हिंदी के ये शब्द असल में फारसी, अरबी और पुर्तगाली से आए हैं, जानें पूरी लिस्ट

Editorial
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हिंदी दिवस हर साल 14 सितंबर को मनाया जाता है। हिंदी हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि हम बातचीत में जिन शब्दों को हिंदी का हिस्सा मानकर इस्तेमाल करते हैं, उनमें से कई शब्द दूसरी भाषाओं से आए हैं? फारसी, अरबी, पुर्तगाली, अंग्रेजी और तुर्की समेत कई भाषाओं के शब्द आज हिंदी में इतने घुल-मिल चुके हैं कि उनकी विदेशी उत्पत्ति का अंदाजा लगाना भी मुश्किल हो जाता है।हिंदी दिवस के मौके पर अक्सर हिंदी को समृद्ध बनाने वाली परंपरा और उसके विकास की चर्चा होती है। हिंदी की सबसे बड़ी खासियतों में से एक यह है कि इस भाषा ने समय के साथ अलग-अलग भाषाओं से शब्दों को अपनाया और उन्हें अपने दैनिक इस्तेमाल का हिस्सा बना लिया।आज हम जिस हिंदी को बोलते और लिखते हैं, वह केवल संस्कृत या किसी एक स्रोत से बने शब्दों तक सीमित नहीं है। भारत के लंबे सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संपर्कों ने हिंदी के शब्द भंडार को काफी व्यापक बनाया है।यही कारण है कि हमारी रोजमर्रा की बातचीत में बाजार, कमरा, दोस्त, किताब, जवाब, चाबी, तौलिया, टिकट, ट्रेन और डॉक्टर जैसे शब्द सहज रूप से इस्तेमाल होते हैं। इनमें से कई शब्दों की जड़ें हिंदी के बाहर की भाषाओं से जुड़ी मानी जाती हैं।

फारसी के कई शब्द बन गए हिंदी का हिस्सा

भारतीय उपमहाद्वीप में फारसी का प्रभाव लंबे समय तक रहा। प्रशासन, साहित्य और दरबारी कामकाज में फारसी के इस्तेमाल के कारण इसके अनेक शब्द भारतीय भाषाओं में पहुंचे। बाद में इनमें से बहुत से शब्द हिंदी की बोलचाल का स्वाभाविक हिस्सा बन गए।आज दोस्त, नौजवान, आवारा, सुस्त, होशियार, नाराज, बाजार, कमरा, किनारा, दीवार, जादू, जहर, आमदनी, गिरफ्तार, मुफ्त, ईमानदार, हफ्ता और हरदम जैसे शब्द रोजमर्रा की बातचीत में सुनाई देते हैं।इनमें से कई शब्द इतने सामान्य हो चुके हैं कि बोलने वाला यह सोचता भी नहीं कि उनका मूल किसी दूसरी भाषा से जुड़ा हो सकता है।उदाहरण के लिए, जब कोई कहता है कि वह बाजार जा रहा है या उसका कोई दोस्त मिलने आया है, तो इन शब्दों को आम तौर पर हिंदी का ही हिस्सा समझा जाता है। भाषा में किसी शब्द के लंबे समय तक इस्तेमाल से वह स्थानीय भाषाई संस्कृति का हिस्सा बन जाता है।

हिंदी के ये शब्द असल में फारसी, अरबी और पुर्तगाली से आए हैं
हिंदी के ये शब्द असल में फारसी, अरबी और पुर्तगाली से आए हैं

अरबी भाषा का भी हिंदी पर गहरा असर

हिंदी के शब्द भंडार पर अरबी का प्रभाव भी महत्वपूर्ण रहा है। खासतौर पर फारसी के माध्यम से अरबी मूल के कई शब्द भारतीय भाषाओं तक पहुंचे और बाद में बोलचाल में इस्तेमाल होने लगे।किताब, जवाब, तारीख, अखबार, तमीज, अजीब और आदत जैसे शब्द रोजमर्रा की हिंदी में आम हैं।इन शब्दों को बोलते समय आम तौर पर यह ध्यान नहीं रहता कि इनके पीछे किसी दूसरी भाषा का इतिहास मौजूद है। यही भाषाओं के आपसी मेल की खूबसूरती है।भारत में सदियों से अलग-अलग समुदायों और संस्कृतियों के बीच संपर्क रहा है। इसका असर खानपान, पहनावे, संगीत और वास्तुकला के साथ-साथ भाषा पर भी पड़ा। हिंदी इसका एक बड़ा उदाहरण है।

