क्या सार्वजनिक जगह पर गाली देना अपराध है? जानिए कब दर्ज होती है FIR, BNS की कौन-सी धाराएं लगती हैं और कितनी हो सकती है सजा

Editorial
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नई दिल्ली क्या किसी सार्वजनिक स्थान पर किसी को गाली देना सीधे-सीधे अपराध है? क्या केवल अपशब्द बोलने भर से पुलिस एफआईआर दर्ज कर सकती है? क्या सोशल मीडिया पर अभद्र टिप्पणी या आपत्तिजनक पोस्टर दिखाना भी कानूनी कार्रवाई की वजह बन सकता है? हाल के दिनों में जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित अपमानजनक टिप्पणियों और पोस्टरों का मामला सामने आने के बाद ये सवाल पूरे देश में चर्चा का विषय बन गए हैं।इस मामले में कुछ शिकायतों के आधार पर पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं में एफआईआर दर्ज की है। इसके बाद यह बहस तेज हो गई कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून की सीमाएं आखिर कहां तक हैं। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि केवल गाली देना अपने-आप में हर स्थिति में अपराध नहीं माना जाता, लेकिन यदि उससे सार्वजनिक शांति भंग होने, मानहानि, अश्लीलता फैलने या हिंसा भड़कने जैसी परिस्थितियां पैदा होती हैं, तो कानून कार्रवाई की अनुमति देता है।

क्या है पूरा मामला?

दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित एक प्रदर्शन के दौरान सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो सामने आए, जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित रूप से अपमानजनक शब्दों और नारों का इस्तेमाल किया गया। वीडियो वायरल होने के बाद एक अधिवक्ता ने नोएडा के एक्सप्रेसवे थाने में शिकायत दर्ज कराई।पुलिस ने शिकायत के आधार पर जीरो एफआईआर दर्ज की और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 352, 353(1) और 356(1) के तहत मामला दर्ज किया। शिकायत में आरोप लगाया गया कि कथित टिप्पणी से देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद की गरिमा को ठेस पहुंची और सार्वजनिक शांति प्रभावित होने की आशंका बनी।बाद में सोशल मीडिया पर एक वीडियो भी सामने आया, जिसमें संबंधित लड़की ने कथित तौर पर माफी मांगते हुए कहा कि वह दूसरों के प्रभाव में आकर ऐसे नारे लगाने लगी थी। इस वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

क्या केवल गाली देने पर जेल हो सकती है?

कानून का जवाब है—हर बार नहीं।भारतीय न्याय व्यवस्था में केवल किसी को गाली देना स्वतः अपराध नहीं बन जाता। अदालत इस बात को देखती है कि:

  • गाली किस परिस्थिति में दी गई?
  • उसका उद्देश्य क्या था?
  • उससे किस प्रकार का प्रभाव पड़ा?
  • क्या उससे किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा, सार्वजनिक व्यवस्था या कानून-व्यवस्था प्रभावित हुई?

यदि कथित बयान मानहानि, सार्वजनिक शांति भंग, अश्लीलता या किसी अन्य दंडनीय अपराध की कानूनी परिभाषा में आता है, तभी संबंधित धाराएं लागू हो सकती हैं।

BNS की धारा 352: जानबूझकर अपमान

यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी का अपमान करता है और उसे यह पता है कि इससे सार्वजनिक शांति भंग हो सकती है या कोई अन्य अपराध होने की संभावना है, तो धारा 352 लागू हो सकती है।

सजा

  • दो साल तक की जेल
  • या जुर्माना
  • या दोनों

BNS की धारा 353(1): अफवाह या भड़काऊ सूचना

यदि कोई व्यक्ति झूठी सूचना, रिपोर्ट या सामग्री प्रसारित करता है जिससे:

  • जनता में भय या दहशत फैले,
  • सार्वजनिक शांति प्रभावित हो,
  • राज्य के खिलाफ अपराध की आशंका बने,
  • या समुदायों के बीच तनाव पैदा हो,

तो धारा 353(1) लागू हो सकती है।

सजा

  • तीन साल तक की जेल
  • या जुर्माना
  • या दोनों

BNS की धारा 356(1): मानहानि

यदि कोई व्यक्ति बोले गए शब्दों, लिखित सामग्री, चित्र, संकेत या किसी अन्य माध्यम से किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाला आरोप लगाता या प्रकाशित करता है, तो यह मानहानि (Defamation) के दायरे में आ सकता है।हालांकि यह भी अदालत तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर तय करती है।

सार्वजनिक स्थान पर अश्लील भाषा बोलने पर कौन-सी धारा?

