देश के ज्यादातर हिस्से इन दिनों मानो किसी धधकती हुई भट्टी में तब्दील हो चुके हैं और आसमान से बरसती आग ने इंसानी जीवन को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है। सूर्य का रौद्र रूप और रिकॉर्ड तोड़ता तापमान सीधे तौर पर हीट स्ट्रोक और डिहाइड्रेशन के जोखिमों को चरम पर ले जा रहा है। देश के बड़े महानगरों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक के अस्पतालों से जो आंकड़े और जानकारियां सामने आ रही हैं, वे बेहद डराने वाली हैं। अस्पतालों के इमरजेंसी वार्ड इन दिनों लू लगने, तेज बुखार से तपने, अचानक अनियंत्रित होते ब्लड प्रेशर, चक्कर खाकर गिरने और पेट की गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीजों से खचाखच भरे पड़े हैं। इस भीषण और असहनीय गर्मी के साथ आसमान छूती ह्यूमिडिटी यानी हवा में नमी की भारी मात्रा हालात को सामान्य से कई गुना ज्यादा जानलेवा और अनियंत्रित बना रही है। जब अत्यधिक तापमान और नमी एक साथ मिलकर वायुमंडल पर हावी होते हैं, तो यह इंसानी शरीर के लिए एक बेहद घातक स्थिति बन जाती है। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार ऐसी स्थिति में इंसानी शरीर का प्राकृतिक कूलिंग सिस्टम यानी खुद को ठंडा रखने की स्वाभाविक प्रक्रिया पूरी तरह से फेल हो जाती है। आम तौर पर जब हमें गर्मी लगती है, तो शरीर पसीना बहाकर त्वचा के जरिए अंदरूनी तापमान को नियंत्रित करता है। लेकिन जब हवा में नमी यानी ह्यूमिडिटी का स्तर बहुत ज्यादा होता है, तो पसीना शरीर से बाहर तो निकलता है, लेकिन वह हवा में वाष्पित (Evaporate) नहीं हो पाता। जब पसीना सूखेगा ही नहीं, तो शरीर का अंदरूनी तापमान लगातार बढ़ता चला जाता है और थर्मल रेगुलेशन सिस्टम पूरी तरह ठप हो जाता है। यही वह खतरनाक स्थिति है जो आगे चलकर शरीर को भीतर से झुलसा देती है और देखते ही देखते इंसान हीट स्ट्रोक जैसी जानलेवा मेडिकल इमरजेंसी का शिकार हो जाता है। इस अदृश्य और भयानक खतरे से निपटने के लिए देश के तीन जाने-माने डॉक्टरों ने देशवासियों को एक ऐसी बहुत बड़ी भूल करने से कड़े शब्दों में सावधान किया है, जिसे अमूमन हर दूसरा इंसान अनजाने में रोज दोहरा रहा है।अक्सर गर्मियों का मौसम आते ही लोग सोचते हैं कि वे दिनभर में केवल सादा पानी पीते रहेंगे, तो खुद को सुरक्षित और हाइड्रेटेड रख पाएंगे। लेकिन देश के चोटी के डॉक्टरों ने इस आम धारणा को न सिर्फ पूरी तरह गलत ठहराया है, बल्कि इसे एक जानलेवा भूल भी करार दिया है। मुंबई की सुप्रसिद्ध इंटरनल मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. दिव्या गोपाल का इस विषय पर साफ कहना है कि तेज गर्मी और उमस के इस क्रूर दौर में सिर्फ और सिर्फ सादा पानी पीना शरीर को पूरी तरह सुरक्षित रखने के लिए काफी नहीं होता। जब बाहर का तापमान बहुत ज्यादा बढ़ जाता है और शरीर से लगातार बाल्टियों की तरह पसीना बहता है, तो पानी के साथ-साथ हमारे शरीर के भीतर मौजूद बेहद जरूरी मिनरल्स जैसे सोडियम, पोटैशियम, कैल्शियम और मैग्नीशियम भी बहुत तेजी से बाहर निकल जाते हैं। चिकित्सा की भाषा में इन सभी आवश्यक मिनरल्स को ‘इलेक्ट्रोलाइट्स’ कहा जाता है। ये इलेक्ट्रोलाइट्स हमारे शरीर के लिए किसी पावर ईंधन की तरह काम करते हैं। हमारी मांसपेशियों के संकुचन, दिल की धड़कन के सुचारू संचालन और नसों की कार्यप्रणाली को सही तरीके से चलाने में इन्हीं इलेक्ट्रोलाइट्स की मुख्य भूमिका होती है। इसके साथ ही, यह मिनरल्स शरीर की कोशिकाओं के भीतर पानी का सही संतुलन और दबाव बनाए रखते हैं।

डॉ. दिव्या गोपाल चेतावनी देते हुए कहती हैं कि अगर कोई व्यक्ति कड़ी धूप या पसीने से तर-बतर होने के बाद केवल सादा पानी गटकता रहता है, तो उसके शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स की भयंकर कमी हो जाती है। पानी तो शरीर में जाता है, लेकिन वह मिनरल्स के संतुलन को और ज्यादा पतला (Dilute) कर देता है। इसके परिणामस्वरूप, इंसान को अचानक बिना किसी काम के भी भयंकर शारीरिक थकान महसूस होने लगती है, मांसपेशियों में असहनीय और दर्दनाक ऐंठन होने लगती है, लगातार सिर फटने जैसा दर्द होता है, आंखों के सामने अंधेरा छाने लगता है और बार-बार पानी पीने के बावजूद प्यास बुझने का नाम