पश्चिम एशिया में एक बार फिर हालात बेहद विस्फोटक हो चुके हैं। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य टकराव के बीच रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने ऐसा कदम उठाया है, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। रूस ने ईरान की हवाई सुरक्षा के समर्थन में अपना अत्याधुनिक TU-214GU ‘डूम्सडे’ एयरक्राफ्ट भेजा है। इसे सिर्फ सैन्य सहयोग नहीं, बल्कि अमेरिका, नाटो और इजराइल को दिया गया बेहद मजबूत रणनीतिक संदेश माना जा रहा है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस कदम के बाद चीन भी खुलकर ईरान के साथ खड़ा होगा? और क्या दुनिया तीसरे विश्वयुद्ध की ओर बढ़ रही है?
पुतिन का बड़ा दांव, ट्रंप के लिए सीधा संदेश
रूस का यह फैसला केवल ईरान की मदद तक सीमित नहीं है। यह अमेरिका को यह बताने की कोशिश भी है कि पश्चिम एशिया अब पूरी तरह उसकी मनमर्जी से नहीं चलेगा। रूस साफ संकेत दे रहा है कि यदि अमेरिका और इजराइल सैन्य दबाव बढ़ाते हैं, तो मॉस्को भी अपने सहयोगी देशों की सुरक्षा के लिए मैदान में उतरने से पीछे नहीं हटेगा।
रूस की कोशिश केवल शक्ति प्रदर्शन नहीं बल्कि कूटनीतिक दबाव बनाना भी है। पुतिन चाहते हैं कि अमेरिका और ईरान दोबारा बातचीत की मेज पर लौटें। हालांकि हालात फिलहाल इसके उलट दिखाई दे रहे हैं।
यूक्रेन से शुरू हुआ खेल, अब पहुंचा पश्चिम एशिया
फरवरी 2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद रूस लगातार पश्चिमी देशों से टकराव की स्थिति में है। अमेरिका और नाटो के समर्थन से यूक्रेन को मिली ताकत ने रूस को पहले ही चुनौती दी हुई थी। इसके बाद सीरिया में बशर अल-असद सरकार का पतन रूस के लिए बड़ा झटका माना गया।इसी दौरान हमास-इजराइल युद्ध ने पूरे पश्चिम एशिया को आग में झोंक दिया। हमास, हिज्बुल्ला और हूती विद्रोहियों के खिलाफ इजराइल की कार्रवाई धीरे-धीरे ईरान तक पहुंच गई। अब अमेरिका और इजराइल सीधे ईरान को निशाना बना रहे हैं, जबकि जवाब में ईरान अमेरिकी सैन्य ठिकानों और इजराइली ठिकानों पर हमले कर रहा है।

क्या चीन भी खोलेगा अपने पत्ते?
रूस खुलकर ईरान के साथ खड़ा दिखाई देने लगा है, लेकिन चीन अब भी सावधानी से कदम बढ़ा रहा है। बीजिंग अब तक ईरान को आर्थिक, तकनीकी और कूटनीतिक सहयोग देता रहा है, लेकिन सीधे युद्ध में शामिल होने से बचता आया है।हालांकि अगर होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर संघर्ष और गहरा होता है, तो चीन के लिए तटस्थ रहना आसान नहीं होगा। दुनिया की सबसे बड़ी ऊर्जा जरूरतों में से एक इसी रास्ते से पूरी होती है और चीन इसका सबसे बड़ा उपभोक्ता है। ऐसे में बीजिंग के अगले कदम पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं।
होर्मुज बना दुनिया की सबसे बड़ी चिंता
ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव का सबसे बड़ा असर होर्मुज जलडमरूमध्य पर दिखाई दे रहा है। दुनिया के करीब 20 प्रतिशत से अधिक कच्चे तेल, गैस और उर्वरक की सप्लाई इसी समुद्री रास्ते से होती है।अगर यह मार्ग लंबे समय तक बाधित रहता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल और गैस की कीमतों में जबरदस्त उछाल आ सकता है। इसका सीधा असर भारत समेत दुनिया के लगभग सभी देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। महंगाई बढ़ सकती है, उद्योगों की लागत बढ़ेगी और वैश्विक व्यापार प्रभावित होगा।

ईरान की रणनीति क्या है?
