फुटबॉल को दुनिया का सबसे लोकप्रिय खेल कहा जाता है, लेकिन इस खेल के पीछे चलने वाला आर्थिक तंत्र भी किसी वैश्विक कॉरपोरेट साम्राज्य से कम नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि दुनिया भर में फुटबॉल का संचालन करने वाली संस्था फीफा (FIFA) खुद को एक गैर-लाभकारी यानी नॉन-प्रॉफिट संगठन बताती है। इसके बावजूद 2023 से 2026 के व्यावसायिक चक्र में फीफा करीब 13 अरब डॉलर यानी लगभग 1 लाख 22 हजार 734 करोड़ रुपये की रिकॉर्ड कमाई करने जा रही है। यह आंकड़ा कई देशों के सालाना बजट से भी बड़ा है। 2026 फीफा वर्ल्ड कप अमेरिका, कनाडा और मैक्सिको की मेजबानी में खेला जाएगा। इसे इतिहास का सबसे बड़ा फुटबॉल विश्व कप माना जा रहा है। 48 टीमों के साथ होने वाले इस मेगा टूर्नामेंट ने फीफा के लिए कमाई के नए रिकॉर्ड बनाने का रास्ता खोल दिया है। सवाल यह है कि आखिर एक नॉन-प्रॉफिट संस्था इतनी बड़ी कमाई कैसे करती है और इस पैसे का इस्तेमाल कहां होता है? फीफा का पूरा नाम फेडरेशन इंटरनेशनेल डी फुटबॉल एसोसिएशन है। इसकी स्थापना 1904 में फ्रांस के पेरिस में हुई थी और आज इसका मुख्यालय स्विट्जरलैंड के ज्यूरिख में स्थित है। वर्तमान में दुनिया के 211 राष्ट्रीय फुटबॉल संघ इसके सदस्य हैं। फीफा केवल विश्व कप आयोजित नहीं कराता, बल्कि फुटबॉल के नियम तय करने, अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों की निगरानी करने, खिलाड़ियों के ट्रांसफर सिस्टम को नियंत्रित करने और वैश्विक स्तर पर खेल के विकास का भी जिम्मा संभालता है। फीफा की कमाई का सबसे बड़ा आधार उसका चार वर्षीय वर्ल्ड कप चक्र है। कतर में हुए 2022 विश्व कप के दौरान फीफा ने करीब 7.6 अरब डॉलर की कमाई की थी। लेकिन 2026 विश्व कप के साथ यह आंकड़ा बढ़कर 13 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। यानी महज चार साल में कमाई में करीब 72 प्रतिशत की ऐतिहासिक वृद्धि।

इस रिकॉर्ड उछाल के पीछे तीन बड़े कारण हैं। पहला, विश्व कप में टीमों की संख्या 32 से बढ़ाकर 48 कर दी गई है, जिससे मैचों की संख्या बढ़ गई है। दूसरा, टूर्नामेंट अमेरिका जैसे विशाल और संपन्न मीडिया बाजार में आयोजित हो रहा है। तीसरा, फीफा ने क्लब वर्ल्ड कप जैसे नए टूर्नामेंट शुरू करके अतिरिक्त कमाई के रास्ते खोल दिए हैं। फीफा की कमाई का सबसे बड़ा हिस्सा टीवी ब्रॉडकास्टिंग राइट्स से आता है। कुल राजस्व का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा यहीं से मिलता है। दुनिया भर के टीवी नेटवर्क और डिजिटल प्लेटफॉर्म विश्व कप के प्रसारण अधिकार खरीदने के लिए अरबों डॉलर खर्च करते हैं, क्योंकि यह दुनिया का सबसे ज्यादा देखा जाने वाला खेल आयोजन है। अनुमान है कि 2026 चक्र में फीफा को केवल प्रसारण अधिकारों से ही करीब 5.3 अरब डॉलर की कमाई होगी। दूसरा बड़ा स्रोत टिकट और हॉस्पिटैलिटी है। मैचों के टिकट, वीआईपी बॉक्स, कॉर्पोरेट पैकेज और विशेष सुविधाओं से फीफा को लगभग 3.6 अरब डॉलर की आय होने की उम्मीद है। इस बार टिकटों की कीमतों ने भी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। सामान्य टिकट जहां 60 डॉलर से शुरू हो