ओडिशा के पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर की रथ यात्रा दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में गिनी जाती है। हर साल लाखों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के दर्शन के लिए पुरी पहुंचते हैं। रथ यात्रा से जुड़ी कई ऐसी परंपराएं हैं, जो पहली बार देखने वाले लोगों को हैरान कर देती हैं। इन्हीं में से एक है ‘अधर पाना’ की परंपरा। इस अनुष्ठान में भगवान को एक विशेष पेय का भोग लगाया जाता है, लेकिन कुछ ही देर बाद उस पूरे भोग को मिट्टी के बड़े घड़े समेत जमीन पर बहा दिया जाता है।पहली नजर में यह देखकर हर किसी के मन में सवाल उठता है कि जब भगवान को भोग लगाया गया है तो उसे श्रद्धालुओं में बांटने के बजाय जमीन पर क्यों गिरा दिया जाता है? आखिर इसके पीछे क्या रहस्य है? क्या यह किसी विशेष धार्मिक मान्यता से जुड़ा है या इसके पीछे कोई और कारण छिपा है? दरअसल, इस अनोखी परंपरा के पीछे सनातन धर्म की एक गहरी आध्यात्मिक मान्यता जुड़ी हुई है, जिसे सदियों से निभाया जा रहा है।अधर पाना एक विशेष प्रकार का मीठा पेय होता है, जिसे गुड़, दूध, पनीर, केला, नारियल, चीनी, काली मिर्च, इलायची, जायफल, कपूर और कई पारंपरिक सामग्रियों से तैयार किया जाता है। इसे साधारण पात्र में नहीं बल्कि लगभग पांच से छह फीट ऊंचे मिट्टी के बड़े घड़ों में भरकर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के रथों पर रखा जाता है। यह अनुष्ठान रथ यात्रा के अंतिम चरण में किया जाता है, जब तीनों देवता गुंडीचा मंदिर से लौटकर श्रीमंदिर के सिंहद्वार के सामने अपने-अपने रथों पर विराजमान होते हैं।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रथ यात्रा के दौरान भगवान के साथ केवल श्रद्धालु ही नहीं चलते, बल्कि अनेक अदृश्य देवता, यक्ष, गंधर्व, सिद्ध, चारण और अन्य सूक्ष्म शक्तियां भी भगवान की सेवा और दर्शन के लिए उपस्थित रहती हैं। ऐसा माना जाता है कि ये दिव्य शक्तियां रथ यात्रा के दौरान भगवान के साथ रहती हैं, लेकिन उन्हें मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करने का अधिकार नहीं होता। इसलिए रथ यात्रा समाप्त होने से पहले भगवान की ओर से इन्हीं अदृश्य शक्तियों को संतुष्ट करने के लिए अधर पाना का विशेष भोग अर्पित किया जाता है।

जब भगवान को यह भोग अर्पित कर दिया जाता है, तब मंदिर के सेवायत परंपरागत विधि से उन विशाल मिट्टी के घड़ों को तोड़ देते हैं। घड़ा टूटते ही पूरा पेय रथ के चारों ओर जमीन पर फैल जाता है। धार्मिक विश्वास है कि उसी समय वे सभी अदृश्य दिव्य शक्तियां इस प्रसाद को ग्रहण करती हैं और भगवान का आशीर्वाद प्राप्त करके अपने-अपने लोक लौट जाती हैं। यही कारण है कि यह प्रसाद मनुष्यों में वितरित नहीं किया जाता।इस परंपरा का एक गहरा आध्यात्मिक संदेश भी माना जाता है। सनातन धर्म में केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि—दृश्य और अदृश्य—को ईश्वर का अंश माना गया है। अधर पाना इसी भावना का प्रतीक है कि भगवान की कृपा हर उस शक्ति पर समान रूप से होती है, जो उनके प्रति श्रद्धा रखती है। यही वजह है कि इस विशेष भोग को केवल मानवों तक सीमित नहीं रखा जाता।मिट्टी के घड़े का उपयोग भी अपने आप में महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार मिट्टी पंचतत्व का प्रतीक है। घड़ा टूटना इस बात का संकेत माना जाता है कि संसार की हर भौतिक वस्तु नश्वर है, जबकि ईश्वर और आत्मा शाश्वत हैं। इसलिए इस अनुष्ठान में धातु या किसी अन्य पात्र की जगह केवल मिट्टी के घड़े का ही उपयोग किया जाता है।जगन्नाथ संस्कृति के जानकार बताते हैं कि अधर पाना की परंपरा रथ यात्रा का अभिन्न हिस्सा है। यदि यह अनुष्ठान विधि-विधान से न किया जाए तो धार्मिक दृष्टि से रथ यात्रा को पूर्ण नहीं माना जाता। यही कारण है कि सदियों से इस परंपरा का पालन उसी श्रद्धा और नियम के साथ किया जा रहा है।

हर वर्ष जब यह अनुष्ठान होता है, तब लाखों श्रद्धालु इस दृश्य को देखने के लिए उत्सुक रहते हैं। कई लोग पहली बार इसे देखकर आश्चर्यचकित हो जाते हैं कि इतना बड़ा भोग भगवान को अर्पित करने के बाद जमीन पर क्यों बहा दिया गया। लेकिन जब उन्हें इसके पीछे की धार्मिक मान्यता का पता चलता है, तो यह परंपरा उनके लिए आस्था और श्रद्धा का प्रतीक बन जाती है।पुरी की रथ यात्रा केवल भगवान के रथ खींचने का उत्सव नहीं है, बल्कि यह सनातन संस्कृति की उन अनूठी परंपराओं का जीवंत उदाहरण भी है, जिनमें हर अनुष्ठान के पीछे कोई न कोई गहरा आध्यात्मिक संदेश छिपा होता है। अधर पाना भी ऐसी ही एक परंपरा है, जो हमें यह सिखाती है कि ईश्वर की कृपा केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि पर समान रूप से बरसती है।यही कारण है कि भगवान जगन्नाथ को लगाया जाने वाला अधर पाना का भोग श्रद्धालुओं में वितरित नहीं किया जाता, बल्कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अदृश्य दिव्य शक्तियों को समर्पित करने के लिए मिट्टी के घड़े सहित जमीन पर बहा दिया जाता है। सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उतनी ही श्रद्धा, आस्था और विश्वास के साथ निभाई जाती है और जगन्नाथ संस्कृति की सबसे अनोखी एवं रहस्यमयी परंपराओं में गिनी जाती है।
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