ईरान खुद को केवल अपने अस्तित्व की लड़ाई नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र की संप्रभुता की लड़ाई लड़ने वाला देश बताता है। तेहरान लगातार दावा कर रहा है कि उसका लक्ष्य पश्चिम एशिया से अमेरिकी सैन्य मौजूदगी को खत्म करना है।ईरान की कुद्स फोर्स लंबे समय से इसी रणनीति पर काम करती रही है। अमेरिका द्वारा मारे गए मेजर जनरल कासिम सुलेमानी इसी नीति के प्रमुख रणनीतिकार माने जाते थे। आज भी ईरान उसी सैन्य सिद्धांत पर आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है।
अमेरिका क्या चाहता है?
दूसरी ओर अमेरिका ईरान पर लगातार दबाव बना रहा है। वॉशिंगटन चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर स्पष्ट समझौता करे, क्षेत्रीय प्रॉक्सी संगठनों को समर्थन देना बंद करे और होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर आक्रामक नीति से पीछे हटे।इसी रणनीति के तहत अमेरिका लगातार सैन्य दबाव और आर्थिक प्रतिबंध दोनों का इस्तेमाल कर रहा है। लेकिन हर नए हमले के बाद ईरान भी पहले से ज्यादा आक्रामक जवाब देता नजर आ रहा है।
विशेषज्ञों की राय
विदेश मामलों के जानकारों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच भरोसे की भारी कमी है। यही वजह है कि हर बार शांति वार्ता शुरू होने से पहले या उसके दौरान सैन्य कार्रवाई फिर शुरू हो जाती है।विशेषज्ञों का कहना है कि रूस का सक्रिय होना इस संकट को और जटिल बना सकता है। यदि चीन भी खुलकर ईरान के साथ आता है, तो यह संघर्ष केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि महाशक्तियों के बीच सीधा टकराव बन सकता है।
क्या तीसरे विश्वयुद्ध का खतरा?
सबसे बड़ा डर यही है कि कहीं यह संघर्ष सीमित युद्ध से निकलकर वैश्विक टकराव का रूप न ले ले। एक तरफ अमेरिका, नाटो और इजराइल हैं, तो दूसरी ओर रूस और संभावित रूप से चीन की भूमिका लगातार चर्चा में है।यदि महाशक्तियां सीधे आमने-सामने आती हैं तो पूरी दुनिया गंभीर संकट में फंस सकती है। हालांकि फिलहाल सभी पक्ष प्रत्यक्ष युद्ध से बचने की कोशिश भी करते दिखाई देते हैं।
क्या अब भी बची है शांति की उम्मीद?
हालात भले ही बेहद तनावपूर्ण हों, लेकिन उम्मीद पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। ओमान जैसे देश पहले भी अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा चुके हैं। यदि दोनों पक्ष बातचीत के लिए तैयार होते हैं तो तनाव कम किया जा सकता है।हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि इस बार केवल द्विपक्षीय बातचीत पर्याप्त नहीं होगी। संयुक्त राष्ट्र या किसी मजबूत अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थ की भूमिका ही स्थायी समाधान का रास्ता खोल सकती है।रूस का ‘डूम्सडे’ एयरक्राफ्ट भेजना केवल सैन्य सहायता नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का बड़ा संकेत है। अब निगाहें ट्रंप के अगले कदम और चीन की रणनीति पर हैं। यदि कूटनीति सफल नहीं हुई तो पश्चिम एशिया का यह संघर्ष पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा बन सकता है।
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