चौहान व राजेश पाल समेत छह बेकसूर मजदूरों की जिंदगियां हमेशा के लिए उस मलबे के नीचे दफन हो गईं। इन मजदूरों का कसूर सिर्फ इतना था कि वे दिनभर हाड़-तोड़ मेहनत करने के बाद उसी अधूरे स्लैब के नीचे सुस्ता रहे थे। उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि जिस पुल को वे अपने हाथों से सींच रहे हैं, वही एक दिन उनकी कब्र बन जाएगा। यह महज एक हादसा नहीं, बल्कि सीधे तौर पर सुरक्षा मानकों की धज्जियां उड़ाने का नतीजा है। मौसम विभाग की तरफ से भीषण आंधी-तूफान की सख्त चेतावनी जारी की गई थी, लेकिन इसके बावजूद कांट्रैक्टर और जिम्मेदार अधिकारियों ने मजदूरों को किसी सुरक्षित शेल्टर होम में भेजने के बजाय उसी मौत के साए के नीचे सोने के लिए मजबूर छोड़ दिया।

जब यह खौफनाक धमाका हुआ, तो चारों तरफ चीख-पुकार मच गई। पूरे जिले में पेड़ उखड़ चुके थे, बिजली के खंभे जमींदोज हो चुके थे और घने अंधेरे के बीच प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए। सूचना मिलते ही भारी पुलिस बल और एसडीआरएफ की टीमें क्रेन और कटर मशीनों के साथ मौके पर पहुंचीं। मलबे के भारी पत्थरों को हटाना किसी चुनौती से कम नहीं था, लेकिन इस खूनी मंजर के बीच जांबाज रेस्क्यू टीम ने अपनी जान पर खेलकर तीन मजदूरों को मौत के मुंह से खींच निकाला, जो पुल के पिलर पर जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे थे। अब प्रशासन ने इस मामले की लीपापोती के लिए जांच के आदेश तो दे दिए हैं, लेकिन असल सवाल वही खड़ा है कि आखिर इन छह मौतों का गुनाहगार कौन है? क्या चंद रुपयों के मुनाफे के लिए इन गरीब मजदूरों की जान की कोई कीमत नहीं समझी गई? इन उजड़े हुए परिवारों के बहते आंसू और बेबसी आज हमारे पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता पर एक गहरा और कभी न मिटने वाला तमाचा हैं।

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