उत्तराखंड की 7 सीटों पर BJP का बड़ा दांव!4 अभेद्य सीटों पर BJP का मिशन फतह

Editorial
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देहरादून उत्तराखंड की राजनीति में चुनावी बिगुल बजने से पहले ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने सबसे बड़ा दांव चल दिया है। जिन चार विधानसभा सीटों पर पार्टी राज्य गठन के बाद से कभी जीत का परचम नहीं लहरा सकी, वहां अब भाजपा ने अपना सबसे मजबूत चुनावी हथियार उतार दिया है। प्रदेश कोर कमेटी के वरिष्ठ नेताओं को सीधे मैदान में भेज दिया गया है और बूथ से लेकर मतदाता तक पहुंचने के लिए माइक्रो मैनेजमेंट का ऐसा प्लान तैयार किया गया है, जिसे पार्टी इस बार जीत का सबसे बड़ा फॉर्मूला मान रही है। भाजपा का लक्ष्य केवल सत्ता में वापसी नहीं, बल्कि उन राजनीतिक किलों को भी फतह करना है जो पिछले 24 वर्षों से उसके लिए अभेद्य साबित होते रहे हैं। चकराता, पिरान कलियर, मंगलौर और धारचूला जैसी सीटों पर संगठन ने चुनावी अभियान समय से पहले शुरू कर दिया है। इसके साथ ही यमुनोत्री, भगवानपुर और हल्द्वानी जैसी सीटों पर भी जीत की रणनीति पर तेजी से काम चल रहा है।

अब सिर्फ चुनाव नहीं, हर वोट पर नजर

भाजपा ने साफ संकेत दे दिए हैं कि इस बार चुनाव केवल बड़े नेताओं की सभाओं से नहीं, बल्कि बूथ स्तर की मजबूत रणनीति से लड़ा जाएगा। पार्टी ने प्रत्येक चुनौतीपूर्ण सीट पर प्रदेश कोर कमेटी के एक-एक वरिष्ठ सदस्य की जिम्मेदारी तय कर दी है। ये नेता चुनाव तक पूरे संगठन, बूथ प्रबंधन और स्थानीय समीकरणों की निगरानी करेंगे।सूत्रों के अनुसार हर बूथ पर सक्रिय कार्यकर्ताओं की सूची तैयार की जा रही है। मंडल, मोर्चा, प्रकोष्ठ, मन की बात के संयोजक और संगठन के विभिन्न पदाधिकारियों को एकजुट कर मतदाताओं तक सीधी पहुंच बनाने का अभियान शुरू हो चुका है। पार्टी का उद्देश्य है कि कोई भी मतदाता संपर्क से बाहर न रहे।

चार सीटें… जहां आज तक नहीं खिला कमल

उत्तराखंड बनने के बाद भाजपा ने कई चुनाव जीते और लगातार सरकारें बनाईं, लेकिन चार विधानसभा सीटें ऐसी रहीं जहां पार्टी कभी जीत दर्ज नहीं कर सकी।

चकराता (देहरादून) भाजपा के लिए सबसे कठिन सीटों में रही है। वर्ष 2002 से लेकर 2022 तक हुए सभी विधानसभा चुनावों में यहां कांग्रेस के प्रीतम सिंह लगातार जीतते रहे हैं।

पिरान कलियर (हरिद्वार) में परिसीमन के बाद सीट अस्तित्व में आई, लेकिन 2012, 2017 और 2022 के चुनावों में कांग्रेस के फुरकान अहमद लगातार विजयी रहे। भाजपा आज तक यहां खाता नहीं खोल सकी।

मंगलौर (हरिद्वार) का चुनावी इतिहास भी भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण रहा है। कभी बसपा तो कभी कांग्रेस के कब्जे वाली इस सीट पर भाजपा को आज तक सफलता नहीं मिली।

धारचूला (पिथौरागढ़) में भी पार्टी का रिकॉर्ड कमजोर रहा है। यहां निर्दलीय और कांग्रेस उम्मीदवारों ने लगातार जीत दर्ज की, जबकि भाजपा कई बार पूरी ताकत लगाने के बावजूद जीत हासिल नहीं कर पाई।

 

