लखनऊ पुलिस को आमतौर पर कानून-व्यवस्था और सुरक्षा का सबसे अहम प्रहरी माना जाता है। लेकिन जब इसी व्यवस्था पर किसी व्यक्ति को कथित तौर पर बिना मुकदमा दर्ज किए हिरासत में रखने, पैसे की मांग करने और बाद में गंभीर धाराओं में फंसाने जैसे आरोप लगें, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। राजधानी लखनऊ के पीजीआई थाना क्षेत्र से जुड़ा एक ऐसा ही मामला सामने आया है, जिसने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।पीड़ित परिवार का आरोप है कि एक व्यक्ति को पुलिस ने अचानक हिरासत में लिया। उस समय न तो उसके खिलाफ एफआईआर की जानकारी दी गई और न ही गिरफ्तारी की स्पष्ट वजह बताई गई। इसके बाद कथित तौर पर उसके मोबाइल फोन से एक परिचित को लगातार फोन किए गए और उसे छुड़ाने के बदले बड़ी रकम की मांग की गई।मामला बाद में अदालत तक पहुंचा, जहां पीड़ित पक्ष ने पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने मामले से जुड़े महत्वपूर्ण साक्ष्य और सीसीटीवी फुटेज पेश करने के निर्देश दिए हैं। अब निगाहें इस बात पर हैं कि इन आरोपों की जांच में क्या सामने आता है।
बिना FIR हिरासत में लेने का आरोप
पीड़ित परिवार की ओर से लगाए गए आरोपों के मुताबिक, संबंधित व्यक्ति को पीजीआई थाना पुलिस ने हिरासत में लिया था। परिवार का दावा है कि उस समय उसके खिलाफ कोई एफआईआर या स्पष्ट मुकदमा दर्ज नहीं था।आरोप है कि हिरासत के दौरान पुलिसकर्मियों ने उससे जुड़े लोगों से संपर्क किया और उसे छोड़ने के लिए कथित तौर पर पैसों की मांग की गई। पीड़ित पक्ष का दावा है कि रात के समय उसके मोबाइल फोन से उसके दोस्त को कई बार फोन किया गया।बताया गया कि लगातार फोन कॉल के दौरान कथित तौर पर चार लाख रुपये लाने की मांग की गई। इतना ही नहीं, पीड़ित के दोस्त को कथित तौर पर पैसे लेकर जौनपुर पहुंचने के लिए कहा गया।हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। मामले में पुलिस का पक्ष और जांच के निष्कर्ष सामने आने के बाद ही तस्वीर पूरी तरह साफ हो सकेगी।
चार लाख के बाद दो लाख की कथित मांग
मामला यहीं नहीं रुका। पीड़ित के दोस्त और परिजनों ने स्थिति की जानकारी लेने के लिए कुछ वकीलों से संपर्क किया। वकील जब मामले की जानकारी लेने पहुंचे तो कथित तौर पर पुलिस की ओर से रकम कम किए जाने की बात सामने आई।पीड़ित पक्ष का दावा है कि पहले चार लाख रुपये की मांग की गई थी, लेकिन बाद में कथित तौर पर दो लाख रुपये देने पर धाराएं हल्की करने और राहत देने की बात कही गई।परिजनों और वकीलों ने इस कथित मांग को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद मामले ने और गंभीर रूप ले लिया।

‘भागते हुए गिरफ्तारी’ की कहानी पर सवाल
पीड़ित पक्ष ने पुलिस पर एक और गंभीर आरोप लगाया है। आरोप के मुताबिक, जब कथित वसूली की कोशिश सफल नहीं हुई तो संबंधित व्यक्ति को पुलिस वाहन से किसी सुनसान स्थान की ओर ले जाया गया।शिकायत में दावा किया गया है कि वहां उसके दोनों मोबाइल फोन उसे वापस दिए गए और कथित तौर पर उसे वहां से भागने के लिए कहा गया। पीड़ित के अनुसार, जैसे ही वह वहां से आगे बढ़ा, कुछ दूरी पर मौजूद पुलिसकर्मियों ने उसे पकड़ लिया।इसके बाद कथित तौर पर सरकारी दस्तावेजों में उसे मौके से भागते हुए गिरफ्तार किए जाने की कहानी दर्ज की गई।यही बिंदु अब पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल बन गया है। यदि घटनाक्रम वास्तव में ऐसा था जैसा पीड़ित पक्ष आरोप लगा रहा है, तो सीसीटीवी फुटेज और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य इसकी वास्तविकता सामने लाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