नहीं लेती। डॉक्टर सलाह देती हैं कि इस जानलेवा स्थिति से बचने के लिए सादे पानी पर निर्भरता कम करें। तेज धूप से आने के बाद या दिन के समय ओआरएस (ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्यूशन), ताजे नींबू पानी में थोड़ा सा काला या साधारण नमक और चीनी मिलाकर पीना, प्राकृतिक नारियल पानी, पुदीने से युक्त छाछ या मट्ठा और पानी से भरपूर संतुलित भोजन को अपनी दैनिक दिनचर्या का अनिवार्य हिस्सा बनाना बेहद जरूरी है। शरीर में होने वाली डिहाइड्रेशन और इन जरूरी मिनरल्स की कमी का असर सिर्फ बाहरी तौर पर कमजोरी या चक्कर आने तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि यह शरीर के मुख्य अंदरूनी अंगों को पूरी तरह से डैमेज या फेल करने की खौफनाक ताकत रखता है। एक अन्य बड़े अस्पताल के इमरजेंसी मेडिकल सर्विसेज के प्रमुख डॉ. मुर्तजा एस बागवाला के मुताबिक, बहुत गर्म और उमस भरे मौसम में होने वाले डिहाइड्रेशन को अगर शुरुआती लक्षणों में ही पहचान कर ठीक न किया जाए, तो यह इंसान को सीधे आईसीयू के बेड पर पहुंचा सकता है। शरीर से सोडियम और पोटैशियम के अचानक कम होने का सीधा असर हमारे नर्वस सिस्टम यानी तंत्रिका तंत्र पर पड़ता है। इससे शरीर में गंभीर कमजोरी, ऊर्जा की भारी कमी और याददाश्त में धुंधलापन या किसी भी काम में ध्यान लगाने में भारी दिक्कत होने लगती है। सबसे खतरनाक बात यह है कि यह स्थिति शरीर के वैस्कुलर सिस्टम को प्रभावित करती है, जिससे अचानक ब्लड प्रेशर तेजी से गिर जाता है (लो बीपी)। ब्लड प्रेशर गिरते ही दिल उस कमी को पूरा करने के लिए असामान्य रूप से बहुत तेज धड़कने लगता है। ऐसी स्थिति में मस्तिष्क तक ऑक्सीजन और खून की सप्लाई कुछ सेकंड के लिए बाधित हो जाती है और इंसान चलते-चलते या खड़े-खड़े अचानक बेहोश होकर कंक्रीट के फर्श पर गिर जाता है, जिससे सिर में गंभीर चोट आने का खतरा भी बढ़ जाता है।

इस भयंकर और तपते मौसम में सबसे बड़ा और सीधा खतरा उन लोगों पर मंडरा रहा है जो पहले से ही किसी न किसी गंभीर और पुरानी बीमारी के शिकार हैं। इंटरनल मेडिसिन और मेटाबॉलिक स्पेशलिस्ट डॉ. विमल पाहुजा ने विशेष रूप से डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और दिल के मरीजों को इस मौसम में अतिरिक्त सतर्कता बरतने की सख्त हिदायत दी है। उनका कहना है कि इन बीमारियों से पीड़ित मरीजों के शरीर का मेटाबॉलिज्म पहले से ही संवेदनशील होता है। ऊपर से इन बीमारियों के नियंत्रण के लिए रोजाना खाई जाने वाली दवाइयां (विशेष रूप से बीपी की कुछ दवाइयां) अक्सर शरीर से पानी और मिनरल्स को बाहर निकालने का काम करती हैं ताकि ब्लड प्रेशर नियंत्रित रहे। लेकिन जब ऐसे मरीजों के शरीर से भीषण गर्मी और पसीने के रूप में बहुत ज्यादा तरल पदार्थ अचानक निकल जाते हैं, तो उनके शरीर में ‘ब्लड वॉल्यूम’ यानी नसों में दौड़ने वाले खून की कुल मात्रा खतरनाक स्तर तक घट जाती है। चिकित्सा विज्ञान में इस बेहद नाजुक और जानलेवा स्थिति को ‘हाइपोवोलेमिया’ (Hypovolemia) कहा जाता है। हाइपोवोलेमिया के कारण हाई बीपी और हार्ट के मरीजों में एक बेहद खतरनाक लक्षण देखा जाता है, जिसे ‘ऑर्थोस्टैटिक हाइपोटेंशन’ कहते हैं। इसमें मरीज जैसे ही सोकर या कुर्सी से उठकर खड़ा होता है, उसका ब्लड प्रेशर एकदम से शून्य की तरफ भागता है, उसे भयंकर चक्कर आते हैं और वह तत्काल बेहोश हो जाता है। सबसे भयानक बात यह है कि जब ब्लड वॉल्यूम घटता है, तो शरीर अपने बचाव के लिए खून की सप्लाई को केवल दिल और दिमाग की तरफ केंद्रित कर देता है, जिससे किडनी जैसे महत्वपूर्ण अंगों तक खून की सही और पर्याप्त मात्रा नहीं पहुंच पाती। खून और ऑक्सीजन न मिलने से किडनी की कोशिकाएं मरने लगती हैं, जिससे इंसान को ‘एक्यूट किडनी इंजरी’ या अचानक किडनी फेल्योर का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए इस तपते और जलते मौसम में सेहत को लेकर की गई एक छोटी सी लापरवाही या सिर्फ पानी पीकर काम चलाने की जिद आपकी जिंदगी पर बहुत भारी पड़ सकती है। स्वास्थ्य को सर्वोपरि रखते हुए डॉक्टरों की इन चेतावनियों को गंभीरता से लें और शरीर में पानी के साथ-साथ नमक और जरूरी मिनरल्स का संतुलन बनाए रखें।
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