तीन और सीटों पर भी विशेष नजर

भाजपा केवल चार अभेद्य सीटों तक सीमित नहीं है। पार्टी ने यमुनोत्री, भगवानपुर और हल्द्वानी को भी विशेष रणनीति में शामिल किया है।यमुनोत्री सीट पर भाजपा केवल 2017 में जीत दर्ज कर सकी थी। बाकी चुनावों में यहां यूकेडी, कांग्रेस और निर्दलीय उम्मीदवारों का दबदबा रहा।भगवानपुर में भी भाजपा 2002 के बाद जीत का स्वाद नहीं चख सकी। उसके बाद बसपा और कांग्रेस ने यहां मजबूत पकड़ बनाई।हल्द्वानी सीट भी लंबे समय से कांग्रेस का गढ़ बनी हुई है। भाजपा यहां 2007 के बाद दोबारा जीत हासिल नहीं कर सकी।

त्रिकोणीय मुकाबले पर खास नजर

भाजपा की रणनीति का सबसे दिलचस्प हिस्सा उन सीटों पर नजर रखना है, जहां मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है। पार्टी मानती है कि यदि कांग्रेस के साथ किसी तीसरे उम्मीदवार की मजबूत मौजूदगी रहती है तो इसका सीधा लाभ भाजपा को मिल सकता है।इसी वजह से संगठन प्रत्येक सीट पर स्थानीय राजनीतिक गतिविधियों, संभावित बागियों, निर्दलीय उम्मीदवारों और छोटे दलों की भूमिका का भी लगातार आकलन कर रहा है। पार्टी की कोशिश है कि जहां भी विपक्षी वोटों का बंटवारा संभव हो, वहां भाजपा अपने पक्ष में माहौल तैयार करे।

सर्वे से लेकर उम्मीदवार तक, हर समीकरण पर काम

भाजपा केवल संगठन मजबूत करने तक सीमित नहीं है। अंदरूनी सर्वे के जरिए यह भी देखा जा रहा है कि किस उम्मीदवार की स्वीकार्यता सबसे ज्यादा है। जातीय समीकरण, स्थानीय मुद्दे, जनसंपर्क, संगठन में सक्रियता और जीत की संभावना जैसे सभी पहलुओं का आकलन किया जा रहा है।पार्टी नेतृत्व का मानना है कि समय रहते सही उम्मीदवार और मजबूत बूथ नेटवर्क तैयार कर लिया जाए तो वर्षों से हारती आ रही सीटों पर भी जीत संभव है।

प्रदेश नेतृत्व का बड़ा दावा

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट का कहना है कि जिन सीटों पर पार्टी अब तक सफल नहीं हो सकी, वहां भी काफी पहले से तैयारी शुरू कर दी गई है। सभी राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों का गहराई से अध्ययन किया जा रहा है। जहां त्रिकोणीय मुकाबले की संभावना होगी, वहां भाजपा अपनी रणनीति के अनुसार चुनावी माहौल बनाने का प्रयास करेगी।वहीं प्रदेश महामंत्री कुंदन सिंह परिहार का कहना है कि वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में इन सीटों पर भाजपा के प्रति सकारात्मक माहौल दिखाई दे रहा है। इसके बावजूद संगठन ने कोई जोखिम नहीं लिया है और अलग रणनीति के साथ चुनावी तैयारियां तेज कर दी हैं।

क्या इस बार टूटेगा हार का इतिहास?

उत्तराखंड में भाजपा लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का लक्ष्य लेकर मैदान में उतर रही है। लेकिन पार्टी जानती है कि केवल सरकार बनाना ही पर्याप्त नहीं होगा। यदि वह उन सीटों पर भी कमल खिला देती है, जहां अब तक कभी जीत नहीं मिली, तो यह संगठन की सबसे बड़ी चुनावी उपलब्धियों में गिना जाएगा।अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि क्या भाजपा का यह माइक्रो मैनेजमेंट, बूथ स्तर की रणनीति और कोर कमेटी का सीधा हस्तक्षेप वर्षों पुराना चुनावी इतिहास बदल पाएगा, या फिर ये अभेद्य किले एक बार फिर भाजपा की पहुंच से दूर रहेंगे। आने वाला विधानसभा चुनाव इस सवाल का सबसे बड़ा जवाब देगा।

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