‘शरीर नहीं आया… वर्दी को दी मुखाग्नि’! रूस-यूक्रेन युद्ध ने उजाड़ दिया पूरा परिवार

Editorial
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आजमगढ़ उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले से ऐसी दर्दनाक कहानी सामने आई है, जिसने हर किसी की आंखें नम कर दीं। रूस-यूक्रेन युद्ध में जान गंवाने वाले एक भारतीय युवक का परिवार अंतिम दर्शन तक नहीं कर सका। न शव मिला, न अस्थियां और न ही कंकाल। परिवार को रूस से सिर्फ उसकी सेना की वर्दी भेजी गई। यही वर्दी उसके अस्तित्व की आखिरी निशानी बनी और उसी को चिता पर रखकर अंतिम संस्कार किया गया।जब चिता पर किसी बेटे, पति और पिता की जगह उसकी वर्दी रखी गई तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें भर आईं। गांव में ऐसा मातम पसरा कि पूरा इलाका गम में डूब गया। परिजनों का दर्द सिर्फ बेटे को खोने का नहीं, बल्कि उस धोखे का भी है जिसने एक परिवार को हमेशा के लिए बिखेर दिया।

गार्ड की नौकरी का सपना, युद्ध के मैदान में मिली मौत

कंधरापुर थाना क्षेत्र के खोजापुर माधोपट्टी गांव निवासी योगेंद्र यादव बेहतर भविष्य की उम्मीद लेकर घर से निकले थे। परिवार को भरोसा था कि विदेश में नौकरी मिलने के बाद आर्थिक तंगी दूर होगी और बच्चों का भविष्य संवर जाएगा। लेकिन किसे पता था कि नौकरी का सपना उन्हें सीधे युद्ध के मैदान तक पहुंचा देगा।परिजनों के अनुसार मऊ जिले के एजेंट विनोद यादव, सुमित और दुष्यंत ने योगेंद्र को गार्ड और हेल्पर की नौकरी दिलाने का झांसा दिया। 15 जनवरी 2024 को योगेंद्र रूस के लिए रवाना हुए। परिवार को बताया गया कि उन्हें निजी सुरक्षा का काम मिलेगा, लेकिन रूस पहुंचने के बाद हालात पूरी तरह बदल गए।

एक महीने की ट्रेनिंग… फिर सीधे सेना में भर्ती

छोटे भाई आशीष यादव ने बताया कि रूस पहुंचने के बाद योगेंद्र को एक महीने तक प्रशिक्षण दिया गया। परिवार को बाद में पता चला कि उन्हें सुरक्षा गार्ड नहीं, बल्कि सेना में शामिल कर युद्ध के मोर्चे पर भेज दिया गया।आशीष ने बताया कि मई 2024 में भाई से आखिरी बार बात हुई थी। फोन पर योगेंद्र ने बताया था कि युद्ध के दौरान उन्हें चोट लगी है और हालात बेहद खराब हैं। इसके बाद उनका मोबाइल हमेशा के लिए बंद हो गया।परिवार लगातार भारतीय दूतावास, प्रशासन और संबंधित एजेंसियों से संपर्क करता रहा, लेकिन कोई ठोस जानकारी नहीं मिल सकी। हर दिन उम्मीद और निराशा के बीच गुजरता रहा।

फोन आया… “बॉडी नहीं मिलेगी, विस्फोट में उड़ गई”

कई महीनों तक इंतजार करने के बाद एक दिन परिवार के पास फोन आया। फोन करने वाले ने जो कहा, उसे सुनकर पूरे परिवार की दुनिया उजड़ गई।योगेंद्र के भाई सुनील कुमार यादव ने बताया कि फोन पर उन्हें बताया गया कि योगेंद्र की युद्ध में मौत हो चुकी है। लेकिन उनका शव या कंकाल नहीं मिल सकेगा क्योंकि भीषण विस्फोट में उनका शरीर पूरी तरह नष्ट हो गया।परिवार से कहा गया कि सेना की वर्दी भेजी जा रही है और उसे जिला प्रशासन से प्राप्त कर लें।

