जेल में बजेगी शहनाई! उम्रकैद की सजा काट रहे दो कैदी लेंगे सात फेरे, हाई कोर्ट ने दी मंजूरी

Editorial
6 Min Read

जयपुर राजस्थान से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने कानून, मानवाधिकार और सामाजिक मूल्यों पर नई बहस छेड़ दी है। उम्रकैद की सजा काट रहे दो कैदियों को जेल के भीतर शादी करने की अनुमति मिल गई है। राजस्थान हाई कोर्ट ने इस मामले में अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी कैदी के जेल में होने से उसके सभी मौलिक और वैधानिक अधिकार समाप्त नहीं हो जाते। अदालत की मंजूरी के बाद अब जेल परिसर में ही दोनों कैदियों की शादी की तैयारियां शुरू हो गई हैं।यह मामला इसलिए भी खास है क्योंकि आमतौर पर जेल को सजा और अनुशासन से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन अब वहीं शहनाई बजेगी, सात फेरे होंगे और वैवाहिक जीवन की नई शुरुआत होगी।

हाई कोर्ट ने क्यों दी अनुमति?

राजस्थान हाई कोर्ट में दायर याचिका में दोनों पक्षों ने विवाह की अनुमति मांगी थी। अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है। यदि कोई व्यक्ति जेल में बंद है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसके सभी नागरिक अधिकार समाप्त हो जाएं।अदालत ने अपने आदेश में कहा कि विवाह करना एक वैधानिक और सामाजिक अधिकार है। यदि सुरक्षा और कानून-व्यवस्था प्रभावित नहीं होती, तो जेल प्रशासन आवश्यक नियमों का पालन करते हुए ऐसी अनुमति दे सकता है।

जेल में ही होंगे सात फेरे

हाई कोर्ट के आदेश के बाद संबंधित जेल प्रशासन को निर्देश दिए गए हैं कि तय नियमों के अनुसार विवाह की पूरी प्रक्रिया कराई जाए।

जानकारी के मुताबिक—

  • शादी जेल परिसर में ही होगी।
  • सीमित संख्या में परिजनों को शामिल होने की अनुमति दी जा सकती है।
  • सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह जेल प्रशासन के हाथ में रहेगी।
  • विवाह की सभी कानूनी औपचारिकताएं पूरी की जाएंगी।
  • पूरे कार्यक्रम की वीडियोग्राफी भी कराई जा सकती है।

यानी यह शादी किसी सामान्य विवाह समारोह की तरह नहीं होगी, बल्कि पूरी तरह प्रशासनिक निगरानी में संपन्न होगी।

उम्रकैद की सजा काट रहे हैं दोनों कैदी

बताया जा रहा है कि शादी करने वाले दोनों कैदी हत्या के मामले में दोषी ठहराए जा चुके हैं और उम्रकैद की सजा काट रहे हैं।दोनों लंबे समय से एक-दूसरे को जानते हैं और विवाह करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने कानूनी प्रक्रिया अपनाते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया।अब हाई कोर्ट की मंजूरी मिलने के बाद उनका यह इंतजार खत्म होने जा रहा है।

क्या जेल में शादी की इजाजत पहले भी मिली है?

भारत में यह पहला मामला नहीं है जब किसी कैदी को शादी की अनुमति मिली हो।देश के अलग-अलग राज्यों में समय-समय पर अदालतों ने विशेष परिस्थितियों में कैदियों को विवाह की अनुमति दी है। हालांकि प्रत्येक मामला अलग होता है और अनुमति अदालत या जेल नियमों के आधार पर दी जाती है।विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय न्याय व्यवस्था केवल दंड पर नहीं, बल्कि सुधारात्मक न्याय (Reformative Justice) की अवधारणा पर भी काम करती है।

मानवाधिकार विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, जेल में बंद व्यक्ति—

  • मतदान जैसे कुछ अधिकार खो सकता है,
  • लेकिन जीवन, सम्मान, स्वास्थ्य और वैवाहिक अधिकार पूरी तरह समाप्त नहीं होते।

यदि किसी अधिकार के प्रयोग से सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित नहीं होती, तो उसे उचित प्रक्रिया के तहत अनुमति दी जा सकती है।यही कारण है कि अदालत ने इस मामले में संतुलित दृष्टिकोण अपनाया।

जेल प्रशासन की होगी बड़ी जिम्मेदारी

अब सबसे बड़ी जिम्मेदारी जेल प्रशासन की होगी।उसे सुनिश्चित करना होगा कि—

  • सुरक्षा में कोई चूक न हो।
  • जेल के नियमों का पूरी तरह पालन हो।
  • विवाह के दौरान किसी प्रकार की अव्यवस्था न फैले।
  • सभी कानूनी औपचारिकताएं समय पर पूरी हों।

इसके लिए विशेष सुरक्षा योजना भी तैयार की जा सकती है।

सजा के साथ सुधार की सोच

भारतीय जेल व्यवस्था का उद्देश्य केवल अपराधियों को सजा देना नहीं, बल्कि उन्हें समाज की मुख्यधारा में वापस लाने का अवसर भी देना है।

इसी सोच के तहत—

  • शिक्षा,
  • कौशल विकास,
  • योग,
  • आध्यात्मिक कार्यक्रम,
  • रोजगार प्रशिक्षण

जैसी गतिविधियां जेलों में चलाई जाती हैं।अब इस फैसले को भी कई विशेषज्ञ सुधारात्मक न्याय की इसी अवधारणा का हिस्सा मान रहे हैं।

 

देशभर में फैसले की चर्चा

राजस्थान हाई कोर्ट का यह फैसला सामने आने के बाद सोशल मीडिया और कानूनी हलकों में इसकी व्यापक चर्चा शुरू हो गई है।कुछ लोग इसे मानवाधिकार और संवैधानिक मूल्यों की जीत बता रहे हैं, तो कुछ का मानना है कि गंभीर अपराधों में दोषी ठहराए गए कैदियों को इस प्रकार की अनुमति देने पर व्यापक बहस होनी चाहिए।हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया है कि हर मामला उसके तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर तय किया जाएगा।

कानून और संवेदनशीलता का संतुलन

इस फैसले ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि भारतीय न्यायपालिका दंड के साथ-साथ मानवीय गरिमा और संवैधानिक अधिकारों को भी महत्व देती है।जेल की ऊंची दीवारों के भीतर होने वाली यह शादी सिर्फ दो लोगों का वैवाहिक बंधन नहीं होगी, बल्कि यह इस बात का भी प्रतीक होगी कि सजा मिलने के बाद भी कानून इंसान के मूल अधिकारों और गरिमा को पूरी तरह समाप्त नहीं मानता

read on: https://news7hindi.com/indias-first-hydrogen-train-will-start-now-the-pace-of-green-revolution-will-run-in-railways/

or advertisement visit our office:http://3RD FLOOR, lekhraj market, bansal Complex, Lucknow, Uttar Pradesh 226016

Share This Article
Leave a Comment