“एक अक्षर में समाया पूरा ब्रह्मांड! जानिए ‘ॐ’ का अद्भुत रहस्य और आध्यात्मिक शक्ति”

Editorial
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आज के आधुनिक दौर में जहां विज्ञान, तकनीक और भौतिक सुख-सुविधाओं ने मानव जीवन को नई दिशा दी है, वहीं आध्यात्मिकता की खोज आज भी उतनी ही प्रासंगिक बनी हुई है जितनी हजारों वर्ष पहले थी। भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में कुछ ऐसे प्रतीक, मंत्र और ध्वनियां हैं जिन्हें केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि उन्हें ब्रह्मांडीय ऊर्जा और चेतना का स्रोत समझा जाता है। इन्हीं में सबसे प्रमुख और पवित्र स्थान ‘ओम’ या ‘ऊं’ मंत्र का है। यह केवल एक अक्षर नहीं, बल्कि सनातन दर्शन का सार, सृष्टि का मूल स्वर और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक माना जाता है। हिंदू धर्म में ‘ओम’ को ऐसा मंत्र माना गया है, जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड का ज्ञान समाहित है। यह वह ध्वनि है जिसे ऋषि-मुनियों ने गहन तप, ध्यान और समाधि के दौरान अनुभव किया था। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार जब साधक ध्यान की सर्वोच्च अवस्था में पहुंचता है, तब उसे एक सूक्ष्म और दिव्य ध्वनि सुनाई देती है। यह ध्वनि किसी बाहरी स्रोत से उत्पन्न नहीं होती, बल्कि पूरे अस्तित्व में व्याप्त एक कंपन के रूप में अनुभव होती है। ऋषियों ने इसी दिव्य अनुभव को शब्दों में व्यक्त करने के लिए ‘ओम’ नाम दिया।

सनातन परंपरा में यह माना जाता है कि सृष्टि की शुरुआत किसी पदार्थ से नहीं, बल्कि ध्वनि से हुई थी। यही कारण है कि ‘ओम’ को आदिनाद यानी पहली ध्वनि कहा गया है। यह ध्वनि ब्रह्मांड के निर्माण की मूल शक्ति मानी जाती है। भारतीय दर्शन में कहा गया है कि जब कुछ भी अस्तित्व में नहीं था, तब केवल एक अनंत चेतना थी और उसी चेतना से उत्पन्न हुई पहली तरंग ‘ओम’ के रूप में प्रकट हुई। इसलिए ‘ओम’ को केवल धार्मिक प्रतीक नहीं बल्कि संपूर्ण सृष्टि की आधारभूत ऊर्जा माना जाता है। ‘ओम’ तीन ध्वनियों से मिलकर बना है— अ, उ और म। इन तीनों अक्षरों का अपना गहरा आध्यात्मिक अर्थ है। ‘अ’ सृष्टि के निर्माण का प्रतीक है, ‘उ’ पालन और संरक्षण का तथा ‘म’ विनाश और परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करता है। इस प्रकार यह मंत्र सृष्टि के संपूर्ण चक्र को अपने भीतर समाहित करता है। यही कारण है कि इसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश अर्थात त्रिदेवों का प्रतीक भी माना जाता है। यह दर्शाता है कि सृजन, पालन और संहार एक ही ब्रह्मांडीय प्रक्रिया के तीन अलग-अलग आयाम हैं।

