हिंदू धर्म में निर्जला एकादशी को सभी एकादशियों में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से व्रत रखने और भगवान विष्णु की पूजा करने से वर्ष भर की सभी एकादशियों का पुण्य प्राप्त होता है। यही वजह है कि हर साल श्रद्धालु निर्जला एकादशी का बेसब्री से इंतजार करते हैं। हालांकि वर्ष 2026 में निर्जला एकादशी की तिथि को लेकर लोगों के बीच भ्रम की स्थिति बनी हुई है। कई पंचांगों में अलग-अलग जानकारी सामने आने के कारण श्रद्धालु यह जानना चाहते हैं कि व्रत 25 जून को रखा जाए या 26 जून को।
ऐसे में आइए जानते हैं निर्जला एकादशी 2026 की सही तिथि, व्रत का शुभ मुहूर्त, पारण का समय और इसका धार्मिक महत्व।
निर्जला एकादशी 2026 कब है?
हिंदू पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को निर्जला एकादशी कहा जाता है। वर्ष 2026 में एकादशी तिथि 25 जून को प्रारंभ होकर 26 जून तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर अधिकांश वैष्णव और सनातन परंपराओं में निर्जला एकादशी का व्रत 26 जून 2026, शुक्रवार को रखा जाएगा।
हालांकि स्थानीय पंचांग और परंपराओं के अनुसार कुछ स्थानों पर तिथि में अंतर देखने को मिल सकता है। इसलिए श्रद्धालुओं को अपने क्षेत्र के मान्य पंचांग या विद्वान आचार्य की सलाह अवश्य लेनी चाहिए।
क्यों होता है तिथि को लेकर भ्रम?
उदया तिथि का नियम
हिंदू धर्म में अधिकांश व्रत और पर्व उदया तिथि यानी सूर्योदय के समय विद्यमान तिथि के अनुसार मनाए जाते हैं। यदि एकादशी तिथि सूर्योदय के समय मौजूद रहती है तो उसी दिन व्रत रखा जाता है।
यही कारण है कि जब तिथि दो दिनों में पड़ती है, तब लोगों के बीच भ्रम की स्थिति बन जाती है। निर्जला एकादशी 2026 में भी ऐसा ही संयोग बन रहा है।
पंचांगों में अंतर
देश के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग पंचांगों का उपयोग किया जाता है। द्रिक पंचांग, वैष्णव पंचांग और क्षेत्रीय पंचांगों के गणना तरीकों में सूक्ष्म अंतर होने के कारण तिथि को लेकर मतभेद देखने को मिलते हैं।
निर्जला एकादशी का धार्मिक महत्व
सभी एकादशियों का पुण्य
धार्मिक मान्यता के अनुसार जो व्यक्ति वर्ष भर की 24 एकादशियों का व्रत नहीं रख पाता, वह केवल निर्जला एकादशी का व्रत रखकर सभी एकादशियों के बराबर पुण्य प्राप्त कर सकता है।
इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। श्रद्धालु व्रत रखकर मोक्ष, सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं।
भीमसेनी एकादशी के नाम से भी प्रसिद्ध
पौराणिक कथाओं के अनुसार महाभारत काल में पांडवों में भीमसेन भोजन के बिना नहीं रह सकते थे। महर्षि वेदव्यास के सुझाव पर उन्होंने केवल निर्जला एकादशी का व्रत रखा था। तभी से इसे भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है।
निर्जला एकादशी व्रत के नियम
निर्जला एकादशी को सबसे कठिन व्रतों में गिना जाता है। इस दिन श्रद्धालु बिना अन्न और जल ग्रहण किए भगवान विष्णु का स्मरण करते हैं।
व्रत के दौरान सुबह स्नान कर भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। तुलसी दल, पीले फूल, फल और पंचामृत अर्पित किए जाते हैं। दिनभर भजन-कीर्तन और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना शुभ माना जाता है।
हालांकि स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं वाले लोगों को अपनी क्षमता के अनुसार व्रत करना चाहिए।
दान का विशेष महत्व
निर्जला एकादशी पर दान-पुण्य का विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन जल से भरा घड़ा, छाता, वस्त्र, फल, शरबत और जरूरतमंदों को भोजन दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
उत्तर प्रदेश सहित देशभर में कई स्थानों पर इस अवसर पर प्याऊ लगाकर राहगीरों को ठंडा पानी पिलाने की परंपरा भी है।
पारण कब किया जाएगा?
निर्जला एकादशी का पारण द्वादशी तिथि में किया जाता है। पारण के समय भगवान विष्णु की पूजा कर जल ग्रहण किया जाता है और इसके बाद भोजन किया जाता है।
पारण का सटीक समय स्थानीय पंचांग और क्षेत्र विशेष के सूर्योदय के अनुसार निर्धारित होता है। इसलिए श्रद्धालुओं को अपने क्षेत्र के पंचांग के अनुसार पारण करना चाहिए।
निर्जला एकादशी हिंदू धर्म का अत्यंत महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है। वर्ष 2026 में तिथि को लेकर भ्रम की स्थिति जरूर है, लेकिन उदया तिथि के आधार पर अधिकांश पंचांगों के अनुसार व्रत 26 जून को रखा जाएगा। श्रद्धालुओं को व्रत से पहले अपने स्थानीय पंचांग की पुष्टि अवश्य कर लेनी चाहिए। भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने और पुण्य फल की कामना के लिए इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक पूजा-अर्चना करना शुभ माना गया है।
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