भद्रा काल में क्यों नहीं बांधते राखी? जानें रावण-शूर्पणखा की कथा

Editorial
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 रक्षाबंधन का त्योहार भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और सुरक्षा के संकल्प का प्रतीक माना जाता है। इस दिन बहनें भाई की कलाई पर राखी बांधती हैं और भाई बहन की रक्षा का संकल्प लेते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भद्रा काल में राखी बांधने से क्यों मना किया जाता है? आखिर भद्रा क्या है और इस समय राखी बांधना अशुभ क्यों माना जाता है?इसके पीछे हिंदू धार्मिक परंपराओं और लोकमान्यताओं में कई कथाएं प्रचलित हैं। सबसे चर्चित कथा लंका के राजा रावण और उसकी बहन शूर्पणखा से जुड़ी है। मान्यता है कि शूर्पणखा ने रावण को भद्रा काल में राखी बांधी थी और इसके बाद रावण के जीवन में ऐसी घटनाएं हुईं, जिनका अंत उसके विनाश के रूप में हुआ। हालांकि, यह कथा लोकमान्यता है, इसे प्रमाणित ऐतिहासिक घटना नहीं माना जाना चाहिए।

भद्रा काल आखिर होता क्या है?

हिंदू पंचांग में भद्रा को विष्टि करण के रूप में जाना जाता है। करण पंचांग के महत्वपूर्ण अंगों में से एक है और विष्टि करण को ही सामान्य बोलचाल में भद्रा कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं में भद्रा को उग्र स्वभाव वाला माना गया है। इसी वजह से भद्रा के दौरान विवाह, गृह प्रवेश और अन्य शुभ कार्य करने से बचने की परंपरा है।रक्षाबंधन भी एक शुभ पर्व है। इसलिए जब रक्षाबंधन के दिन भद्रा का समय पड़ता है, तो परंपरा के अनुसार उस अवधि में राखी बांधने से बचा जाता है। ज्योतिषीय मान्यताओं में राखी बांधने के लिए भद्रा समाप्त होने के बाद का समय अधिक शुभ माना जाता है।

भद्रा को लेकर क्या है पौराणिक कथा?

भद्रा को लेकर एक प्रसिद्ध पौराणिक मान्यता सूर्यदेव के परिवार से जुड़ी है। कई धार्मिक स्रोतों में भद्रा को सूर्यदेव और छाया की पुत्री तथा शनिदेव की बहन बताया गया है। कथाओं के अनुसार भद्रा का स्वभाव उग्र था और उनके व्यवहार से देवता भी चिंतित रहते थे। इसी कारण उन्हें पंचांग में एक ऐसे समय के रूप में माना गया, जिसमें मांगलिक कार्यों को टालने की परंपरा बनी।यहां यह समझना जरूरी है कि भद्रा से जुड़ी ये बातें धार्मिक मान्यताओं और ज्योतिषीय परंपराओं का हिस्सा हैं। अलग-अलग ग्रंथों और परंपराओं में इनके विवरण अलग मिल सकते हैं।

रावण को किस समय बांधी गई थी राखी?

अब आते हैं उस सवाल पर जिसे लेकर सबसे ज्यादा चर्चा होती है—रावण की बहन ने उसे राखी कब बांधी थी?लोकप्रिय कथा के अनुसार रावण की बहन शूर्पणखा ने भद्रा काल में अपने भाई रावण को राखी बांधी थी। मान्यता है कि इसके बाद रावण का अंत हुआ और उसकी लंका का वैभव भी नष्ट हो गया। इसी लोककथा के आधार पर यह धारणा प्रचलित हुई कि भद्रा काल में भाई को राखी नहीं बांधनी चाहिए।हालांकि इस कथा का उल्लेख वाल्मीकि रामायण की मूल कथा में इसी रूप में नहीं मिलता। इसलिए इसे रक्षाबंधन से जुड़ी लोकप्रिय लोकमान्यता के रूप में प्रस्तुत करना अधिक उचित है।

फिर रावण के वंश के नाश की कहानी क्या है?

रामायण की मुख्य कथा के अनुसार रावण लंका का शक्तिशाली राजा था। उसे अपनी शक्ति और सामर्थ्य पर बहुत अहंकार था। भगवान श्रीराम की पत्नी माता सीता का हरण करने के बाद राम और रावण के बीच युद्ध हुआ।लंका में हुए युद्ध में रावण की सेना के अनेक योद्धा मारे गए। अंत में भगवान श्रीराम और रावण के बीच युद्ध हुआ और श्रीराम के हाथों रावण का वध हुआ। इस घटना को रामायण परंपरा में अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है।रावण के विनाश को भद्रा में बांधी गई राखी से जोड़ने वाली कहानी बाद की लोकप्रिय धार्मिक मान्यताओं में दिखाई देती है। यानी यह कहना कि केवल भद्रा में राखी बांधने की वजह से रावण का वंश नष्ट हुआ, धार्मिक लोककथा है, रामायण की मूल कथा का सीधा निष्कर्ष नहीं।

शूर्पणखा कौन थी?