यदि कोई व्यक्ति सार्वजनिक स्थान पर अश्लील शब्द बोलता है या अश्लील हरकत करता है और उससे अन्य लोगों को परेशानी होती है, तो BNS की धारा 296 लागू हो सकती है।

सजा

  • तीन महीने तक की जेल
  • ₹1,000 तक जुर्माना
  • या दोनों

अश्लील पोस्टर या सामग्री दिखाने पर क्या होगा?

यदि कोई व्यक्ति सार्वजनिक रूप से अश्लील पोस्टर, पर्चे, किताब, चित्र या इलेक्ट्रॉनिक सामग्री का प्रदर्शन, वितरण या बिक्री करता है, तो BNS की धारा 294 लागू हो सकती है।

पहली बार दोषी पाए जाने पर

  • दो साल तक की जेल
  • ₹5,000 तक जुर्माना

दूसरी बार दोषी पाए जाने पर

  • पांच साल तक की जेल
  • ₹10,000 तक जुर्माना

यदि ऐसी सामग्री किसी बच्चे को दिखाई या बेची जाती है, तो धारा 295 के तहत अधिक कठोर दंड का प्रावधान है।

क्या हर अपशब्द ‘अश्लील’ माना जाएगा?

इस प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट ने हाल के एक फैसले में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।अदालत ने स्पष्ट किया कि गाली देना, अभद्र भाषा बोलना और अश्लीलता—तीनों अलग-अलग कानूनी अवधारणाएं हैं।सिर्फ अपशब्द बोल देना अपने-आप सार्वजनिक अश्लीलता का अपराध नहीं बन जाता।सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी शब्द को कानूनी रूप से अश्लील तभी माना जाएगा, जब:

  • वह कामुक या यौन प्रकृति का हो,
  • यौन उत्तेजना पैदा करने वाला हो,
  • और समाज के नैतिक स्तर को भ्रष्ट करने की प्रवृत्ति रखता हो।

सिर्फ असभ्य या अपमानजनक भाषा इन शर्तों को पूरा नहीं करती।

सुप्रीम कोर्ट ने और क्या कहा?

तमिलनाडु के एक भूमि विवाद से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान स्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कहा कि सार्वजनिक स्थान पर अश्लीलता का अपराध साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष को यह भी सिद्ध करना होगा कि:

  • कथित शब्द सार्वजनिक स्थान पर बोले गए,
  • और उनसे वास्तव में वहां मौजूद लोगों को परेशानी हुई।

यदि ये दोनों बातें साबित नहीं होतीं, तो केवल गाली देने के आधार पर सार्वजनिक अश्लीलता का मामला नहीं बनता।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम कानून

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। लेकिन अनुच्छेद 19(2) के तहत यह अधिकार पूर्ण नहीं है। राज्य सार्वजनिक व्यवस्था, मानहानि, शालीनता, नैतिकता, राष्ट्रीय सुरक्षा और अन्य वैधानिक कारणों से इस अधिकार पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगा सकता है।यही कारण है कि हर अपमानजनक टिप्पणी पर स्वतः आपराधिक मामला नहीं बनता, लेकिन यदि किसी बयान से कानून द्वारा संरक्षित हितों को नुकसान पहुंचता है, तो संबंधित धाराओं के तहत कार्रवाई संभव है।सार्वजनिक स्थान पर गाली देना हर स्थिति में अपराध नहीं है, लेकिन यदि वह मानहानि, सार्वजनिक शांति भंग, अश्लीलता, नफरत फैलाने या हिंसा भड़काने जैसी परिस्थितियां उत्पन्न करता है, तो भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज हो सकती है और दोष सिद्ध होने पर जेल व जुर्माने का प्रावधान भी है। इसलिए सार्वजनिक जीवन, सोशल मीडिया और विरोध प्रदर्शनों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रयोग करते समय कानूनी सीमाओं और दूसरों की गरिमा का सम्मान करना आवश्यक है।

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