असीम मुनीर बने पाकिस्तान के सबसे ताकतवर जनरल

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इस्लामाबाद पाकिस्तान की राजनीति और सैन्य व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर अब पाकिस्तान के चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज (CDF) की जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं। नए सैन्य कमांड ढांचे के बाद उनकी भूमिका पहले के मुकाबले काफी शक्तिशाली हो गई है। यही वजह है कि पाकिस्तान की राजनीति पर नजर रखने वाले विशेषज्ञ उन्हें देश के इतिहास के सबसे प्रभावशाली सैन्य अधिकारियों में गिन रहे हैं।असीम मुनीर के पास अब सेना प्रमुख के पद के साथ-साथ तीनों सशस्त्र सेनाओं से जुड़े शीर्ष स्तर के सैन्य समन्वय की जिम्मेदारी है। इस बदलाव को पाकिस्तान की सत्ता व्यवस्था में सेना के बढ़ते प्रभाव के तौर पर देखा जा रहा है। आलोचकों का कहना है कि पाकिस्तान में इस बार सैन्य प्रभाव बढ़ाने के लिए पारंपरिक तख्तापलट या सड़कों पर टैंक उतारने के बजाय संवैधानिक और संसदीय रास्ते का इस्तेमाल हुआ है।

नए कानून से बदला पाकिस्तान का सैन्य कमांड ढांचा

पाकिस्तान की संसद ने अगस्त 2026 में रक्षा ढांचे से जुड़े नए कानूनों को मंजूरी दी। इसके बाद राष्ट्रपति की मंजूरी से इन्हें लागू किया गया। यह बदलाव पहले किए गए संवैधानिक संशोधन के तहत सैन्य कमांड व्यवस्था में किए गए व्यापक परिवर्तन का हिस्सा बताया जा रहा है।इस व्यवस्था में चेयरमैन ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी (CJCSC) के पद को समाप्त कर चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज यानी CDF का नया पद बनाया गया। असीम मुनीर को इस नए पद की जिम्मेदारी मिलने के बाद उनकी स्थिति पाकिस्तान के सैन्य ढांचे में बेहद महत्वपूर्ण हो गई है।इस बदलाव का सबसे बड़ा असर यह है कि सेना प्रमुख और CDF की जिम्मेदारियां एक ही अधिकारी के पास हैं। इससे असीम मुनीर को पाकिस्तान की सैन्य कमान में असाधारण प्रभाव हासिल हुआ है।

असीम मुनीर बने पाकिस्तान के सबसे ताकतवर जनरल
असीम मुनीर बने पाकिस्तान के सबसे ताकतवर जनरल

तीनों सेनाओं के शीर्ष समन्वय की जिम्मेदारी

नए रक्षा ढांचे के तहत डिफेंस फोर्सेज हेडक्वार्टर को पाकिस्तान के सशस्त्र बलों का प्रमुख मुख्यालय बनाया गया है। CDF इस मुख्यालय की कमान संभालते हैं। साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा, रक्षा और सशस्त्र बलों से जुड़े मामलों में प्रधानमंत्री के प्रमुख सैन्य सलाहकार की भूमिका भी निभाते हैं।इस व्यवस्था ने असीम मुनीर को सिर्फ थल सेना तक सीमित नहीं रखा है। उनकी भूमिका अब पाकिस्तान की थल सेना, नौसेना और वायु सेना के बीच शीर्ष सैन्य समन्वय से भी जुड़ गई है।यही कारण है कि पाकिस्तान के सैन्य और राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर रखने वाले लोग इस बदलाव को बेहद महत्वपूर्ण मान रहे हैं।

2030 तक पद पर बने रहने की राह

असीम मुनीर की बढ़ी हुई ताकत सिर्फ अधिकारों तक सीमित नहीं है। नए पद के साथ उनके कार्यकाल को लेकर भी महत्वपूर्ण बदलाव हुआ है।पहले असीम मुनीर के कार्यकाल को 2027 में समाप्त होना था। लेकिन CDF के लिए निर्धारित नए कार्यकाल के कारण उनके लंबे समय तक सैन्य नेतृत्व में बने रहने का रास्ता साफ हुआ है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उनका नया पांच साल का कार्यकाल उन्हें कम से कम नवंबर 2030 तक इस प्रभावशाली पद पर बनाए रख सकता है।इसका मतलब है कि पाकिस्तान की सैन्य और सुरक्षा नीति पर आने वाले कई वर्षों तक उनका प्रभाव बना रह सकता है।

