“समझौता हुआ, लेकिन इम्तिहान बाकी! ईरान बोला- अमल होगा तभी सफल होगी डील”

Editorial
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ईरान और अमेरिका के बीच हाल ही में हुए समझौते को लेकर पश्चिम एशिया की राजनीति में नई हलचल तेज हो गई है। जहां एक ओर इस समझौते को क्षेत्रीय तनाव कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसके भविष्य को लेकर कई सवाल भी उठने लगे हैं। इसी बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी समझौते की असली सफलता कागजों पर लिखी गई शर्तों में नहीं, बल्कि उसके ईमानदार क्रियान्वयन में छिपी होती है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों को अपने-अपने दायित्वों का पूरी गंभीरता और जिम्मेदारी के साथ पालन करना होगा, तभी इस समझौते को सफल कहा जा सकेगा। राष्ट्रपति पेजेशकियन का यह बयान ऐसे समय में आया है जब क्षेत्र में राजनीतिक और सैन्य गतिविधियां लगातार तेज हो रही हैं। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि समझौते के बाहर दिए जाने वाले राजनीतिक बयान या मीडिया में होने वाली बयानबाजी से कोई वास्तविक प्रगति नहीं होती। उनके अनुसार, किसी भी समझौते की विश्वसनीयता इस बात से तय होती है कि उसके प्रावधान जमीन पर कितनी प्रभावी तरह से लागू किए जाते हैं। ईरान का मानना है कि पिछले अनुभवों से सबक लेते हुए अब केवल घोषणाओं के आधार पर भरोसा नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी समझौते को लेकर अपनी रणनीति स्पष्ट कर दी है। ट्रंप ने संकेत दिया है कि अमेरिका क्षेत्रीय सुरक्षा और समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा को लेकर किसी भी प्रकार का समझौता करने के मूड में नहीं है। उन्होंने कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि यदि किसी भी पक्ष ने वैश्विक व्यापार के लिए महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों को बाधित करने का प्रयास किया तो अमेरिका बेहद कठोर कार्रवाई करेगा। ट्रंप के इस बयान को सीधे तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य से जोड़कर देखा जा रहा है, जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में शामिल है। होर्मुज जलडमरूमध्य लंबे समय से वैश्विक राजनीति और ऊर्जा सुरक्षा का केंद्र रहा है। दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल इसी मार्ग से गुजरता है। ऐसे में यहां किसी भी प्रकार का तनाव सीधे अंतरराष्ट्रीय बाजारों और तेल की कीमतों को प्रभावित कर सकता है। ट्रंप ने यहां तक संकेत दिया कि अमेरिका जरूरत पड़ने पर इस रणनीतिक जलमार्ग पर अधिक प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने की दिशा में कदम उठा सकता है। उनके इस बयान ने वैश्विक कूटनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है।

उधर इस्रायल ने भी इस पूरे घटनाक्रम पर अपनी सख्त प्रतिक्रिया दी है। इस्रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने साफ शब्दों में कहा है कि उनकी सरकार ईरान को कभी भी परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देगी। उन्होंने दोहराया कि इस्रायल की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और इसी कारण दक्षिण लेबनान में तैनात इस्रायली सेना को वापस नहीं बुलाया जाएगा। नेतन्याहू का यह रुख दर्शाता है कि क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर इस्रायल किसी भी प्रकार की नरमी दिखाने के पक्ष में नहीं है। इस बीच समझौते को लागू करने की दिशा में कूटनीतिक प्रयास भी तेज हो गए हैं। ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने समझौते के अगले चरण की रूपरेखा साझा करते हुए बताया कि जल्द ही एक उच्चस्तरीय बैठक आयोजित की जाएगी। इस बैठक में ईरान के संसद अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गालिबाफ, विदेश मंत्री अब्बास अराघची, अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस तथा पाकिस्तान और कतर के शीर्ष नेता भाग लेंगे। इस बैठक का उद्देश्य समझौते के विभिन्न पहलुओं पर आगे की रणनीति तय करना होगा।समझौते को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए चार विशेष वर्किंग ग्रुप भी गठित किए गए हैं। इन समूहों को अलग-अलग जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। पहला समूह प्रतिबंधों को हटाने की प्रक्रिया पर काम करेगा, दूसरा परमाणु मुद्दों की निगरानी करेगा, तीसरा आर्थिक विकास और निवेश से जुड़े मामलों को देखेगा, जबकि चौथा समूह पूरे समझौते के अनुपालन और निगरानी का दायित्व संभालेगा। इन समितियों का गठन इस बात का संकेत माना जा रहा है कि दोनों पक्ष समझौते को केवल औपचारिक दस्तावेज बनाकर नहीं छोड़ना चाहते, बल्कि इसे व्यावहारिक रूप से लागू करने की दिशा में गंभीर प्रयास कर रहे हैं। क्षेत्रीय शांति को मजबूत करने के लिए भी महत्वपूर्ण पहल की जा रही है। गरीबाबादी ने बताया कि लेबनान में संभावित तनाव को रोकने के लिए पाकिस्तान और कतर के सहयोग से एक विशेष संघर्ष रोकथाम इकाई गठित की जाएगी। इसका उद्देश्य क्षेत्र में किसी भी प्रकार के सैन्य टकराव को रोकना और कूटनीतिक संवाद को बढ़ावा देना होगा।आर्थिक मोर्चे पर भी इस समझौते को बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। ईरानी अधिकारियों के अनुसार लगभग 12 अरब डॉलर की राशि जारी करने की प्रक्रिया तत्काल शुरू की जाएगी। यह राशि दो चरणों में उपलब्ध कराई जाएगी और इसका उपयोग आर्थिक विकास, बुनियादी ढांचे तथा व्यापारिक गतिविधियों को गति देने के लिए किया जाएगा। लंबे समय से प्रतिबंधों और आर्थिक दबावों का सामना कर रहे ईरान के लिए यह राहत बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

स्विट्जरलैंड में संपन्न इस समझौते को लेकर ईरान के संसद अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गालिबाफ ने भी सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि हालिया तकनीकी और कूटनीतिक वार्ताओं में ईरान ने अपनी मजबूत स्थिति का सफलतापूर्वक प्रदर्शन किया है। साथ ही उन्होंने यह भी संकेत दिया कि होर्मुज जलडमरूमध्य के संचालन को लेकर भविष्य में नई व्यवस्थाएं लागू की जा सकती हैं, जो अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुरूप होंगी लेकिन ईरान के रणनीतिक हितों को भी सुरक्षित रखेंगी। फिलहाल पूरी दुनिया की नजरें इस समझौते के अगले चरण पर टिकी हुई हैं। कागजों पर हुए इस समझौते को वास्तविक सफलता तभी मिलेगी जब अमेरिका, ईरान, इस्रायल और क्षेत्र के अन्य प्रभावशाली देश अपने-अपने हितों और सुरक्षा चिंताओं के बीच संतुलन बनाकर आगे बढ़ेंगे। आने वाले सप्ताह यह तय करेंगे कि यह समझौता पश्चिम एशिया में स्थायी शांति का आधार बनेगा या फिर एक और कूटनीतिक दस्तावेज बनकर रह जाएगा।

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