असम विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों का दिन राज्य की राजनीति के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। 126 सीटों वाली विधानसभा में यह तय होगा कि आने वाले पांच वर्षों के लिए सत्ता की कमान किसके हाथ में जाएगी।
इस बार पूरे राज्य में एक ही चरण में 9 अप्रैल को मतदान हुआ था, जिसमें मतदाताओं ने उत्साह के साथ हिस्सा लिया। चुनाव आयोग के अनुसार इस बार 85 प्रतिशत से अधिक मतदान दर्ज किया गया, जो पिछले चुनाव की तुलना में अधिक है।
इतने भारी मतदान ने राजनीतिक दलों की चिंता और उम्मीद दोनों को बढ़ा दिया है। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या किसी दल को स्पष्ट बहुमत मिलेगा या फिर असम में एक बार फिर गठबंधन की राजनीति निर्णायक भूमिका निभाएगी।
बहुमत का गणित: 64 सीटों का ‘मैजिक नंबर’
सरकार बनाने के लिए जरूरी है स्पष्ट बहुमत
असम विधानसभा में कुल 126 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए किसी भी दल या गठबंधन को कम से कम 64 सीटों की जरूरत होती है। यही संख्या सत्ता का ‘मैजिक नंबर’ मानी जाती है।
संविधान के अनुसार, जिस भी राजनीतिक दल या गठबंधन के पास बहुमत होता है, वह राज्यपाल के समक्ष सरकार बनाने का दावा पेश करता है। यदि किसी दल के पास 64 या उससे अधिक सीटें होती हैं, तो वह सीधे सरकार गठन की प्रक्रिया शुरू कर सकता है।
लेकिन अगर कोई भी दल इस आंकड़े तक नहीं पहुंचता, तो राज्य में त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति बन जाती है, जहां गठबंधन राजनीति निर्णायक भूमिका निभाती है।
त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में क्या होता है?

अगर चुनाव परिणामों में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, तो सबसे बड़ी पार्टी या गठबंधन को सरकार बनाने का अवसर दिया जाता है।
ऐसी स्थिति में निर्दलीय विधायक और छोटे क्षेत्रीय दल सत्ता का संतुलन बदल सकते हैं। यही कारण है कि असम की राजनीति में 64 सीटों का आंकड़ा केवल गणित नहीं, बल्कि रणनीति का केंद्र बन जाता है।
असम की राजनीति में गठबंधन की अहम भूमिका
भाजपा और कांग्रेस गठबंधन के बीच मुख्य मुकाबला
असम की राजनीति लंबे समय से दो प्रमुख खेमों में बंटी हुई है। एक ओर भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाला गठबंधन है, जबकि दूसरी ओर कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन चुनावी मैदान में उतरता है।
दोनों ही गठबंधन क्षेत्रीय दलों के सहयोग के बिना सरकार बनाने की स्थिति में अक्सर कमजोर पड़ जाते हैं। यही वजह है कि असम में चुनाव केवल दो बड़े दलों की लड़ाई नहीं, बल्कि गठबंधन की जटिल राजनीति बन जाती है।
असम की राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका हमेशा से महत्वपूर्ण रही है। असम गण परिषद (AGP) और यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल (UPPL) जैसे दल कई बार सत्ता समीकरण बदलने में निर्णायक साबित हुए हैं।
निर्दलीय उम्मीदवार भी कई बार ऐसी स्थिति में पहुंच जाते हैं जहां उनका समर्थन किसी भी गठबंधन को बहुमत तक पहुंचा सकता है। यही कारण है कि 64 सीटों का आंकड़ा हासिल करने के लिए हर छोटी-बड़ी राजनीतिक ताकत अहम हो जाती है।
परिसीमन के बाद बदला चुनावी समीकरण
नए राजनीतिक नक्शे ने बढ़ाई चुनौती
हाल ही में असम में परिसीमन प्रक्रिया पूरी की गई है, जिसमें विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं में बदलाव किया गया। हालांकि कुल सीटों की संख्या 126 ही रखी गई है, लेकिन कई सीटों के आरक्षण और भौगोलिक स्वरूप में बदलाव हुआ है।
इस बदलाव ने राजनीतिक दलों के लिए चुनावी रणनीति को और कठिन बना दिया है। अब उम्मीदवारों को नए सामाजिक समीकरणों और स्थानीय मुद्दों के आधार पर वोट मांगना पड़ रहा है।
क्षेत्रीय मुद्दों का बढ़ा प्रभाव
असम में चुनावी मुद्दे क्षेत्र के हिसाब से बदलते रहते हैं। ऊपरी असम, निचला असम और बराक घाटी में मतदाताओं की प्राथमिकताएं अलग-अलग होती हैं।
ऊपरी असम में विकास और रोजगार बड़े मुद्दे हैं, जबकि बराक घाटी में भाषा और पहचान से जुड़े मुद्दे अधिक प्रभावी माने जाते हैं। इन सभी क्षेत्रों में संतुलन बनाना ही सत्ता की कुंजी माना जाता है।
चुनाव परिणाम के बाद सरकार गठन की प्रक्रिया
चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद सबसे बड़ी पार्टी या गठबंधन को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जाता है। इसके लिए विधायक दल का नेता चुना जाता है, जो बाद में मुख्यमंत्री बनता है।
राज्यपाल उन्हें शपथ ग्रहण और सरकार गठन की प्रक्रिया पूरी करने के लिए आमंत्रित करते हैं। यदि किसी भी दल के पास स्पष्ट बहुमत नहीं होता, तो राज्यपाल सबसे बड़े गठबंधन को सरकार बनाने का अवसर देते हैं।
ऐसी स्थिति में समर्थन पत्र और गठबंधन समझौते बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
असम चुनाव 2026: सियासी भविष्य की दिशा तय करेगा जनादेश
इस बार का चुनाव असम की राजनीति के लिए निर्णायक माना जा रहा है। भारी मतदान ने यह संकेत दिया है कि जनता ने बदलाव या स्थिरता को लेकर स्पष्ट संदेश दिया है, जो नतीजों में सामने आएगा।
64 सीटों का आंकड़ा केवल सत्ता की कुंजी नहीं, बल्कि असम की राजनीतिक दिशा तय करने वाला नंबर बन चुका है। अब देखना यह होगा कि कौन सा गठबंधन इस जादुई आंकड़े को पार कर राज्य की कमान संभालता है।
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