
मुजफ्फरनगर ज्ञानवापी परिसर के वीडियोग्राफी सर्वे का ऐतिहासिक आदेश देने वाले न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर एक बार फिर सुरक्षा को लेकर चर्चा में हैं। आतंकवादी संगठनों से मिल चुकी जान से मारने की धमकियों और हाल के संवेदनशील हालातों का हवाला देते हुए उन्होंने अपने आवास पर सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाने की मांग की है। इसके लिए उन्होंने मुजफ्फरनगर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को पत्र भेजकर गंभीर सुरक्षा चिंताओं से अवगत कराया है।न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर वर्तमान में मुजफ्फरनगर की फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या-3 में पीठासीन अधिकारी के रूप में तैनात हैं। अपने पत्र में उन्होंने कहा है कि उनकी वर्तमान तैनाती के दौरान सुरक्षा व्यवस्था पहले की तुलना में कम कर दी गई है, जबकि उनके खिलाफ खतरे का स्तर अभी भी बरकरार है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि उन्हें पूर्व में आतंकवादी संगठनों से धमकियां मिल चुकी हैं और केंद्रीय एजेंसियों की जांच में भी इन खतरों की पुष्टि हुई थी।
ज्ञानवापी फैसले के बाद शुरू हुई धमकियों की कहानी
जून 2022 में वाराणसी में तैनाती के दौरान न्यायाधीश दिवाकर ने शृंगार गौरी और ज्ञानवापी विवाद से जुड़े मामले की सुनवाई की थी। इसी दौरान उन्होंने ज्ञानवापी परिसर के वीडियोग्राफी सर्वे का आदेश दिया था, जिसके बाद उनका नाम राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया था।इसी अवधि में उन्हें एक कथित कट्टरपंथी संगठन की ओर से धमकी भरा पत्र प्राप्त हुआ था। पत्र में उन्हें अपमानजनक शब्दों से संबोधित करते हुए गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी गई थी। उस समय यह मामला सुरक्षा एजेंसियों के संज्ञान में आया था और न्यायाधीश को विशेष सुरक्षा मुहैया कराई गई थी।
ISIS मॉड्यूल की जांच में सामने आया नाम
न्यायाधीश द्वारा भेजे गए पत्र के अनुसार, दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल और उत्तर प्रदेश एटीएस की जांच में यह तथ्य सामने आया था कि अक्टूबर 2025 में गिरफ्तार किए गए दो संदिग्ध ISIS समर्थकों की गतिविधियों में उनका नाम भी शामिल था।जांच एजेंसियों के अनुसार ये आरोपी दिल्ली के भीड़भाड़ वाले बाजारों और उत्तर प्रदेश के प्रमुख धार्मिक स्थलों पर हमले की साजिश रच रहे थे। जांच के दौरान सोशल मीडिया गतिविधियों की पड़ताल में यह भी सामने आया कि एक आरोपी ने न्यायाधीश की तस्वीर सोशल मीडिया पर पोस्ट की थी और उस पर आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए धमकी भरे संदेश लिखे थे।सूत्रों के मुताबिक आरोपी ने ज्ञानवापी मामले से जुड़े फैसलों का उल्लेख करते हुए न्यायाधीश को निशाना बनाया था। इस खुलासे के बाद सुरक्षा एजेंसियां भी सतर्क हो गई थीं।


सुरक्षा में कटौती पर जताई चिंता
अपने पत्र में न्यायाधीश दिवाकर ने कहा है कि बरेली में तैनाती के दौरान उन्हें दो निजी सुरक्षा अधिकारी (PSO) के अलावा आवासीय सुरक्षा गारद भी उपलब्ध थी। लेकिन मुजफ्फरनगर में कार्यभार संभालने के बाद उन्हें केवल दो पीएसओ ही दिए गए हैं।उनका कहना है कि वर्तमान परिस्थितियां पहले की तुलना में अधिक संवेदनशील हैं। ऐसे में सुरक्षा में कमी चिंता का विषय है। उन्होंने प्रशासन से अनुरोध किया है कि खतरे के स्तर को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था की पुनः समीक्षा की जाए।
80 दिनों में 9 दोषियों को फांसी की सजा
न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर हाल के महीनों में अपने कई सख्त फैसलों के कारण भी चर्चा में रहे हैं। पिछले लगभग 80 दिनों में उन्होंने तीन अलग-अलग जघन्य हत्या मामलों में कुल नौ दोषियों को फांसी की सजा सुनाई है।इन मामलों में चर्चित अधिवक्ता समीर सैफी हत्याकांड, सिसौली निवासी शेखर हत्याकांड और चरथावल क्षेत्र में महिला एवं उसके मासूम बेटे सहित तीन लोगों की हत्या का मामला शामिल है। लगातार आए इन कड़े फैसलों ने उन्हें प्रदेश के चर्चित न्यायिक अधिकारियों में शामिल कर दिया है।
प्रशासन का क्या कहना है?
मुजफ्फरनगर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक संजय कुमार वर्मा ने कहा है कि उन्हें अभी तक इस संबंध में कोई औपचारिक पत्र प्राप्त नहीं हुआ है। हालांकि उन्होंने बताया कि न्यायाधीश की सुरक्षा के लिए पहले से ही पुलिस लाइन से सुरक्षा कर्मी और गनर उपलब्ध कराए गए हैं।पुलिस अधिकारियों का कहना है कि यदि कोई नया अनुरोध प्राप्त होता है तो उसका परीक्षण कर सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की जाएगी।
कई सवाल छोड़ गया मामला
ज्ञानवापी प्रकरण से जुड़े फैसले, आतंकवादी संगठनों की कथित धमकियां, सोशल मीडिया पर की गई आपत्तिजनक पोस्ट और अब सुरक्षा बढ़ाने की मांग—इन सभी घटनाओं ने एक बार फिर न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया है।सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि जांच एजेंसियों की रिपोर्ट में खतरे की पुष्टि हो चुकी है, तो क्या मौजूदा सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त है? और क्या हाई-प्रोफाइल एवं संवेदनशील मामलों की सुनवाई करने वाले न्यायाधीशों के लिए अलग सुरक्षा प्रोटोकॉल की जरूरत है?इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में प्रशासनिक और सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई से सामने आ सकते हैं।
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