वर्दी ही बनी बेटे की आखिरी निशानी

जिला प्रशासन के माध्यम से जब योगेंद्र की वर्दी परिवार तक पहुंची तो घर में चीख-पुकार मच गई। जिस बेटे को गले लगाने की उम्मीद थी, उसकी जगह सिर्फ वर्दी थी।परिवार ने उसी वर्दी को सम्मानपूर्वक सिर पर रखा और चंद्रमा ऋषि आश्रम पहुंचकर पूरे धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ उसका अंतिम संस्कार किया।चिता पर इंसान नहीं, उसकी वर्दी जल रही थी। यह दृश्य देखकर वहां मौजूद हर व्यक्ति भावुक हो उठा। गांव के बुजुर्गों ने कहा कि शायद यह पहला मौका था जब किसी परिवार ने अपने बेटे की जगह उसकी वर्दी को मुखाग्नि दी।

चार मासूम बच्चों के सिर से उठ गया पिता का साया

योगेंद्र यादव अपने पीछे पत्नी और चार छोटे बच्चों को छोड़ गए हैं। परिवार में तीन बेटियां और एक बेटा है। अब इन मासूम बच्चों के सिर से पिता का साया हमेशा के लिए उठ चुका है।परिजनों का कहना है कि योगेंद्र विदेश सिर्फ इसलिए गए थे ताकि बच्चों को बेहतर जिंदगी दे सकें, लेकिन अब वही बच्चे अपने पिता की तस्वीर देखकर बड़े होंगे।घर में मातम का माहौल है। पत्नी का रो-रोकर बुरा हाल है, जबकि बूढ़े माता-पिता बेटे की याद में बेसुध हैं।

गांव ने कहा- हमारे लिए वह शहीद हैं

योगेंद्र के घर पहुंचे तो वहां एक मेज पर उनकी तस्वीर रखी थी। तस्वीर पर फूल चढ़ाए गए थे और उसके ऊपर बड़े अक्षरों में लिखा था—“शहीद योगेंद्र यादव”।गांव वालों का कहना है कि भले ही वह भारतीय सेना का हिस्सा नहीं थे, लेकिन युद्ध में जान देने वाला हर बेटा उनके लिए शहीद है। ग्रामीणों ने दो मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी।

परिजनों की मांग- एजेंट को मिले फांसी की सजा

योगेंद्र के परिवार का सबसे बड़ा गुस्सा उन एजेंटों के खिलाफ है, जिन्होंने नौकरी का झूठा सपना दिखाकर उन्हें विदेश भेजा।परिजनों ने सरकार से मांग की है कि इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए और दोषी एजेंटों के खिलाफ हत्या जैसी गंभीर धाराओं में कार्रवाई की जाए।योगेंद्र के भाई ने कहा, “हमारा भाई नौकरी करने गया था, युद्ध लड़ने नहीं। जिन्होंने उसे धोखे से मौत के मुंह में भेजा, उन्हें फांसी की सजा मिलनी चाहिए ताकि कोई और परिवार इस दर्द से न गुजरे।”

एक परिवार का नहीं, पूरे समाज का सवाल

यह घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है। यह उन हजारों युवाओं के लिए भी चेतावनी है, जो बेहतर रोजगार के सपने में एजेंटों के झांसे में आकर विदेश चले जाते हैं।बिना पूरी जानकारी, सत्यापन और कानूनी प्रक्रिया के विदेश जाने का फैसला कभी-कभी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल साबित हो सकता है।आज योगेंद्र यादव इस दुनिया में नहीं हैं। उनका शरीर भी अपने गांव नहीं लौट सका। लेकिन उनकी खाली वर्दी ने देश के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं—क्या नौकरी के नाम पर युवाओं को मौत के मुंह में धकेलने वाले एजेंटों पर लगाम लगेगी? क्या ऐसे परिवारों को न्याय मिलेगा? और क्या भविष्य में किसी मां को अपने बेटे की जगह उसकी वर्दी का अंतिम संस्कार नहीं करना पड़ेगा?योगेंद्र की चिता पर जलती वह वर्दी आज भी यही सवाल पूछ रही है।

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