
पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर बड़ा सियासी भूचाल आने के संकेत मिल रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर लंबे समय से चल रही नाराजगी अब खुलकर सामने आती दिखाई दे रही है। पार्टी की वरिष्ठ सांसद काकोली घोष दस्तीदार के एक बड़े दावे ने न केवल बंगाल की राजनीति को हिला दिया है, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी हलचल मचा दी है। काकोली घोष ने दावा किया है कि टीएमसी के करीब 20 सांसदों ने भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को समर्थन देने का फैसला कर लिया है और इस संबंध में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र भी भेजा गया है। हालांकि पार्टी नेतृत्व की ओर से अभी तक इस दावे पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन इस बयान ने राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब टीएमसी सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी दिल्ली में विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक की बैठकों में शामिल होकर भाजपा के खिलाफ रणनीति बनाने में जुटी हुई हैं। ऐसे समय में अपनी ही पार्टी के सांसदों की कथित नाराजगी और एनडीए को समर्थन देने की चर्चा ने ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह दावा सही साबित होता है तो यह केवल टीएमसी के लिए नहीं, बल्कि पूरे विपक्षी गठबंधन के लिए भी बड़ा झटका होगा।काकोली घोष दस्तीदार ने कहा है कि यह फैसला पार्टी के कई सांसदों के साथ विचार-विमर्श के बाद लिया गया है। उनका दावा है कि लोकसभा में टीएमसी के करीब 20 सांसद एनडीए को समर्थन देने के पक्ष में हैं। उन्होंने यह भी कहा कि सांसदों ने अपनी स्थिति से लोकसभा अध्यक्ष को अवगत करा दिया है। वर्तमान में लोकसभा में टीएमसी के 28 सांसद हैं। ऐसे में यदि 20 सांसद अलग रुख अपनाते हैं तो यह पार्टी के संसदीय दल के लिए बड़ा संकट साबित हो सकता है। सूत्रों के अनुसार असंतुष्ट सांसद फिलहाल टीएमसी से इस्तीफा देने या सीधे भाजपा में शामिल होने के पक्ष में नहीं हैं। इसके बजाय वे एक अलग संसदीय समूह के रूप में काम करते हुए एनडीए का समर्थन करने की रणनीति पर विचार कर रहे हैं। माना जा रहा है कि यह कदम दल-बदल विरोधी कानून के तहत कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उठाया जा सकता है। यदि दो-तिहाई सांसद किसी अलग समूह के रूप में सामने आते हैं तो उनके खिलाफ दल-बदल कानून के तहत कार्रवाई करना आसान नहीं होगा।

टीएमसी के भीतर असंतोष की खबरें पिछले कई महीनों से सामने आती रही हैं। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पार्टी को झटका लगने के बाद कई नेताओं और विधायकों ने नेतृत्व के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई थी। बताया जा रहा है कि करीब 58 विधायक पहले ही पार्टी नेतृत्व से नाराज चल रहे हैं। अब यदि सांसदों का एक बड़ा वर्ग भी अलग रुख अपनाता है तो यह ममता बनर्जी के नेतृत्व के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।इस पूरे घटनाक्रम के बीच राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय का इस्तीफा भी टीएमसी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। रॉय ने न केवल राज्यसभा सदस्यता छोड़ी, बल्कि पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया। इस्तीफे के बाद उन्होंने पार्टी नेतृत्व पर तीखे आरोप लगाए और कहा कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग जमीनी हकीकतों से कट चुके हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले कई वर्षों में पार्टी के कई मंत्री, पंचायत प्रतिनिधि और स्थानीय नेता आम लोगों की पहुंच से दूर हो गए हैं, जबकि समर्पित कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज किया गया है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि टीएमसी के भीतर यह असंतोष केवल संगठनात्मक नहीं, बल्कि नेतृत्व और निर्णय प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। कई नेताओं को लगता है कि पार्टी में फैसले सीमित लोगों तक सिमट गए हैं और जमीनी स्तर के नेताओं की बातों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा है। यही वजह है कि समय-समय पर असंतोष की आवाजें सामने आती रही हैं। यदि काकोली घोष का दावा सही साबित होता है तो इसका असर केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं रहेगा। लोकसभा में टीएमसी विपक्ष की प्रमुख पार्टियों में से एक है और उसके सांसदों का बड़ा हिस्सा यदि एनडीए के समर्थन में जाता है तो राष्ट्रीय राजनीति के समीकरण भी प्रभावित हो सकते हैं। दूसरी ओर, यह घटनाक्रम विपक्षी एकता के दावों पर भी सवाल खड़े कर सकता है।फिलहाल पूरे देश की नजर ममता बनर्जी और टीएमसी नेतृत्व की अगली रणनीति पर टिकी हुई है। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि क्या पार्टी इस संकट को संभाल पाएगी या फिर बंगाल की राजनीति में किसी बड़े बदलाव की शुरुआत हो चुकी है। आने वाले दिनों में स्थिति और स्पष्ट होगी, लेकिन इतना तय है कि टीएमसी के भीतर उठी इस बगावत की गूंज अब दिल्ली से लेकर कोलकाता तक सुनाई देने लगी है।
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