उपनिषदों में ‘ओम’ को ब्रह्म का स्वरूप बताया गया है। मांडूक्य उपनिषद, जो सबसे छोटे लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण उपनिषदों में से एक माना जाता है, पूरी तरह ‘ओम’ के रहस्य पर आधारित है। इसमें कहा गया है कि ‘ओम’ केवल ध्वनि नहीं बल्कि जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय अवस्था का प्रतीक है। जाग्रत अवस्था वह है जब मनुष्य बाहरी दुनिया को अनुभव करता है। स्वप्न अवस्था में वह आंतरिक संसार में प्रवेश करता है। सुषुप्ति गहरी नींद की अवस्था है और तुरीय वह सर्वोच्च चेतना है जहां आत्मा परमात्मा से एकाकार हो जाती है। ‘ओम’ इन सभी अवस्थाओं को जोड़ने वाला सेतु माना गया है। आध्यात्मिक दृष्टि से ‘ओम’ का जप मन को स्थिर और शांत बनाने का सबसे प्रभावी माध्यम माना जाता है। जब कोई व्यक्ति धीमी और लयबद्ध गति से ‘ओम’ का उच्चारण करता है, तो उसकी सांसों की गति नियंत्रित होने लगती है। इससे मन में चल रहे विचारों का शोर कम होता है और व्यक्ति ध्यान की अवस्था में प्रवेश करने लगता है। यही कारण है कि योग, ध्यान और साधना की लगभग हर प्रक्रिया की शुरुआत और समाप्ति ‘ओम’ के उच्चारण से की जाती है।

योग विज्ञान के अनुसार मानव शरीर में सात प्रमुख ऊर्जा केंद्र यानी चक्र होते हैं। माना जाता है कि ‘ओम’ मंत्र का कंपन इन चक्रों को सक्रिय करने में सहायक होता है। विशेष रूप से नाभि चक्र, हृदय चक्र और आज्ञा चक्र पर इसका सकारात्मक प्रभाव माना जाता है। जब इन ऊर्जा केंद्रों में संतुलन स्थापित होता है, तब व्यक्ति मानसिक रूप से अधिक स्थिर, भावनात्मक रूप से संतुलित और आध्यात्मिक रूप से जागरूक बनता है। यही कारण है कि हजारों वर्षों से साधक इसे आत्मिक उन्नति का महत्वपूर्ण साधन मानते आए हैं। विज्ञान भी अब ध्वनि और कंपन की शक्ति को स्वीकार करने लगा है। कई शोधों में यह पाया गया है कि नियमित रूप से ‘ओम’ का उच्चारण करने से तनाव कम हो सकता है, हृदय गति संतुलित रह सकती है और मानसिक शांति बढ़ सकती है। जब व्यक्ति ‘ओम’ का उच्चारण करता है, तो उत्पन्न होने वाली कंपन शरीर और मस्तिष्क पर सकारात्मक प्रभाव डालती है। इससे एकाग्रता बढ़ती है और मन अधिक शांत महसूस करता है। हालांकि धार्मिक मान्यताओं और वैज्ञानिक निष्कर्षों की अपनी-अपनी सीमाएं हैं, लेकिन दोनों ही इस बात पर सहमत दिखाई देते हैं कि ध्वनि का मनुष्य के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

शिव पुराण में भी ‘ओंकार’ को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। इसमें वर्णन मिलता है कि नाद यानी ध्वनि और बिंदु यानी प्रकाश के मिलन से सृष्टि की उत्पत्ति हुई। यही दिव्य नाद आगे चलकर ‘ओम’ के रूप में प्रकट हुआ। इसलिए ‘ओम’ को केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि सृष्टि के रहस्य को समझने की कुंजी माना गया है। यह वह ध्वनि है जो मानव को उसकी सीमित पहचान से उठाकर अनंत चेतना से जोड़ने का प्रयास करती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ‘ओम’ का नियमित जप व्यक्ति को आध्यात्मिक रूप से उन्नत बनाता है और उसे मोक्ष की दिशा में अग्रसर करता है। कहा जाता है कि जब मनुष्य अपने भीतर और बाहर व्याप्त उसी दिव्य ध्वनि को पहचान लेता है, तब वह सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठने लगता है। उसके भीतर शांति, संतुलन और आत्मबोध का विकास होता है। यही कारण है कि हजारों वर्षों बाद भी ‘ओम’ केवल एक धार्मिक शब्द नहीं, बल्कि आस्था, अध्यात्म, चेतना और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का सबसे शक्तिशाली प्रतीक बना हुआ है। यह मनुष्य को यह संदेश देता है कि संपूर्ण सृष्टि एक ही ऊर्जा से जुड़ी हुई है और उसी ऊर्जा का अनुभव करने का सबसे सरल मार्ग है— भीतर की शांति, ध्यान और ‘ओम’ का दिव्य स्वर।

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