मर्दों का क्या भरोसा? एक की गलती की सजा सबको क्यों

Editorial
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एक की गलती की सजा सबको क्यों? मर्द भी रोते हैं…

“एक समय था जब कभी मैं भी हंसा करता था।”

हमने अक्सर किसी न किसी मर्द के मुंह से यह लाइन सुनी होगी। जब कभी वह अपनी कॉलेज की पुरानी फोटो देखता होगा, या बहुत सालों के बाद खुलकर हंसा होगा, तो शायद उसके मन में यही ख्याल आता होगा कि आखिर जिंदगी में वह समय कब पीछे छूट गया, जब खुशियां बिना किसी डर और सवाल के उसके हिस्से में आया करती थीं।अगर कहा जाए तो क्यों एक मर्द के जीवन में खुशियां कुछ पलों की होती हैं? क्यों जब वह कमाता नहीं है तो माता-पिता का विश्वास डगमगाने लगता है? आज तक समझ नहीं आया कि उस मर्द के पास प्रेम जैसी चीज अवसर देखकर क्यों आती है।

कभी सोचिए उस मर्द के बारे में, जो हल्का-सा खुश दिखाई देता है तो उसे शक की नजर से क्यों देखा जाता है। जब वह किसी लड़की से हंसकर बात करता है तो उसे चरित्र का ढीला कहा जाता है और जब बात न करे तो घमंडी। चुप रहे तो कायर, जवाब दे तो बेशर्म। जब पैसा बचाए तो कंजूस और जब दिल से कुछ करे तो दिखावा लगता है।और वह बेचारा जब अपने आप को हिम्मत देकर अपने प्यार से उम्मीद करता है तो अगर नसीब वाला हुआ तो सच्चा प्रेम मिलता है और अगर रिश्ता टूट जाए तो सारा समय अपने आप को कोसता रहता है। कई बार भगवान के आगे भी अपनी खुशियों की भीख मांगता रहता है।

फिर भी समाज के बीच उसे सुनने को मिलता है—“एक कचौड़ी, दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा”, “एक सुट्टा, दो चाय, मर्द जात हाय-हाय।”इन बातों के चक्कर में वे मर्द भी पिस जाते हैं जो इन सब चीजों से दूर रहते हैं। क्योंकि अगर ऐसी हड़ताल हो जाए तो गलत के बजाय सभी मर्द जात को शक के घेरे में क्यों रखा जाता है? एक की गलती की सजा सबको क्यों मिल जाती है?

मर्दों का क्या भरोसा
मर्दों का क्या भरोसा

हर मर्द एक जैसा नहीं होता

अगर हमारा इतिहास उठाकर देखा जाए तो तस्वीर थोड़ी अलग निकलकर सामने आएगी।हमने अक्सर घर के बुजुर्गों से यह कहावत सुनी होगी कि “हर सफल आदमी के पीछे एक औरत का हाथ जरूर होता है।” लेकिन इतिहास में यह कहां ज्यादा सही होगा कि हर सफल औरत के पीछे किसी न किसी मर्द का हाथ जरूर होता है।इसका सबसे बड़ा उदाहरण मैं आपको एक ऐसी कहानी के जरिए बताना चाहता हूं, जो हमारे समाज और सोच दोनों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।एक छोटी लड़की, जिसकी शादी काफी कम उम्र में हो जाती है। उस समय महिलाओं को पढ़ने की स्वतंत्रता तक नहीं थी। उस समय उस लड़की ने खुद तो पढ़ाई की ही, साथ में अपनी पत्नी को भी पढ़ने दिया और यहां तक कि दोनों ने लड़कियों को पढ़ाने का बीड़ा भी उठाया।जिनका जिक्र इन शब्दों में किया जा रहा है, उनका नाम है महात्मा ज्योतिबा फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले। सावित्रीबाई फुले आगे चलकर भारत की पहली महिला शिक्षिकाओं में प्रमुख रूप से जानी गईं। ज्योतिबा फुले ने उन्हें शिक्षा हासिल करने के लिए प्रोत्साहित किया और दोनों ने मिलकर लड़कियों की शिक्षा के लिए महत्वपूर्ण काम किया।इस प्रभावशाली इतिहास पर प्रकाश डालने का हमारा उद्देश्य केवल इतना है कि जैसे हाथ की उंगलियां बराबर नहीं होतीं, वैसे ही हर मर्द एक जैसा नहीं होता।किसी एक व्यक्ति के गलत काम के आधार पर पूरी मर्द जात को एक ही नजर से देखना कितना सही है, यह सवाल हमें खुद से पूछना होगा।

मर्दों का क्या भरोसा
मर्दों का क्या भरोसा

महिलाओं पर अत्याचार को नकारा नहीं जा सकता

इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि महिलाओं पर अत्याचार आज भी हो रहे हैं। महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध और हिंसा समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं। इन घटनाओं को किसी भी तरह सही नहीं ठहराया जा सकता।कई मामलों में इसका कारण एक मर्द होता है, जो समाज पर ऐसी कालिख पोत देता है जिसका असर उन निर्दोष मर्दों के चेहरों पर भी पड़ता है, जिनका उस अपराध से कोई लेना-देना नहीं होता।लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि कुछ लोगों की गलती की सजा संपूर्ण मर्द जात को दी जाए?यह सवाल इसलिए जरूरी है क्योंकि किसी भी समाज को व्यक्ति के कर्म के आधार पर फैसला करना चाहिए, उसकी पूरी पहचान या पूरी जाति के आधार पर नहीं।अगर कोई मर्द किसी महिला के साथ गलत करता है तो उसे उसके किए की सजा मिलनी चाहिए। लेकिन उस गलती के कारण हर पिता, हर भाई, हर पुत्र और हर पति को शक की नजर से देखना क्या सही है?

