राम मंदिर ट्रस्ट में सभी समाजों को मिले प्रतिनिधित्व! वनवासी समाज से प्रधान पुजारी बनाने की उठी मांग, प्रधानमंत्री को भेजा गया ज्ञापन

Editorial
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रिपोर्ट: धर्मेंद्र सिंह

अयोध्या श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की संरचना और मंदिर की व्यवस्थाओं में सभी वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित करने की मांग अब तेज होती नजर आ रही है। भक्ति आंदोलन मंच न्यास ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संबोधित एक विस्तृत ज्ञापन भेजकर ट्रस्ट में सामाजिक समरसता और व्यापक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की अपील की है। संगठन ने मांग की है कि राम मंदिर ट्रस्ट, पुजारियों और कर्मचारियों की नियुक्ति में सभी वर्गों को समान अवसर दिया जाए तथा वनवासी समाज से प्रधान पुजारी नियुक्त किया जाए, ताकि भगवान श्रीराम के जीवन और आदर्शों की वास्तविक भावना को स्थापित किया जा सके।संगठन का कहना है कि श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन केवल किसी एक वर्ग का नहीं, बल्कि पूरे हिंदू समाज की आस्था, संघर्ष और बलिदान का परिणाम है। ऐसे में मंदिर की व्यवस्था भी उसी व्यापक सामाजिक भावना को प्रतिबिंबित करनी चाहिए।

‘राम सभी के हैं, इसलिए ट्रस्ट भी सबका होना चाहिए’

भक्ति आंदोलन मंच न्यास के अध्यक्ष एवं विश्व हिंदी परिषद के केंद्रीय मार्गदर्शक सदस्य राजर्षि रामनयनदास रामायणी ने कहा कि भगवान श्रीराम संपूर्ण मानव समाज के आराध्य हैं। उनके जीवन का सबसे बड़ा संदेश समानता, सेवा और सामाजिक समरसता है। इसलिए राम मंदिर ट्रस्ट की संरचना ऐसी होनी चाहिए, जिसमें हर समाज, हर वर्ग और हर परंपरा के लोग स्वयं को सम्मानपूर्वक प्रतिनिधित्व करता हुआ महसूस करें।उन्होंने कहा कि वनवासी समाज से प्रधान पुजारी नियुक्त किया जाना चाहिए, क्योंकि भगवान श्रीराम के वनवास काल का सबसे बड़ा आधार वनवासी समाज ही रहा। श्रीराम के संघर्ष, त्याग और आदर्शों को स्थापित करने में वनवासी समाज की ऐतिहासिक भूमिका रही है। इसलिए राम मंदिर की पूजा व्यवस्था में भी इस समाज को उचित स्थान मिलना चाहिए।

जाति-पांति से ऊपर उठकर हो पुजारियों की नियुक्ति

ज्ञापन में यह भी मांग की गई है कि मंदिर में पुजारियों की नियुक्ति जाति या सामाजिक भेदभाव के आधार पर नहीं, बल्कि योग्यता, साधना और धार्मिक ज्ञान के आधार पर की जाए।रामनयनदास ने कहा कि वर्षों से रामभक्ति में समर्पित संतों, साधकों और धार्मिक विद्वानों को भी मंदिर की व्यवस्थाओं में स्थान मिलना चाहिए। उनका मानना है कि राम मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि पूरे देश की सांस्कृतिक चेतना का केंद्र है।

वनवासी समाज के योगदान को नहीं भुलाया जा सकता

ज्ञापन में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि भगवान श्रीराम के 14 वर्ष के वनवास काल में वनवासी समाज ने हर कदम पर उनका साथ दिया था। निषादराज, शबरी, वानर सेना और वन क्षेत्रों में रहने वाले अनेक समुदायों का योगदान भारतीय संस्कृति और रामायण का महत्वपूर्ण अध्याय है।संगठन ने कहा कि यदि भगवान श्रीराम ने अपने जीवन में समाज के हर वर्ग को सम्मान दिया, तो आज राम मंदिर की व्यवस्थाओं में भी उसी भावना का पालन होना चाहिए।

आरएसएस के कार्यों का भी किया उल्लेख

ज्ञापन में यह भी कहा गया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ वर्षों से वनवासी समाज के बीच धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक जागरण का कार्य कर रहा है। इसके बावजूद अब तक राम मंदिर ट्रस्ट में वनवासी समाज को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया है। संगठन ने इस विषय पर गंभीर पुनर्विचार करने की आवश्यकता जताई है।

‘राम मंदिर राष्ट्रीय एकता का प्रतीक’

करतालिया आश्रम के पीठाधीश्वर महंत बालयोगी रामदास ने कहा कि राम मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की एकता, संस्कृति और सामाजिक समरसता का प्रतीक है।उन्होंने कहा कि ट्रस्ट, पुजारियों और कर्मचारियों के चयन में सभी समाजों की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। साथ ही अयोध्या के संतों, सभी शंकराचार्यों और जगद्गुरुओं को भी मंदिर की व्यवस्था में सम्मानजनक स्थान मिलना चाहिए।उन्होंने यह भी कहा कि मंदिर प्रबंधन की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिसमें किसी एक वर्ग का वर्चस्व न हो, बल्कि सभी परंपराओं और संत समाज का समान प्रतिनिधित्व दिखाई दे।

‘हनुमानगढ़ी मॉडल’ अपनाने की मांग

महंत बालयोगी रामदास ने सुझाव दिया कि राम मंदिर ट्रस्ट की कार्यप्रणाली हनुमानगढ़ी की परंपरा की तरह सामूहिक और संत-आधारित होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि मंदिर संचालन में सभी प्रमुख धार्मिक परंपराओं और समाजों के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाए, जिससे निर्णय प्रक्रिया अधिक संतुलित और सर्वमान्य बन सके।

‘राम का संदेश समरसता का है’

रावत मंदिर के पीठाधीश्वर महंत बालक महाराज ने कहा कि भगवान श्रीराम का पूरा जीवन समानता, न्याय और सामाजिक समरसता का संदेश देता है। इसलिए मंदिर की व्यवस्थाओं में भी उसी आदर्श का पालन होना चाहिए।उन्होंने कहा कि वर्षों से रामभक्ति और राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े समर्पित संतों और साधकों को बिना किसी सामाजिक भेदभाव के मंदिर की सेवा का अवसर मिलना चाहिए।

संत समाज ने किया समर्थन

इस अवसर पर बड़ी संख्या में संत-महात्मा और धार्मिक संगठनों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे। सभी ने एक स्वर में कहा कि राम मंदिर पूरे राष्ट्र की आस्था का केंद्र है, इसलिए इसकी व्यवस्थाओं में भी सभी समाजों, परंपराओं और संत समुदाय की समान भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।प्रधानमंत्री को भेजे गए इस ज्ञापन के माध्यम से भक्ति आंदोलन मंच न्यास ने स्पष्ट संदेश दिया है कि राम मंदिर केवल भव्यता का प्रतीक नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता का भी केंद्र बने। अब इस मांग पर केंद्र सरकार और श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का क्या रुख रहता है, इस पर संत समाज और देशभर के श्रद्धालुओं की नजरें टिकी हुई हैं।

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