पाकिस्तान में बनाया गया नया रणनीतिक कमांड पद

पाकिस्तान के सैन्य ढांचे में एक और अहम बदलाव किया गया है। देश में नेशनल स्ट्रैटेजिक कमांडर का पद बनाया गया है। यह चार सितारा स्तर का पद है, जिसे रणनीतिक सेनाओं के ऑपरेशनल इंटीग्रेशन की जिम्मेदारी दी गई है।प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने लेफ्टिनेंट जनरल आमिर रजा को चार सितारा जनरल के पद पर पदोन्नत करने के बाद इस जिम्मेदारी के लिए नियुक्त किया है।इस नए कमांड ढांचे के जरिए पाकिस्तान की रणनीतिक सैन्य क्षमताओं को एकीकृत करने की कोशिश की जा रही है।

क्या पाकिस्तान में बढ़ रहा है सेना का दबदबा?

पाकिस्तान का राजनीतिक इतिहास सेना के मजबूत प्रभाव से जुड़ा रहा है। देश में कई बार सैन्य शासन स्थापित हुआ और अलग-अलग दौर में सेना ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।यही वजह है कि असीम मुनीर की शक्तियों में हुए विस्तार को लेकर पाकिस्तान के भीतर और बाहर बहस तेज है। आलोचक इसे नागरिक सरकार के ऊपर सैन्य प्रभाव बढ़ने के संकेत के तौर पर देखते हैं।हालांकि इस बार तस्वीर पिछले सैन्य तख्तापलट से अलग है। सत्ता परिवर्तन के लिए सीधे सैन्य कार्रवाई करने के बजाय संवैधानिक संशोधन और संसद के जरिए सैन्य कमांड ढांचे में बदलाव किया गया है।इसी संदर्भ में कुछ आलोचक इसे ‘संवैधानिक तख्तापलट’ तक कहते हैं। हालांकि यह एक राजनीतिक टिप्पणी और आलोचनात्मक व्याख्या है, न कि पाकिस्तान की सरकार द्वारा स्वीकार किया गया आधिकारिक शब्द।

‘हाइब्रिड शासन’ को लेकर बहस

पाकिस्तान की राजनीति में लंबे समय से ‘हाइब्रिड शासन’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता रहा है। इसका आशय ऐसी राजनीतिक व्यवस्था से है, जिसमें निर्वाचित सरकार मौजूद रहती है, लेकिन सैन्य प्रतिष्ठान का राजनीतिक और सुरक्षा मामलों में प्रभाव काफी मजबूत होता है।असीम मुनीर के पास सेना प्रमुख और CDF दोनों की जिम्मेदारी आने के बाद यह बहस और तेज हो गई है। आलोचकों का मानना है कि इससे पाकिस्तान की नागरिक सरकार की तुलना में सैन्य नेतृत्व की स्थिति और मजबूत हो सकती है।वहीं समर्थकों का तर्क हो सकता है कि नए कमांड ढांचे से तीनों सेनाओं के बीच बेहतर समन्वय और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े फैसलों में स्पष्टता आएगी।

असीम मुनीर के हाथ में कितनी ताकत?

नए बदलावों के बाद असीम मुनीर पाकिस्तान के सैन्य ढांचे के सबसे प्रभावशाली अधिकारियों में शामिल हो गए हैं। उनके पास सेना प्रमुख की जिम्मेदारी के साथ CDF का पद भी है। इसके अलावा लंबे कार्यकाल की संभावना उन्हें आने वाले वर्षों में पाकिस्तान की सुरक्षा और रक्षा नीति में निरंतर प्रभाव बनाए रखने का अवसर देती है।यही वजह है कि पाकिस्तान की राजनीति में इस बदलाव को केवल सैन्य नियुक्ति के रूप में नहीं देखा जा रहा। यह देश की सत्ता व्यवस्था और नागरिक-सैन्य संबंधों के भविष्य को प्रभावित करने वाला बड़ा कदम माना जा रहा है।

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