
जगन्नाथ धाम पुरी की रथ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की सनातन संस्कृति, आस्था और परंपरा का ऐसा महापर्व है, जिसका इंतजार देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर के करोड़ों श्रद्धालु पूरे वर्ष करते हैं। ओडिशा के पवित्र नगर पुरी में आयोजित होने वाली भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा विश्व की सबसे भव्य और प्राचीन धार्मिक यात्राओं में गिनी जाती है। वर्ष 2026 में यह दिव्य उत्सव 16 जुलाई से शुरू होकर 24 जुलाई तक चलेगा। इस दौरान भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा अपने भव्य रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडीचा मंदिर तक की यात्रा करेंगे। इस अलौकिक दृश्य के दर्शन के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं। मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ स्वयं अपने भक्तों के बीच आने के लिए वर्ष में एक बार मंदिर से बाहर निकलते हैं। यही कारण है कि इस यात्रा को भगवान और भक्त के मिलन का महापर्व भी कहा जाता है। जब विशाल रथों की रस्सियों को खींचने के लिए लाखों हाथ एक साथ आगे बढ़ते हैं, तब पूरा पुरी नगर “जय जगन्नाथ” के जयघोष से गूंज उठता है। यह दृश्य न केवल आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है, बल्कि मानवता, समानता और भक्ति का अद्भुत संदेश भी देता है।

रथ यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण आकर्षण भगवान जगन्नाथ का विशाल रथ “नंदी घोष” होता है। यह लगभग 45 फीट ऊंचा रथ 16 विशाल पहियों पर खड़ा होता है। लाल और पीले रंगों से सुसज्जित यह रथ दूर से ही श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित करता है। पारंपरिक काष्ठ शिल्पकला से निर्मित इस रथ के निर्माण में लगभग 332 लकड़ी के टुकड़ों का उपयोग किया जाता है। इसकी विशेषता यह है कि इसके निर्माण में धातु की कीलों का प्रयोग नहीं किया जाता, बल्कि पारंपरिक तकनीकों के माध्यम से इसे तैयार किया जाता है। रथ के ऊपरी भाग पर हनुमान जी और भगवान नृसिंह के प्रतीक अंकित होते हैं, जो इसकी दिव्यता को और बढ़ा देते हैं। भगवान बलभद्र का रथ “तालध्वज” शक्ति, साहस और अनुशासन का प्रतीक माना जाता है। लगभग 44 फीट ऊंचे इस रथ में 14 विशाल पहिए होते हैं। नीले और हरे रंगों से सजा यह रथ यात्रा में सबसे आगे चलता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बलभद्र जी अग्रज होने के कारण मार्गदर्शन करते हैं, इसलिए उनका रथ सबसे पहले निकलता है। यह रथ श्रद्धालुओं को धर्म और कर्तव्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

देवी सुभद्रा का रथ “दर्पदलन” कहलाता है, जो सौम्यता, संतुलन और करुणा का प्रतीक है। लगभग 43 फीट ऊंचे इस रथ में 12 पहिए होते हैं। परंपरा के अनुसार यह रथ दोनों भाइयों के बीच चलता है। देवी सुभद्रा का यह स्वरूप परिवार, प्रेम और समरसता का संदेश देता है। काले और लाल रंगों से सजा यह रथ आध्यात्मिक रहस्य और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। रथ यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें जाति, धर्म, वर्ग और सामाजिक स्थिति का कोई भेदभाव नहीं होता। राजा से लेकर आम व्यक्ति तक सभी एक समान होकर भगवान के रथ की रस्सी खींचते हैं। यही कारण है कि यह उत्सव सामाजिक समरसता और समानता का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है। मान्यता है कि रथ की रस्सी खींचने से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग मिलता है। जो लोग किसी कारणवश रथ नहीं खींच पाते, वे केवल भगवान के दर्शन करके भी स्वयं को धन्य मानते हैं।
रथ यात्रा के पीछे कई पौराणिक कथाएं भी प्रचलित हैं। माना जाता है कि भगवान जगन्नाथ अपनी मौसी के घर यानी गुंडीचा मंदिर जाने के लिए यह यात्रा करते हैं। इस दौरान नौ दिनों तक तीनों देवता वहीं विराजमान रहते हैं। इसके बाद बहुदा यात्रा के माध्यम से वे पुनः अपने मूल मंदिर लौटते हैं। यह यात्रा भक्तों को भगवान के स्नेह और उनके सहज, मानवीय स्वरूप का अनुभव कराती है। इस भव्य आयोजन की तैयारियां कई महीने पहले ही शुरू हो जाती हैं। विशेष प्रकार की लकड़ियों से रथ बनाए जाते हैं और हर वर्ष नए रथों का निर्माण किया जाता है। हजारों कारीगर और सेवायत इस कार्य में जुटते हैं। रथ निर्माण की पूरी प्रक्रिया धार्मिक अनुष्ठानों और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच संपन्न होती है। यह परंपरा सदियों से बिना किसी बदलाव के चली आ रही है, जो भारतीय संस्कृति की जीवंतता का प्रमाण है। जगन्नाथ रथ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति, कला, शिल्प और मानव एकता का महाकुंभ है। यह उत्सव हमें सिखाता है कि ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग प्रेम, सेवा और समर्पण से होकर जाता है। वर्ष 2026 की यह पावन यात्रा भी करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए भक्ति, विश्वास और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्भुत अवसर लेकर आ रही है। जब पुरी की सड़कों पर तीनों भव्य रथ आगे बढ़ेंगे और लाखों भक्त उनके साथ कदम मिलाएंगे, तब एक बार फिर यह संदेश गूंजेगा कि भगवान जगन्नाथ केवल ओडिशा के नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के नाथ हैं।
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