रहे हैं, वहीं प्रीमियम श्रेणी के टिकट 32 हजार डॉलर तक पहुंच गए हैं। कई विशेषज्ञों का मानना है कि फुटबॉल अब आम प्रशंसकों की पहुंच से धीरे-धीरे दूर होता जा रहा है। कमाई का तीसरा बड़ा जरिया स्पॉन्सरशिप और मार्केटिंग है। कोका-कोला, एडिडास, वीजा और अन्य बहुराष्ट्रीय कंपनियां फीफा के साथ जुड़ने के लिए भारी रकम चुकाती हैं। इससे फीफा को करीब 3.3 अरब डॉलर की आय होती है। इसके अलावा मर्चेंडाइज, वीडियो गेम और लाइसेंसिंग से भी करोड़ों डॉलर का राजस्व आता है।

हालांकि फीफा खुद को नॉन-प्रॉफिट संस्था बताता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उसके पास पैसा नहीं बचता। फीफा का दावा है कि वह अपनी कमाई को वापस फुटबॉल के विकास में निवेश करता है। कुल राजस्व का लगभग 58 प्रतिशत हिस्सा टूर्नामेंटों के आयोजन और पुरस्कार राशि पर खर्च होता है। 2026 विश्व कप में करीब 871 मिलियन डॉलर की पुरस्कार राशि वितरित की जाएगी और विजेता टीम को 50 मिलियन डॉलर तक मिल सकते हैं। इसके अलावा लगभग 30 प्रतिशत राशि दुनिया भर के 211 सदस्य देशों के फुटबॉल संघों को विकास योजनाओं और अनुदान के रूप में दी जाती है। फीफा का कहना है कि इसका उद्देश्य फुटबॉल को वैश्विक स्तर पर मजबूत करना है। हालांकि आलोचक इसे राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने का माध्यम भी मानते हैं, क्योंकि हर सदस्य देश के पास फीफा अध्यक्ष के चुनाव में एक वोट होता है। यही वजह है कि फीफा की फंडिंग व्यवस्था को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। आलोचकों का आरोप है कि विकास निधि के जरिए सदस्य देशों का समर्थन हासिल किया जाता है। इसके बावजूद फीफा के पास आज लगभग 2.7 अरब डॉलर का रिजर्व फंड मौजूद है, जो इसकी आर्थिक ताकत को दर्शाता है। 2026 विश्व कप से मेजबान देशों को भी भारी आर्थिक लाभ की उम्मीद है। फीफा का दावा है कि प्रत्येक मेजबान शहर को पर्यटन, होटल, परिवहन और स्थानीय व्यापार के माध्यम से करोड़ों डॉलर का फायदा होगा। हालांकि कई अर्थशास्त्री इस दावे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया आंकड़ा मानते हैं और कहते हैं कि सुरक्षा तथा बुनियादी ढांचे पर होने वाला खर्च भी काफी बड़ा होता है।
भारत जैसे देशों में फुटबॉल की बढ़ती लोकप्रियता भी फीफा की कमाई का अहम हिस्सा बनती जा रही है। भारतीय दर्शकों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, जिससे टीवी और डिजिटल प्रसारण अधिकारों का मूल्य लगातार बढ़ रहा है। यही कारण है कि फीफा एशियाई बाजारों पर विशेष ध्यान दे रहा है। स्पष्ट है कि फीफा अब सिर्फ एक खेल संस्था नहीं, बल्कि वैश्विक खेल कारोबार की सबसे शक्तिशाली मशीन बन चुका है। वर्ल्ड कप के नाम पर अरबों डॉलर की कमाई, महंगे टिकट, बड़े कॉर्पोरेट सौदे और विस्तार करती व्यावसायिक रणनीति ने इसे खेल जगत का सबसे प्रभावशाली ब्रांड बना दिया है। लेकिन सवाल अब भी कायम है—क्या बढ़ती कमाई के इस दौर में फुटबॉल अपने आम प्रशंसकों से दूर होता जा रहा है, या फिर यही आधुनिक खेल अर्थव्यवस्था की नई हकीकत है?
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