CAPF कानून के विरोध की कीमत? सरकार विरोधी पोस्ट शेयर करने के आरोप में CRPF के DIG बी.सी. पात्रा सस्पेंड, फोर्स में मचा बवाल

Editorial
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नई दिल्ली केंद्रीय अर्द्धसैनिक बलों (CAPF) में लंबे समय से सुलग रहा विवाद अब खुलकर सामने आ गया है। CAPF (जनरल एडमिनिस्ट्रेशन) एक्ट 2026 के विरोध से जुड़े कथित सरकार-विरोधी कंटेंट को सोशल मीडिया पर साझा करने के आरोप में CRPF के वरिष्ठ अधिकारी और डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल (DIG) बी.सी. पात्रा को निलंबित कर दिया गया है। इस कार्रवाई के बाद पूरे CAPF तंत्र में हलचल मच गई है। जहां CRPF मुख्यालय इसे सेवा नियमों के उल्लंघन का मामला बता रहा है, वहीं कई कैडर अधिकारी इसे अधिकारों की लड़ाई लड़ने वालों को चुप कराने की कोशिश करार दे रहे हैं।यह मामला केवल एक अधिकारी के निलंबन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके जरिए CAPF कैडर अधिकारियों और IPS अधिकारियों के बीच वर्षों से चल रहे टकराव की परतें भी सामने आने लगी हैं।बी.सी. पात्रा वर्तमान में त्रिपुरा के अगरतला स्थित CRPF सेक्टर मुख्यालय में तैनात थे। 1994 बैच के अधिकारी पात्रा हाल ही में नेशनल सिक्योरिटी गार्ड (NSG) में अपनी प्रतिनियुक्ति पूरी कर वापस CRPF में लौटे थे। लेकिन वापसी के कुछ ही समय बाद उनके खिलाफ कार्रवाई ने पूरे बल के भीतर नई बहस छेड़ दी है।सूत्रों के अनुसार पात्रा के खिलाफ CCS (CCA) Rules 1965 के तहत प्रारंभिक जांच शुरू की गई है। जांच पूरी होने तक उन्हें निलंबित रखने का आदेश दिया गया है। आरोप है कि उन्होंने सोशल मीडिया पर ऐसे ऑडियो, वीडियो और तस्वीरें साझा कीं, जिनमें CAPF कानून के विरोध के साथ-साथ लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार के खिलाफ आपत्तिजनक संदेश मौजूद थे।CRPF के महानिदेशक जी.पी. सिंह ने कार्रवाई की पुष्टि करते हुए साफ कहा कि फोर्स के सभी अधिकारी संविधान, कानून और अपनी शपथ से बंधे होते हैं। यदि कोई अधिकारी सेवा नियमों का उल्लंघन करता है तो उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।लेकिन इस कार्रवाई के बाद जो सवाल उठ रहे हैं, वे कहीं अधिक बड़े हैं।दरअसल CAPF (जनरल एडमिनिस्ट्रेशन) बिल 2026 को लेकर शुरू से ही कैडर अधिकारियों में नाराजगी रही है। उनका आरोप है कि नए कानून के कुछ प्रावधान उनके हितों के खिलाफ हैं और इससे उनके प्रमोशन, वरिष्ठता तथा करियर ग्रोथ पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। अप्रैल में राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद यह बिल कानून बन चुका है, लेकिन विरोध की आवाजें अब भी थमी नहीं हैं।बी.सी. पात्रा उन्हीं अधिकारियों में शामिल रहे हैं जिन्होंने CAPF कैडर अधिकारियों के अधिकारों के लिए सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी लड़ाई लड़ी थी। उन्होंने वर्षों तक यह मुद्दा उठाया कि CAPF अधिकारियों को प्रमोशन और सेवा सुविधाओं में IPS अधिकारियों के बराबर अवसर मिलने चाहिए।यही वजह है कि अब फोर्स के भीतर कई अधिकारी इस कार्रवाई को केवल सोशल मीडिया पोस्ट का मामला नहीं मान रहे।

