49 साल बाद भी नहीं बच सका रिश्वतखोर लेखपाल! 300 रुपये की घूस पड़ी इतनी भारी कि हाईकोर्ट ने भी नहीं दी राहत

Editorial
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 प्रयागराज कहते हैं कि कानून के हाथ लंबे होते हैं और न्याय में भले ही देर हो जाए, लेकिन फैसला आखिरकार आता जरूर है। इसका ताजा उदाहरण इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक अहम फैसले में देखने को मिला, जहां करीब 49 साल पुराने रिश्वतखोरी के मामले में दोषी पाए गए एक लेखपाल को आखिरकार कोई राहत नहीं मिली। अदालत ने न सिर्फ उसकी अपील खारिज कर दी, बल्कि ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा को भी बरकरार रखते हुए उसे चार सप्ताह के भीतर संबंधित अदालत में आत्मसमर्पण कर शेष सजा काटने का आदेश दिया।यह मामला वर्ष 1977 का है। उस समय कानपुर की एक तहसील में तैनात लेखपाल महेश चंद पर भूमि विवाद से जुड़े एक मामले में रिश्वत मांगने का आरोप लगा था। यह मामला वर्षों तक अदालतों में चलता रहा और अब लगभग पांच दशक बाद न्यायिक प्रक्रिया अपने अंतिम मुकाम पर पहुंची।

400 रुपये मांगे, 300 रुपये लेते ही दबोच लिया गया

अभियोजन के अनुसार, महेश चंद ने भूमि विवाद में एक पक्ष के पक्ष में कार्रवाई कराने और दूसरे पक्ष की अपील खारिज करवाने के नाम पर 400 रुपये रिश्वत की मांग की थी। शिकायतकर्ता ने इस मांग की सूचना तत्कालीन विजिलेंस विभाग को दी।शिकायत मिलने के बाद विजिलेंस अधिकारियों ने पूरी योजना के तहत ट्रैप बिछाया। शिकायतकर्ता को 100-100 रुपये के तीन नोट, जिन पर फिनॉल्फ्थेलीन पाउडर लगाया गया था, दिए गए और उन्हें निर्देशित किया गया कि रिश्वत मांगने पर वही नोट आरोपी को सौंपे जाएं।योजना के अनुसार, दोनों की मुलाकात एक होटल में हुई। जैसे ही लेखपाल ने शिकायतकर्ता से 300 रुपये लेकर उन्हें अपनी जेब में रखा, पहले से निगरानी कर रही विजिलेंस टीम ने तुरंत कार्रवाई करते हुए उसे रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया। जांच के दौरान वैज्ञानिक परीक्षण में भी नोटों पर लगे रसायन के निशान आरोपी के हाथों और जेब पर पाए गए, जिससे रिश्वत लेने के आरोप की पुष्टि हुई।

1985 में ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी सजा

लंबी सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 1985 में महेश चंद को भ्रष्टाचार के मामले में दोषी ठहराते हुए एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।हालांकि दोषी ने इस फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। इसके बाद यह आपराधिक अपील न्यायालय में करीब 41 वर्षों तक लंबित रही। आखिरकार अब हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई पूरी करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराया और अपील खारिज कर दी।

बचाव पक्ष ने उठाए कई सवाल

सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष की ओर से दलील दी गई कि इस मामले में शिकायतकर्ता को अदालत में गवाही के लिए पेश नहीं किया गया। इसलिए अभियोजन का पूरा मामला संदेहास्पद हो जाता है। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि किसी सार्वजनिक स्थान, विशेषकर होटल में, खुलेआम रिश्वत लेना सामान्य व्यवहार नहीं माना जा सकता, इसलिए पूरी कहानी पर संदेह किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने दलीलों को किया खारिज

मामले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति संजीव कुमार की एकल पीठ ने बचाव पक्ष की सभी दलीलों को अस्वीकार कर दिया।अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि यदि विजिलेंस अधिकारियों तथा स्वतंत्र गवाहों की विश्वसनीय गवाही से ट्रैप की कार्रवाई पूरी तरह सिद्ध हो जाती है, तो केवल शिकायतकर्ता के अदालत में गवाही न देने से पूरा मामला कमजोर नहीं हो जाता।कोर्ट ने यह भी कहा कि ट्रैप की कार्रवाई स्वाभाविक रूप से गोपनीय होती है और कई बार आरोपी को संदेह से बचाने के लिए सार्वजनिक स्थानों पर भी कार्रवाई की जाती है। इसलिए होटल जैसे स्थान पर रिश्वत लेते हुए आरोपी का पकड़ा जाना किसी भी तरह से अस्वाभाविक नहीं माना जा सकता।

 

चार सप्ताह में करना होगा सरेंडर

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पूरी तरह सही मानते हुए महेश चंद की अपील खारिज कर दी। अदालत ने आरोपी की जमानत और निजी मुचलका भी निरस्त कर दिया तथा निर्देश दिया कि वह चार सप्ताह के भीतर संबंधित ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण करे और अपनी बची हुई सजा पूरी करे।

भ्रष्टाचार के मामलों में अहम संदेश

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला केवल एक व्यक्ति की सजा तक सीमित नहीं है, बल्कि भ्रष्टाचार के मामलों में एक मजबूत संदेश भी देता है। अदालत ने साफ संकेत दिया है कि न्यायिक प्रक्रिया में भले ही लंबा समय लग जाए, लेकिन यदि आरोप साक्ष्यों से सिद्ध हो जाते हैं तो दोषी को सजा से बचाया नहीं जा सकता।विशेषज्ञों के अनुसार, यह निर्णय उन सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए भी एक चेतावनी है जो अपने पद का दुरुपयोग कर रिश्वत लेने जैसे अपराधों में शामिल होते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि विश्वसनीय साक्ष्य और स्वतंत्र गवाहों की पुष्टि होने पर तकनीकी आधार पर दोषियों को राहत नहीं दी जा सकती।करीब पांच दशक पुराने इस मामले में आए फैसले ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि न्याय में देर हो सकती है, लेकिन जब सबूत मजबूत हों तो कानून का शिकंजा आखिरकार अपराधी तक पहुंच ही जाता है। 300 रुपये की रिश्वत के लालच में लिया गया एक फैसला आखिरकार एक सरकारी कर्मचारी के पूरे जीवन पर भारी पड़ गया।

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