क्यों बरसता है कहर बनकर पानी? जानिए पुराणों में क्या बताए गए हैं अतिवृष्टि के कारण

Editorial
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आज जब दुनिया के कई हिस्सों में रिकॉर्ड तोड़ बारिश, बाढ़ और प्राकृतिक आपदाएं देखने को मिल रही हैं, तब एक सवाल बार-बार उठता है कि आखिर प्रकृति इतना विकराल रूप क्यों धारण कर रही है? विज्ञान इसके पीछे जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरणीय असंतुलन को जिम्मेदार ठहराता है, लेकिन भारतीय धर्मग्रंथ और पुराण इस विषय को एक अलग दृष्टिकोण से देखते हैं। सनातन परंपरा में वर्षा केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि प्रकृति, धर्म और मानव कर्मों के बीच संतुलन का प्रतीक मानी गई है। यही कारण है कि अतिवृष्टि और अनावृष्टि को केवल मौसम की घटना नहीं, बल्कि एक चेतावनी और संदेश के रूप में भी देखा गया है। हिंदू धर्म में वर्षा के देवता इंद्र को माना गया है। मान्यता है कि जब इंद्र देव प्रसन्न होते हैं तो धरती पर समय पर और संतुलित वर्षा होती है। इससे खेती-बाड़ी फलती-फूलती है, नदियां जल से भर जाती हैं और जीवन में समृद्धि आती है। लेकिन जब प्रकृति का संतुलन बिगड़ता है या इंद्र देव क्रोधित होते हैं, तब अत्यधिक वर्षा, तूफान, बाढ़ और प्राकृतिक संकट उत्पन्न हो सकते हैं। इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण श्रीकृष्ण और गोवर्धन पर्वत की कथा में मिलता है, जहां इंद्र के क्रोध के कारण मूसलाधार वर्षा हुई थी और संपूर्ण ब्रज क्षेत्र जलमग्न होने लगा था।

धर्मग्रंथों के अनुसार प्रकृति और मानव जीवन एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। जब समाज में अधर्म, अन्याय, हिंसा, छल-कपट और पाप बढ़ने लगते हैं, तो उसका प्रभाव केवल सामाजिक व्यवस्था पर ही नहीं, बल्कि प्रकृति पर भी पड़ता है। श्रीमद्भागवत पुराण, मत्स्य पुराण और अन्य ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि जब मनुष्य धर्म के मार्ग से भटक जाता है, तब प्रकृति भी असंतुलित होने लगती है। कहीं बाढ़ आती है, कहीं सूखा पड़ता है और कहीं मौसम अपना असामान्य स्वरूप दिखाने लगता है। श्रीमद्भगवद्गीता के कर्मयोग अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण वर्षा और मानव कर्मों के बीच गहरे संबंध की व्याख्या करते हैं। गीता का प्रसिद्ध श्लोक — “अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः” — बताता है कि समस्त जीवों का जीवन अन्न पर आधारित है, अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है और वर्षा यज्ञ तथा सत्कर्मों का परिणाम होती है। इसका संदेश स्पष्ट है कि जब मनुष्य अपने कर्तव्यों का पालन करता है और धर्म के अनुसार जीवन जीता है, तब प्रकृति भी उसका साथ देती है।

वैदिक साहित्य में भी वर्षा को केवल बादलों और हवाओं का खेल नहीं माना गया है। ऋग्वेद में यज्ञ, तप, सदाचार और प्रकृति के सम्मान को वर्षा से जोड़ा गया है। मान्यता है कि जब समाज में सकारात्मक ऊर्जा, धर्म और सद्कर्मों की वृद्धि होती है, तब प्राकृतिक चक्र संतुलित रहता है। लेकिन जब इन मूल्यों का ह्रास होने लगता है, तब मौसम का संतुलन भी बिगड़ सकता है। आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए तो अतिवृष्टि एक प्रकार की चेतावनी भी मानी जाती है। यह संकेत देती है कि मनुष्य प्रकृति के नियमों से दूर होता जा रहा है। आज जंगलों की अंधाधुंध कटाई, नदियों का प्रदूषण, पहाड़ों का दोहन और प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक उपयोग एक गंभीर समस्या बन चुका है। धर्मग्रंथों की भाषा में यह प्रकृति के साथ असंतुलित व्यवहार है। आधुनिक विज्ञान भी यही कहता है कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियां मौसम के स्वरूप को बदल रही हैं और चरम मौसमी घटनाओं को बढ़ावा दे रही हैं।

अग्नि पुराण में शासन और समाज की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया गया है। ग्रंथ के अनुसार जब शासक धर्म और न्याय के मार्ग से भटक जाते हैं, प्रजा पर अत्याचार बढ़ता है और समाज में नैतिक मूल्यों का पतन होने लगता है, तब प्रकृति भी असामान्य संकेत देने लगती है। अत्यधिक वर्षा, अकाल, सूखा और अन्य प्राकृतिक आपदाओं को इसी असंतुलन का परिणाम माना गया है। यह विचार केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक चेतावनी भी है कि समाज की दिशा और दशा का प्रभाव व्यापक स्तर पर पड़ता है। आज जब देश और दुनिया के कई हिस्सों में कभी बाढ़ तो कभी सूखे जैसी चरम स्थितियां देखने को मिल रही हैं, तब धर्मग्रंथों की ये शिक्षाएं पहले से अधिक प्रासंगिक नजर आती हैं। वे हमें केवल पूजा-पाठ का संदेश नहीं देते, बल्कि प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी निभाने की सीख भी देते हैं। पेड़ लगाना, जल संरक्षण करना, पर्यावरण को स्वच्छ रखना और प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग करना भी आधुनिक समय का एक प्रकार का यज्ञ ही है। अतिवृष्टि और अनावृष्टि के पीछे चाहे वैज्ञानिक कारण हों या आध्यात्मिक संकेत, एक बात स्पष्ट है कि प्रकृति और मानव जीवन का संबंध अटूट है। जब यह संतुलन बना रहता है तो धरती पर समृद्धि आती है, लेकिन जब यह संतुलन बिगड़ता है तो उसके परिणाम पूरी मानवता को भुगतने पड़ते हैं। इसलिए धर्म और विज्ञान दोनों ही हमें एक ही संदेश देते हैं—प्रकृति का सम्मान करें, उसके साथ संतुलन बनाकर चलें और आने वाली पीढ़ियों के लिए पृथ्वी को सुरक्षित और समृद्ध छोड़कर जाएं।

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