कुछ वरिष्ठ अधिकारियों का दावा है कि पात्रा को इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि वे कैडर अधिकारियों के अधिकारों की लड़ाई का प्रमुख चेहरा बन चुके थे। एक अधिकारी ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहा कि पात्रा हमेशा अपने कैडर के हितों के लिए खड़े रहे और अदालत में भी सक्रिय भूमिका निभाई। ऐसे में उनका निलंबन कई लोगों को प्रतिशोधात्मक कार्रवाई जैसा प्रतीत हो रहा है।मामले को और अधिक संवेदनशील इसलिए माना जा रहा है क्योंकि हाल के दिनों में सुप्रीम कोर्ट में चल रहे इसी विवाद से जुड़े लगभग दो दर्जन अधिकारियों के तबादले और नई पोस्टिंग के आदेश भी जारी किए गए हैं। इससे कैडर अधिकारियों के बीच असंतोष और बढ़ गया है।इसी बीच पूर्व CAPF अधिकारियों के संगठन अलायंस ऑफ ऑल एक्स पैरामिलिट्री फोर्सेज वेलफेयर एसोसिएशन (AAPWA) ने भी मोर्चा खोल दिया है। संगठन ने 2 जुलाई को प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाने की घोषणा की है।AAPWA का आरोप है कि बी.सी. पात्रा का निलंबन जल्दबाजी और गैरकानूनी तरीके से किया गया है। संगठन का कहना है कि अप्रैल में दिल्ली के राजघाट पर CAPF कानून के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले जवानों और उनके परिवारों को भी लगातार निशाना बनाया जा रहा है।AAPWA के महासचिव रणबीर सिंह ने पात्रा को एक अनुभवी और सम्मानित अधिकारी बताते हुए कहा कि उन्होंने अपने लंबे करियर में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाई हैं और अनेक पुरस्कार भी प्राप्त किए हैं। ऐसे अधिकारी के खिलाफ बिना निष्पक्ष जांच के कार्रवाई चिंता का विषय है।उधर CAPF कैडर अधिकारियों ने गृह मंत्रालय को भेजे गए ज्ञापन में नए कानून के कई प्रावधानों को “दमनकारी” और “भेदभावपूर्ण” बताया है। उनका कहना है कि यदि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुरूप IPS अधिकारियों की प्रतिनियुक्तियों में कमी नहीं की गई तो हजारों CAPF अधिकारी वर्षों तक एक ही रैंक पर अटके रह जाएंगे और उन्हें पदोन्नति का अवसर नहीं मिलेगा।गौरतलब है कि इस मुद्दे पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी, लेकिन अदालत ने सरकार की अपील खारिज कर दी थी।हालांकि केंद्र सरकार का पक्ष बिल्कुल अलग है। सरकार का कहना है कि CAPF (जनरल एडमिनिस्ट्रेशन) एक्ट का उद्देश्य सभी केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के लिए एक समान प्रशासनिक और सेवा ढांचा तैयार करना है। सरकार का दावा है कि इससे विभिन्न बलों में अलग-अलग नियमों की व्यवस्था समाप्त होगी और पारदर्शिता बढ़ेगी।गृह मंत्रालय यह भी मानता है कि IPS अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति व्यवस्था प्रशासनिक आवश्यकता है, क्योंकि IPS एक अखिल भारतीय सेवा है और उसके अधिकारियों को राज्य पुलिस से लेकर केंद्रीय सुरक्षा बलों तक नेतृत्व की जिम्मेदारी निभानी होती है।फिलहाल DIG बी.सी. पात्रा का निलंबन CAPF के भीतर वर्षों से चल रहे संघर्ष को फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ले आया है। एक तरफ सेवा नियमों और अनुशासन का सवाल है, तो दूसरी तरफ कैडर अधिकारियों के अधिकारों और भविष्य को लेकर उठ रही चिंताएं हैं।अब सबकी निगाहें जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि यह मामला केवल एक सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित रहता है या फिर CAPF और IPS के बीच चल रहे पुराने शक्ति संघर्ष का नया अध्याय साबित होता है। फिलहाल इतना तय है कि बी.सी. पात्रा का निलंबन आने वाले दिनों में सुरक्षा बलों की राजनीति और प्रशासनिक ढांचे पर बड़ी बहस छेड़ने वाला है।

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