तेहरान शोक, श्रद्धा और भावनाओं का ऐसा सैलाब शायद ही कभी देखने को मिलता है। ईरान के दिवंगत सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई को अंतिम विदाई देने के लिए लाखों लोग सड़कों पर उमड़ पड़े। तेहरान से शुरू हुआ श्रद्धांजलि का सिलसिला मशहद में उनके सुपुर्द-ए-ख़ाक होने तक जारी रहा, जबकि इराक के पवित्र शहर कर्बला सहित कई धार्मिक स्थलों पर भी उनके लिए विशेष दुआएं और मजलिसें आयोजित की गईं।काले लिबास में हजारों अज़ादार, हाथों में तस्वीरें, आंखों में आंसू और लबों पर दुआएं… यह दृश्य केवल एक नेता की विदाई का नहीं, बल्कि एक ऐसे दौर के अंत का प्रतीक बन गया जिसने दशकों तक ईरान की राजनीति और पश्चिम एशिया की रणनीतिक दिशा को प्रभावित किया।
तेहरान में आयोजित अंतिम दर्शन के दौरान बड़ी संख्या में लोग जनाज़े के दीदार के लिए पहुंचे। कई स्थानों पर भीड़ इतनी अधिक थी कि सुरक्षा एजेंसियों को अतिरिक्त इंतज़ाम करने पड़े। मातमी नारों और दुआओं के बीच लोगों ने अपने नेता को आखिरी सलाम पेश किया। इसके बाद अंतिम यात्रा विभिन्न धार्मिक पड़ावों से गुजरते हुए मशहद पहुंची, जहां इमाम रज़ा के पवित्र हरम के निकट उन्हें सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया।इसी दौरान इराक के पवित्र शहर कर्बला में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु और शिया समुदाय के लोग इमाम हुसैन (अ.स.) और हज़रत अब्बास (अ.स.) के हरम में पहुंचे। यहां दिवंगत नेता की मग़फ़िरत के लिए विशेष दुआएं की गईं और कई स्थानों पर शोक सभाएं आयोजित हुईं। कर्बला की फिज़ा में धार्मिक नारों और मातमी माहौल ने गहरी संवेदना का दृश्य प्रस्तुत किया।
श्रद्धांजलि सभाओं में मौजूद लोगों का कहना था कि व्यक्तित्व भले दुनिया से चला जाए, लेकिन उसके विचार, फैसले और इतिहास में छोड़ी गई छाप लंबे समय तक याद रखी जाती है। यही वजह रही कि ईरान ही नहीं, बल्कि इराक, लेबनान और दुनिया के कई देशों में शिया समुदाय ने विशेष प्रार्थना सभाएं आयोजित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी।आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई लगभग चार दशकों तक ईरान के सर्वोच्च नेता रहे। उनके नेतृत्व में ईरान ने कई अंतरराष्ट्रीय संकटों, प्रतिबंधों और क्षेत्रीय संघर्षों का सामना किया। समर्थकों के लिए वह इस्लामी गणराज्य के सबसे प्रभावशाली चेहरों में से एक थे, जबकि आलोचकों ने उनके शासनकाल में राजनीतिक और सामाजिक प्रतिबंधों को लेकर सवाल भी उठाए।
उनकी अंतिम यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं रही, बल्कि यह ईरान की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों और क्षेत्रीय तनाव के बीच शक्ति प्रदर्शन का भी प्रतीक बनी। लाखों लोगों की मौजूदगी ने यह संदेश देने की कोशिश की कि देश का नेतृत्व बदल सकता है, लेकिन राज्य की संस्थाएं और व्यवस्था आगे भी अपनी निरंतरता बनाए रखेंगी।इस बीच पश्चिम एशिया में जारी तनाव और अमेरिका-ईरान संबंधों को लेकर भी दुनिया की निगाहें इस पूरे घटनाक्रम पर टिकी रहीं। विश्लेषकों का मानना है कि आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की विदाई के बाद ईरान की आंतरिक राजनीति, विदेश नीति और क्षेत्रीय रणनीति में नए बदलाव देखने को मिल सकते हैं।भावनाओं से भरे इस माहौल में एक बात बार-बार सुनाई देती रही—“रुख़्सत सिर्फ़ जिस्म की होती है, यादें और इतिहास हमेशा ज़िंदा रहते हैं।” यही वजह है कि तेहरान से लेकर मशहद और कर्बला तक दुआओं, मातम और श्रद्धांजलि का सिलसिला लंबे समय तक जारी रहा।आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की विदाई ने एक युग के अंत का संकेत दिया है। अब पूरी दुनिया की निगाहें ईरान के नए नेतृत्व और आने वाले समय में उसकी नीतियों पर टिकी हैं। हालांकि राजनीतिक परिस्थितियां बदल सकती हैं, लेकिन यह अंतिम यात्रा इतिहास के उन पलों में दर्ज हो गई है जिन्हें लंबे समय तक याद किया जाएगा।
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