मर्दों का क्या भरोसा
मर्दों का क्या भरोसा

मुसीबत में वही मर्द मददगार बनता है

हम एक ऐसी परिस्थिति की कल्पना करते हैं कि आधी रात में एक सुनसान इलाके में एक महिला का कुछ लोग पीछा कर रहे हों। तब अगर कोई मर्द दिखाई देगा तो क्या वह महिला मदद के लिए उस मर्द के पास नहीं जाएगी?उस समय शायद उसके मन में यह सवाल नहीं आएगा कि “एक सुट्टा, दो चाय, मर्द जात हाय-हाय।”क्योंकि उस समय उसे उस मर्द की मौजूदगी में मदद और सुरक्षा की उम्मीद दिखाई देगी।जब आपातकालीन स्थिति में एक मर्द के होने की अहमियत समझ आती है तो बाकी समय सभी मर्दों को एक ही नजर से क्यों देखा जाता है?यह सवाल किसी महिला के खिलाफ नहीं है। यह सवाल सिर्फ उस सोच के खिलाफ है, जिसमें कुछ लोगों के गलत काम की वजह से पूरे समाज के एक वर्ग को दोषी मान लिया जाता है।

गलत सिर्फ मर्द नहीं होते

अगर बात मर्दों की है तो स्त्रियां कैसे पीछे रह सकती हैं?

जहां कुछ महिलाओं को प्रताड़ना मिलती है, वहीं कुछ महिलाएं ऐसी भी होती हैं जो अपने हक का गलत फायदा उठाती हैं। कुछ मामलों में बिना किसी गलती के भी किसी लड़के की जिंदगी पूरी तरह बर्बाद हो जाती है।यह भी सच है कि हर ऐसा मामला महिलाओं की गलती साबित नहीं करता और न ही हर शिकायत को झूठा कहा जा सकता है। महिलाओं की सुरक्षा और उनके अधिकारों की रक्षा बेहद जरूरी है। लेकिन जहां किसी व्यक्ति द्वारा कानून या अधिकारों का गलत इस्तेमाल साबित हो, वहां निष्पक्ष जांच और निष्पक्ष कार्रवाई भी उतनी ही जरूरी है।हमारा समाज इतना महान है कि अगर बात लड़का और लड़की की हो तो कई बार बिना किसी शक या गुंजाइश के फैसला लड़कियों के पक्ष में दे दिया जाता है, फिर चाहे गलती किसी की भी हो।लेकिन किसी भी मामले में केवल लड़का या लड़की होने के आधार पर फैसला करना उचित नहीं है। सही फैसला तथ्यों, सबूतों और सच्चाई के आधार पर होना चाहिए।कई मामलों में महिलाएं भी दोषी पाई गई हैं और कई मामलों में पुरुष भी। इसलिए सिर्फ इस आधार पर फैसला नहीं किया जा सकता कि मर्द ही गलत होते हैं या महिलाएं ही सही होती हैं।

मर्दों का क्या भरोसा
मर्दों का क्या भरोसा

मर्द भी रोते हैं

मर्दों के बारे में सबसे बड़ी गलतफहमी शायद यही है कि उन्हें दर्द नहीं होता।मर्द भी रोते हैं।बस फर्क इतना है कि कई बार उन्हें रोने की इजाजत नहीं दी जाती। बचपन से उन्हें सिखाया जाता है कि “मर्द बनो”, “मर्द रोते नहीं हैं”, “कमजोर मत पड़ो।”वह पिता के सामने मजबूत बनता है, मां के सामने चिंता छिपाता है, भाई के सामने हिम्मत दिखाता है, बच्चों के सामने मुस्कुराता है और कई बार अपने प्रेम के टूट जाने के बाद भी खुद को संभालने की कोशिश करता है।लेकिन उसके अंदर भी भावनाएं होती हैं। उसे भी दुख होता है, उसे भी डर लगता है, उसे भी प्यार चाहिए और उसे भी सम्मान की जरूरत होती है।इसलिए अगर कोई मर्द अपनी परेशानी किसी से नहीं कह रहा तो इसका मतलब यह नहीं कि उसके पास परेशानी नहीं है। हो सकता है कि उसे अपनी परेशानी बताने की आदत ही न हो।

एक पैकेट दूध और एक पैकेट आटा…

इसलिए कहावत है न—एक पैकेट दूध और एक पैकेट आटा हम घर लेकर आते हैं, लेकिन उन सामानों के साथ घर में आने वाले मर्दों को भूल जाते हैं।उन मर्दों में आपके पिता, भाई, पुत्र और पति भी आते हैं।हर मर्द गलत नहीं होता और हर मर्द सही भी नहीं होता। जैसे हर महिला एक जैसी नहीं होती, वैसे ही हर पुरुष भी एक जैसा नहीं होता।जरूरत इस बात की है कि हम किसी व्यक्ति को उसके कर्म से पहचानें, उसकी पूरी पहचान से नहीं।महिलाओं के खिलाफ होने वाले अत्याचार के खिलाफ आवाज उठनी चाहिए और दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए। उसी तरह अगर किसी पुरुष के साथ अन्याय होता है तो उसकी बात भी सुनी जानी चाहिए।समाज तभी बेहतर होगा जब हम मर्द बनाम औरत की लड़ाई से बाहर निकलकर सही बनाम गलत के आधार पर बात करेंगे।क्योंकि एक की गलती की सजा सबको देना न्याय नहीं है।

मर्द भी रोते हैं, मर्द भी टूटते हैं, मर्द भी प्यार करते हैं और मर्द भी उम्मीद रखते हैं।बस जरूरत इतनी है कि उन्हें भी इंसान समझकर देखा जाए।

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