गंभीर धाराओं में मुकदमा और जेल भेजने का आरोप
पीड़ित परिवार का आरोप है कि इसके बाद संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कई गंभीर धाराएं लगाई गईं। साथ ही कथित बरामदगी भी दिखाई गई और कागजी कार्रवाई पूरी करने के बाद उसे अदालत में पेश कर जेल भेज दिया गया।परिजनों का दावा है कि पुलिस की कार्रवाई वास्तविक घटनाक्रम से अलग थी और व्यक्ति को जानबूझकर कानूनी शिकंजे में फंसाया गया।हालांकि किसी भी आरोप को अंतिम सत्य मानने से पहले पुलिस की जांच, अदालत में प्रस्तुत साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया के निष्कर्षों का इंतजार जरूरी है।
परिवार ने अदालत का दरवाजा खटखटाया
पुलिस की कार्रवाई से संतुष्ट नहीं होने पर पीड़ित परिवार ने अदालत का रुख किया। अदालत में पीड़ित पक्ष ने हिरासत से लेकर गिरफ्तारी और कथित पुलिस कार्रवाई तक पूरे घटनाक्रम को सामने रखा।मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने संबंधित साक्ष्यों को सुरक्षित रखने और पेश करने की दिशा में महत्वपूर्ण निर्देश दिए। पीड़ित पक्ष के मुताबिक, अदालत ने मामले से जुड़े सीसीटीवी फुटेज और अन्य जरूरी साक्ष्य उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं।अब इन साक्ष्यों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। सीसीटीवी फुटेज से यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि संबंधित व्यक्ति को कब और कहां ले जाया गया तथा गिरफ्तारी से पहले घटनाक्रम वास्तव में क्या था।
अदालत के आदेश पर भी उठे सवाल
पीड़ित परिवार का आरोप है कि अदालत के निर्देश के बावजूद मामले से जुड़े साक्ष्य और सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध कराने में देरी की जा रही है। परिवार का दावा है कि पुलिस की ओर से मामले में अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा।अगर यह आरोप सही साबित होता है तो मामला केवल पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया के दौरान साक्ष्य प्रस्तुत करने और अदालत के आदेशों के अनुपालन से जुड़े सवाल भी खड़े होंगे।हालांकि इन आरोपों पर लखनऊ पुलिस का आधिकारिक पक्ष सामने आना भी बेहद महत्वपूर्ण है। पुलिस की ओर से यदि कोई अलग घटनाक्रम या तथ्य प्रस्तुत किए जाते हैं तो वे मामले की पूरी तस्वीर समझने के लिए जरूरी होंगे।
अब सबसे बड़ा सवाल—CCTV खोलेगा राज?
इस पूरे मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि पीजीआई थाना क्षेत्र के कथित घटनाक्रम का सीसीटीवी फुटेज क्या कहता है? क्या संबंधित व्यक्ति को वास्तव में थाने से किसी दूसरे स्थान पर ले जाया गया था? क्या उसकी गिरफ्तारी उसी तरह हुई, जैसा पुलिस के रिकॉर्ड में दर्ज है? और क्या हिरासत से लेकर गिरफ्तारी तक की पूरी प्रक्रिया नियमों के मुताबिक हुई? इन सवालों के जवाब जांच और अदालत के सामने पेश होने वाले साक्ष्यों से ही मिलेंगे।फिलहाल यह मामला पुलिस की कार्यप्रणाली और हिरासत में लिए गए व्यक्ति के अधिकारों को लेकर गंभीर बहस खड़ी करता है। आरोप सही हैं या गलत, इसका फैसला जांच और न्यायिक प्रक्रिया से होगा। लेकिन एक बात साफ है—अगर पुलिस पर लगाए गए आरोपों में सच्चाई है, तो यह कानून-व्यवस्था की पूरी व्यवस्था के लिए बेहद गंभीर मामला होगा।अब देखना यह है कि अदालत के निर्देश के बाद सीसीटीवी और अन्य साक्ष्य सामने आते हैं या नहीं और उनके आधार पर इस कथित ‘भागते हुए गिरफ्तारी’ की कहानी की असली तस्वीर क्या निकलती है।
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