शूर्पणखा रामायण की प्रमुख पात्रों में से एक है और उसे रावण की बहन के रूप में जाना जाता है। रामायण की कथा में शूर्पणखा का प्रसंग उस समय आता है जब वह वन में भगवान श्रीराम और लक्ष्मण से मिलती है।इसके बाद घटनाक्रम तेजी से बदलता है और आगे चलकर माता सीता के हरण तथा राम-रावण युद्ध की भूमिका तैयार होती है। इस तरह शूर्पणखा का पात्र रामायण के मुख्य घटनाक्रम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।लेकिन शूर्पणखा द्वारा रावण को रक्षाबंधन पर राखी बांधने की कथा मुख्य रामायण प्रसंग का हिस्सा नहीं मानी जाती। यह रक्षाबंधन के भद्रा निषेध से जुड़ी लोकप्रिय मान्यता है।

भद्रा में राखी बांधने से क्यों बचते हैं?

धार्मिक मान्यता के अनुसार भद्रा को शुभ कार्यों के लिए अनुकूल समय नहीं माना जाता। रक्षाबंधन भाई की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और सुरक्षा की कामना से जुड़ा पर्व है। इसलिए इसे शुभ मुहूर्त में करने की परंपरा है।यही वजह है कि पंचांग में रक्षाबंधन का मुहूर्त तय करते समय भद्रा काल का विशेष ध्यान रखा जाता है। अगर पूर्णिमा तिथि के दौरान भद्रा मौजूद हो तो उसके समाप्त होने के बाद राखी बांधने की सलाह दी जाती है।

 

क्या 2026 में भी भद्रा का असर रहेगा?

साल 2026 में रक्षाबंधन 28 अगस्त को मनाया जाएगा। उपलब्ध पंचांग संबंधी रिपोर्टों के अनुसार इस वर्ष रक्षाबंधन के दिन भद्रा सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाएगी। इसलिए राखी बांधने के लिए भद्रा की बाधा नहीं रहने की बात कही गई है।हालांकि अलग-अलग स्थानों पर पंचांग और स्थानीय समय की गणना में अंतर हो सकता है। इसलिए शुभ मुहूर्त के लिए स्थानीय पंचांग या विद्वान ज्योतिषाचार्य की गणना देखना बेहतर माना जाता है।

क्या भद्रा काल में कोई भी काम नहीं किया जाता?

धार्मिक परंपराओं में भद्रा को मुख्य रूप से मांगलिक कार्यों के लिए अनुपयुक्त माना जाता है। लेकिन कुछ परंपराओं में भद्रा के दौरान कुछ विशेष प्रकार के कार्यों को निषिद्ध नहीं माना गया है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि भद्रा काल में हर प्रकार का काम करना पूरी तरह वर्जित है।रक्षाबंधन के संदर्भ में मुख्य बात यही है कि राखी बांधना एक शुभ धार्मिक संस्कार माना जाता है, इसलिए इसे भद्रा से मुक्त समय में करने की परंपरा है।

रावण की राखी वाली कथा का असली संदेश क्या है?

शूर्पणखा और रावण की राखी वाली कहानी को अगर धार्मिक लोकमान्यता के रूप में देखें तो इसका संदेश केवल डर पैदा करना नहीं है। इसका मुख्य उद्देश्य शुभ कार्यों के लिए सही समय चुनने की परंपरा को समझाना है।रक्षाबंधन में राखी का धागा केवल एक धागा नहीं माना जाता। यह भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और एक-दूसरे के साथ खड़े रहने का प्रतीक है। इसलिए धार्मिक मान्यताओं में इस पवित्र अवसर को शुभ समय में मनाने पर जोर दिया गया है।भद्रा काल में राखी क्यों नहीं बांधी जाती? इसका जवाब धार्मिक मान्यताओं में छिपा है। भद्रा को उग्र और मांगलिक कार्यों के लिए प्रतिकूल समय माना जाता है। इसी कारण रक्षाबंधन के दिन भी भद्रा के दौरान राखी बांधने से बचने की परंपरा है। रावण की बहन शूर्पणखा द्वारा भद्रा काल में राखी बांधने और इसके बाद रावण के विनाश की कहानी इसी मान्यता से जुड़ी लोकप्रिय लोककथा है।लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि रावण के विनाश को भद्रा में राखी बांधने का परिणाम बताना धार्मिक लोकमान्यता है, प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य नहीं। रामायण की मुख्य कथा में रावण का अंत भगवान श्रीराम के साथ युद्ध के बाद होता है।इसलिए रक्षाबंधन पर भद्रा का ध्यान रखने की परंपरा को धार्मिक विश्वास और पंचांग आधारित मान्यता के रूप में समझना चाहिए। आखिरकार इस पर्व का सबसे बड़ा संदेश यही है कि भाई-बहन का रिश्ता प्रेम, विश्वास और एक-दूसरे के प्रति सम्मान से मजबूत होता है।

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