
अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी और जमीन खरीद-फरोख्त में हुए कथित घोटाले को लेकर सियासत और जांच दोनों तेज हो गई हैं। आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह आज विशेष जांच समिति (SIT) के सामने पेश होकर अपने आरोपों से जुड़े दस्तावेज और सबूत सौंपेंगे। इस घटनाक्रम ने न सिर्फ राम मंदिर ट्रस्ट की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि छह साल पुरानी एक ऑडिट रिपोर्ट ने भी पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया है।संजय सिंह ने दावा किया है कि उनके पास चढ़ावे में हुई कथित हेराफेरी और जमीन सौदों में अनियमितताओं से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं। उन्होंने बताया कि SIT प्रमुख और लखनऊ मंडलायुक्त की ओर से उन्हें साक्ष्य उपलब्ध कराने के लिए बुलाया गया है। वह बृहस्पतिवार को मंडलायुक्त कार्यालय पहुंचकर सभी दस्तावेज जांच एजेंसी को सौंपेंगे।इस बीच SIT की प्रारंभिक जांच में सामने आए तथ्यों ने राम मंदिर ट्रस्ट की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सूत्रों के अनुसार, ट्रस्ट के गठन के कुछ ही महीनों बाद एक निजी ऑडिट फर्म ने अपनी रिपोर्ट में वित्तीय प्रबंधन और प्रशासनिक व्यवस्था में कई गंभीर कमियों की ओर संकेत किया था। रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि यदि समय रहते सुधार नहीं किए गए तो भविष्य में वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही पर संकट खड़ा हो सकता है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ऑडिट फर्म की चेतावनियों के बावजूद कई महत्वपूर्ण सिफारिशों को लागू नहीं किया गया। रिपोर्ट में कहा गया था कि ट्रस्ट के पास वित्तीय रिपोर्टिंग के लिए जरूरी अभिलेखों की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। साथ ही ऐसी कोई स्पष्ट प्रशासनिक संरचना भी मौजूद नहीं थी, जिससे जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जा सके।ऑडिट रिपोर्ट में बिना मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) के वित्तीय और प्रशासनिक कार्यों को संचालित किए जाने पर भी चिंता जताई गई थी। फर्म ने ट्रस्ट को सुझाव दिया था कि लेन-देन, डेटा प्रबंधन, मानव संसाधन, रिकॉर्ड संधारण और निगरानी के लिए विस्तृत SOP लागू की जाए, ताकि पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके। लेकिन सूत्रों का दावा है कि इन सुझावों को गंभीरता से नहीं लिया गया।दान और आभूषणों के रिकॉर्ड को लेकर ऑडिट फर्म की टिप्पणियां सबसे अधिक गंभीर मानी जा रही हैं। रिपोर्ट में कहा गया था कि नकदी के अलावा प्राप्त होने वाले आभूषण, सोना-चांदी और अन्य बहुमूल्य वस्तुओं के लिए अलग से मजबूत स्टॉक रजिस्टर और निगरानी तंत्र विकसित किया जाना चाहिए। फर्म ने यह भी कहा था कि प्राप्त दान की नियमित निगरानी और सत्यापन के लिए एक व्यवस्थित व्यवस्था आवश्यक है।
रिपोर्ट में बैंक समन्वयन और वित्तीय निगरानी के क्षेत्र में प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी की ओर भी ध्यान दिलाया गया था। विशेषज्ञों का मानना है कि इतने बड़े धार्मिक और आर्थिक संस्थान में यदि वित्तीय निगरानी के लिए पर्याप्त प्रशिक्षित मानव संसाधन न हों तो गड़बड़ियों की आशंका बढ़ जाती है।डेटा सुरक्षा और सूचना प्रबंधन को लेकर भी ऑडिट फर्म ने गंभीर चिंता व्यक्त की थी। रिपोर्ट के अनुसार संवेदनशील वित्तीय सूचनाओं की सुरक्षा, डिजिटल रिकॉर्ड के सत्यापन और डेटा एंट्री की निगरानी के लिए पर्याप्त नियंत्रण व्यवस्था मौजूद नहीं थी। यह कमी भविष्य में वित्तीय अनियमितताओं की जांच को भी प्रभावित कर सकती है।
अब जबकि SIT की प्रारंभिक रिपोर्ट में भी चढ़ावे और वित्तीय प्रबंधन से जुड़े कई सवाल उठाए गए हैं, ऐसे में छह साल पुरानी यह ऑडिट रिपोर्ट जांच एजेंसी के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बन सकती है। जांच से जुड़े सूत्रों का कहना है कि ऑडिट रिपोर्ट में दर्ज टिप्पणियों और वर्तमान आरोपों के बीच कई समानताएं दिखाई दे रही हैं, जिसकी गहराई से पड़ताल की जा रही है।राजनीतिक स्तर पर भी यह मामला लगातार गरमाता जा रहा है। विपक्ष जहां ट्रस्ट की वित्तीय पारदर्शिता पर सवाल उठा रहा है, वहीं ट्रस्ट से जुड़े लोग आरोपों को राजनीति से प्रेरित बता रहे हैं। हालांकि SIT की जांच और संजय सिंह द्वारा पेश किए जाने वाले दस्तावेजों के बाद कई नए तथ्य सामने आने की संभावना जताई जा रही है।फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि 2020 में ही संभावित खामियों की ओर संकेत कर दिया गया था, तो उन चेतावनियों पर अमल क्यों नहीं किया गया? क्या समय रहते सुधारात्मक कदम उठाए जाते तो आज चढ़ावा चोरी और वित्तीय अनियमितताओं के आरोप सामने नहीं आते? इन सवालों के जवाब अब SIT की जांच से ही मिलेंगे।आज संजय सिंह की पेशी और उनके द्वारा सौंपे जाने वाले दस्तावेज इस पूरे मामले की दिशा तय कर सकते हैं। अयोध्या से लेकर लखनऊ तक सभी की निगाहें अब SIT की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।
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