बराना नदी में ‘चिता आंदोलन’! चिताओं पर बैठे आदिवासी, बोले— “घर बचाएं या जान?”

Editorial
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मध्य प्रदेश क्या कोई इंसान अपने ही जीते-जी अपनी चिता पर बैठ सकता है? क्या कोई ऐसा दर्द हो सकता है, जो मौत के प्रतीक को भी विरोध का माध्यम बना दे? मध्य प्रदेश के छतरपुर से आई ये तस्वीरें सिर्फ एक आंदोलन की नहीं, बल्कि उस संघर्ष की हैं, जहां लोग कह रहे हैं—“अगर हमारी जमीन चली गई, तो हमारी जिंदगी भी खत्म हो जाएगी।”बराना नदी के बीच लकड़ियों से सजाई गई चिताओं पर बैठे आदिवासी परिवार पूरे देश से एक सवाल पूछ रहे हैं—क्या विकास की कीमत हमेशा सबसे कमजोर लोगों को ही चुकानी पड़ेगी?

बराना नदी बनी दर्द और प्रतिरोध की धारा

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले की बराना नदी इन दिनों सिर्फ पानी नहीं बहा रही, बल्कि अपने साथ एक पूरे समाज का दर्द, गुस्सा और बेबसी भी बहा रही है। नदी के बीच दर्जनों आदिवासी परिवार लकड़ियों से बनी प्रतीकात्मक चिताओं पर बैठकर विरोध जता रहे हैं। यह कोई सामान्य धरना या प्रदर्शन नहीं, बल्कि अपनी पहचान और अस्तित्व बचाने की अंतिम पुकार है।पिछले कई दिनों से जारी इस ‘चिता आंदोलन’ ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। महिलाओं की आंखों में आंसू हैं, बुजुर्गों के चेहरे पर चिंता है और बच्चों के भविष्य पर सवाल खड़े हैं।

आखिर क्यों भड़का यह आंदोलन?

इस विरोध की जड़ में है केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना, जिसे देश की पहली बड़ी नदी जोड़ो योजना माना जाता है। सरकार का दावा है कि इस परियोजना से बुंदेलखंड की वर्षों पुरानी जल संकट की समस्या काफी हद तक कम होगी। लाखों लोगों को सिंचाई के लिए पानी मिलेगा, पेयजल की उपलब्धता बढ़ेगी और बिजली उत्पादन में भी मदद मिलेगी।लेकिन दूसरी तरफ वे गांव हैं, जो इस परियोजना के डूब क्षेत्र में आ रहे हैं।आदिवासी परिवारों का कहना है कि उनके खेत, जंगल, घर, देवी-देवताओं के स्थान, कब्रगाह, पूर्वजों की यादें और पूरी जीवनशैली इसी जमीन से जुड़ी हुई है। उनका आरोप है कि पुनर्वास और मुआवजे की प्रक्रिया अभी भी पूरी तरह संतोषजनक नहीं है, जबकि विस्थापन का खतरा लगातार करीब आ रहा है।

“जमीन नहीं, हमारी पूरी दुनिया छिन रही है”

आंदोलन में शामिल एक बुजुर्ग आदिवासी की आवाज पूरे संघर्ष की कहानी कह देती है।“अगर हमारी जमीन चली गई, तो हमारी जिंदगी भी खत्म हो जाएगी। इसलिए हम पहले ही अपनी चिता पर बैठ गए हैं।”एक महिला प्रदर्शनकारी की आंखों से आंसू बहते हुए कहते हैं—“हमारे बच्चों का बचपन यहीं बीता है। हमारे पूर्वजों की यादें यहीं हैं। हमारे देवस्थान यहीं हैं। हमें सिर्फ घर नहीं छोड़ना पड़ रहा, हमारी पूरी दुनिया छिन रही है।”इन शब्दों में सिर्फ नाराजगी नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से बिछड़ने का दर्द साफ महसूस होता है।

चिता क्यों बनी आंदोलन का प्रतीक?

