कोयला घोटाला केस में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: पूर्व पीएम डॉ. मनमोहन सिंह को पूरी क्लीन चिट, 11 साल पुराना समन रद्द

Editorial
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नई दिल्ली देश के चर्चित तालाबीरा-II कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को बड़ी कानूनी राहत देते हुए उनके खिलाफ चल रही पूरी कार्रवाई को समाप्त कर दिया है। शीर्ष अदालत ने सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा जारी समन और अभियोजन की पूरी प्रक्रिया को निरस्त कर दिया। इस फैसले के साथ ही एक दशक से अधिक समय से चल रहे इस बहुचर्चित मामले का कानूनी अध्याय हमेशा के लिए बंद हो गया।सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि जांच एजेंसी सीबीआई ने मामले की विस्तृत जांच के बाद कोई आपराधिक साजिश या भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं पाया था। ऐसे में ट्रायल कोर्ट के पास क्लोजर रिपोर्ट को खारिज कर पूर्व प्रधानमंत्री समेत अन्य लोगों को आरोपी के रूप में तलब करने का पर्याप्त आधार नहीं था। अदालत ने माना कि जांच एजेंसी की रिपोर्ट कानून और प्रक्रिया के अनुरूप थी तथा मुकदमे को आगे बढ़ाने का कोई औचित्य नहीं बनता।

11 साल पुराने विवाद का हुआ अंत

यह मामला वर्ष 2005 में ओडिशा के तालाबीरा-II कोयला ब्लॉक के आवंटन से जुड़ा था। उस समय डॉ. मनमोहन सिंह के पास प्रधानमंत्री पद के साथ-साथ कोयला मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार भी था। आरोप लगाए गए थे कि कोयला ब्लॉक आवंटन प्रक्रिया में अनियमितताएं हुईं और कुछ कंपनियों को अनुचित लाभ पहुंचाया गया।मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई। लंबी जांच के बाद एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि उसे पूर्व प्रधानमंत्री या अन्य अधिकारियों के खिलाफ किसी भी प्रकार की आपराधिक साजिश या भ्रष्टाचार के पर्याप्त सबूत नहीं मिले। इसके आधार पर सीबीआई ने अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी थी।हालांकि मार्च 2015 में स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार करने से इनकार करते हुए डॉ. मनमोहन सिंह, उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला, पूर्व कोयला सचिव पी.सी. पारख सहित अन्य लोगों को आरोपी के रूप में तलब कर लिया था। इस आदेश के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां शीर्ष अदालत ने समन पर रोक लगा दी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की टिप्पणी को माना अनुचित

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने विस्तृत सुनवाई के बाद कहा कि ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध तथ्यों और जांच रिपोर्ट का समुचित मूल्यांकन किए बिना समन जारी कर दिया था।पीठ ने कहा कि यदि जांच एजेंसी ने व्यापक जांच के बाद किसी व्यक्ति के खिलाफ अभियोजन योग्य साक्ष्य नहीं पाए हैं, तो केवल अनुमान या संदेह के आधार पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। अदालत ने कहा कि कानून का मूल सिद्धांत यही है कि अभियोजन केवल ठोस साक्ष्यों के आधार पर ही आगे बढ़ाया जाए।

सीबीआई की जांच पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में सीबीआई की दोनों क्लोजर रिपोर्ट को वैध और कानून सम्मत माना। अदालत ने कहा कि जांच प्रक्रिया निष्पक्ष ढंग से पूरी की गई और उपलब्ध दस्तावेजों, फाइलों तथा निर्णय प्रक्रिया का गहन परीक्षण किया गया था।शीर्ष अदालत ने यह भी माना कि प्रशासनिक निर्णय और आपराधिक साजिश के बीच स्पष्ट अंतर होता है। यदि किसी नीति या प्रशासनिक निर्णय में आपराधिक मंशा या व्यक्तिगत लाभ का प्रमाण नहीं मिलता, तो केवल निर्णय लेने के आधार पर किसी व्यक्ति को आरोपी नहीं बनाया जा सकता।

मनमोहन सिंह ने हमेशा किया था आरोपों से इनकार

पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने शुरुआत से ही अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज किया था। उनका कहना था कि कोयला ब्लॉक आवंटन का निर्णय उस समय लागू सरकारी नीति और प्रशासनिक प्रक्रिया के अनुसार लिया गया था। उन्होंने यह भी कहा था कि उनके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए आवश्यक वैधानिक अनुमति भी नहीं ली गई थी।डॉ. सिंह का हमेशा यह रुख रहा कि उन्होंने सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता और ईमानदारी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी और उनके किसी भी फैसले के पीछे निजी लाभ या आपराधिक मंशा नहीं थी।

राजनीतिक और कानूनी दृष्टि से अहम फैसला

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केवल एक व्यक्ति को राहत देने तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि यह प्रशासनिक निर्णयों और आपराधिक दायित्व के बीच कानूनी सीमा को भी स्पष्ट करता है।विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत ने यह संदेश दिया है कि किसी नीति आधारित निर्णय को आपराधिक मामला बनाने से पहले जांच एजेंसियों और अदालतों को ठोस साक्ष्यों का गहन परीक्षण करना होगा। केवल संदेह या प्रक्रिया संबंधी विवाद किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकते।

कोयला आवंटन विवाद क्यों बना था बड़ा मुद्दा?

यूपीए सरकार के कार्यकाल में कोयला ब्लॉक आवंटन देश के सबसे चर्चित राजनीतिक और कानूनी विवादों में शामिल रहा। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट के बाद यह मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र बन गया था। विपक्ष ने सरकार पर बड़े पैमाने पर अनियमितताओं के आरोप लगाए थे, जबकि सरकार का कहना था कि सभी आवंटन उस समय की स्वीकृत नीति के अनुसार किए गए थे।बाद में कई मामलों की जांच सीबीआई और अन्य एजेंसियों ने की। कुछ मामलों में अभियोजन चला, जबकि कई मामलों में पर्याप्त साक्ष्य न मिलने पर क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की गई।

कानूनी अध्याय पर लगा पूर्ण विराम

सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के खिलाफ तालाबीरा-II कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में अब किसी भी प्रकार की कानूनी कार्रवाई शेष नहीं रही। अदालत ने ट्रायल कोर्ट का समन आदेश रद्द करते हुए स्पष्ट कर दिया कि इस मामले को आगे बढ़ाने का कोई आधार नहीं है।इस फैसले के साथ ही करीब एक दशक से अधिक समय तक देश की राजनीति और न्यायिक व्यवस्था में चर्चा का विषय रहे इस मामले पर अंततः पूर्ण विराम लग गया। शीर्ष अदालत के निर्णय ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि आपराधिक मुकदमा चलाने के लिए केवल आरोप पर्याप्त नहीं होते, बल्कि उनके समर्थन में ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य होना अनिवार्य है|

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