आमतौर पर चिता मृत्यु का प्रतीक मानी जाती है, लेकिन बराना नदी में यही चिता प्रतिरोध का सबसे बड़ा प्रतीक बन गई है।आंदोलनकारियों का कहना है कि जब पहचान, संस्कृति और जीवन का आधार ही खत्म होने वाला हो, तब जीने और मरने के बीच का फर्क भी धुंधला पड़ जाता है।नदी के बीच बैठी ये प्रतीकात्मक चिताएं दुनिया को यही संदेश दे रही हैं—“घर छिनने से पहले मौत मंजूर है, लेकिन अपनी पहचान नहीं छोड़ेंगे।”यही तस्वीरें अब सोशल मीडिया से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक चर्चा का विषय बनी हुई हैं।

विकास बनाम विस्थापन की पुरानी बहस फिर तेज

केन-बेतवा परियोजना केवल एक इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट नहीं है। यह एक ऐसी बहस को फिर सामने ले आई है, जो देश में दशकों से चल रही है—क्या विकास और विस्थापन साथ-साथ चल सकते हैं?सरकार का कहना है कि यह परियोजना बुंदेलखंड की तस्वीर बदल सकती है। सूखे से जूझ रहे लाखों किसानों को पानी मिलेगा, खेती बेहतर होगी और क्षेत्र का आर्थिक विकास तेज होगा।लेकिन प्रभावित परिवार पूछ रहे हैं—क्या विकास का लाभ किसी और को मिलेगा और उसकी सबसे बड़ी कीमत हमें चुकानी पड़ेगी?

सामाजिक कार्यकर्ताओं की चिंता

सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि किसी भी बड़ी विकास परियोजना की सफलता केवल बांध, सड़क या नहर बनने से तय नहीं होती।उनके अनुसार—“सफल विकास वही है, जिसमें प्रभावित लोगों का सम्मानजनक पुनर्वास, न्यायपूर्ण मुआवजा और उनकी संस्कृति की रक्षा सुनिश्चित की जाए।”वे कहते हैं कि संवाद, विश्वास और पारदर्शिता किसी भी बड़े प्रोजेक्ट की पहली शर्त होनी चाहिए।

प्रशासन का क्या कहना है?

प्रशासन का कहना है कि प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और मुआवजे के लिए नियमों के अनुसार कार्रवाई की जा रही है। अधिकारियों का दावा है कि लोगों से लगातार बातचीत हो रही है और उनकी समस्याओं के समाधान का प्रयास किया जा रहा है।साथ ही प्रशासन ने आंदोलनकारियों से शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने की अपील की है ताकि बातचीत के जरिए समाधान निकाला जा सके।हालांकि आंदोलनकारी कहते हैं कि जब तक उनकी प्रमुख मांगों पर स्पष्ट और भरोसेमंद कार्रवाई नहीं होती, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा।

सबसे बड़ा सवाल…

बराना नदी के बीच बैठी महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे शायद किसी राजनीतिक नारे से ज्यादा बड़ा सवाल पूछ रहे हैं—क्या विकास का ऐसा मॉडल नहीं हो सकता, जिसमें किसी को अपनी जमीन, संस्कृति और पहचान छोड़ने के लिए मजबूर न होना पड़े?क्या आधुनिक भारत का विकास उन लोगों की आवाज सुने बिना पूरा माना जा सकता है, जिनकी पीढ़ियां सदियों से जंगल, नदी और मिट्टी के साथ अपना जीवन जीती आई हैं?बराना नदी में सजाई गई ये चिताएं सिर्फ लकड़ियों का ढेर नहीं हैं। ये उस पीड़ा का प्रतीक हैं, जिसे सरकारी फाइलों, मुआवजे की रकम या विकास के आंकड़ों से नहीं मापा जा सकता।यह कहानी केवल एक परियोजना की नहीं, बल्कि उन हजारों लोगों की है, जिनके लिए जमीन सिर्फ संपत्ति नहीं, बल्कि पहचान, संस्कृति, इतिहास और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य है।अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या विकास और मानव गरिमा के बीच कोई ऐसा रास्ता निकलेगा, जहां प्रगति भी हो और किसी का अस्तित्व भी सुरक्षित रहे। क्योंकि किसी भी राष्ट्र की असली ताकत केवल बड़े प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि उसके लोगों का विश्वास होता है।

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