पुर्तगाली भाषा ने भी छोड़ी अपनी छाप

भारत में यूरोपीय शक्तियों के आगमन के बाद पुर्तगाली भाषा के कई शब्द स्थानीय भाषाओं में पहुंचे। इनमें से कुछ शब्द समय के साथ हिंदी की बोलचाल में भी इस्तेमाल होने लगे।चाबी, तौलिया, मेज, बरामदा, अलमारी, अनानास, तंबाकू, बाल्टी और फीता जैसे शब्दों को आज बोलचाल की भाषा में इस्तेमाल करना बिल्कुल सामान्य है।सोचिए, जब हम कहते हैं कि चाबी मेज पर रखी है या बाल्टी में पानी भर दो, तो शायद ही कोई यह सोचता है कि इन शब्दों की भाषाई यात्रा कितनी लंबी रही होगी।यही वजह है कि किसी भाषा के शब्दों को केवल उनके वर्तमान इस्तेमाल के आधार पर पहचानना मुश्किल होता है। कई शब्द इतने पुराने और प्रचलित हो जाते हैं कि उनका मूल स्रोत हमारी स्मृति से पूरी तरह गायब हो जाता है।

अंग्रेजी के शब्दों के बिना आज की बोलचाल अधूरी?

आधुनिक समय में अंग्रेजी का प्रभाव हिंदी पर बेहद स्पष्ट दिखाई देता है। शिक्षा, तकनीक, व्यापार, परिवहन, चिकित्सा और मनोरंजन के क्षेत्र में अंग्रेजी से आए हजारों शब्द रोजमर्रा की हिंदी में इस्तेमाल होते हैं।नंबर, बस, क्रिकेट, टिकट, ट्रेन, स्टेशन, पास, फेल, डॉक्टर, इंजीनियर, अफसर, टाइम, बैटरी, लाइट, साइकिल, बिल और पोस्टर जैसे शब्द सामान्य बातचीत का हिस्सा बन चुके हैं।आज कोई व्यक्ति कहता है—ट्रेन कितने बजे है?, डॉक्टर से मिलना है, बिल जमा कर दिया, या बस आने वाली है—तो इन वाक्यों में अंग्रेजी मूल के शब्द सहज रूप से शामिल होते हैं।हालांकि आधुनिक हिंदी में अंग्रेजी शब्दों के इस्तेमाल को केवल विदेशी प्रभाव के रूप में देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता। तकनीक और वैश्विक संपर्क के कारण दुनिया की लगभग सभी प्रमुख भाषाएं एक-दूसरे से शब्द लेती हैं।

तुर्की और दूसरी भाषाओं के शब्द भी सुनाई देते हैं

भारतीय उपमहाद्वीप के ऐतिहासिक संपर्कों के कारण तुर्की और मध्य एशियाई भाषाओं से जुड़े कुछ शब्द भी भारतीय भाषाओं में पहुंचे। हालांकि किसी शब्द का वास्तविक स्रोत निर्धारित करना कई बार जटिल होता है, क्योंकि एक ही शब्द अलग-अलग भाषाओं के माध्यम से दूसरी भाषा में पहुंच सकता है।कालीन, तोप आदि शब्दों को अक्सर तुर्की या उससे जुड़े भाषाई प्रभावों के संदर्भ में बताया जाता है। वहीं फकीर और जालिम जैसे शब्दों की जड़ें अरबी से जुड़ी मानी जाती हैं। इसलिए किसी शब्द को केवल सुनने या प्रचलित सूची के आधार पर किसी एक भाषा का कहना हमेशा सही नहीं होता।भाषाविज्ञान में शब्दों की उत्पत्ति को समझने के लिए उनके ऐतिहासिक इस्तेमाल और दूसरी भाषाओं के साथ उनके संबंधों का अध्ययन किया जाता है।

क्या दूसरी भाषाओं के शब्द हिंदी को कमजोर करते हैं?

यह सवाल अक्सर हिंदी दिवस के आसपास चर्चा में आता है। लेकिन भाषा का विकास सामान्यतः शब्दों को स्वीकार करने और बदलने की प्रक्रिया से होता है।हिंदी ने संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं के साथ-साथ फारसी, अरबी, तुर्की, पुर्तगाली और अंग्रेजी जैसी भाषाओं से भी शब्द ग्रहण किए हैं।इसका अर्थ यह नहीं कि हिंदी अपनी पहचान खो रही है। बल्कि यह हिंदी की अनुकूलन क्षमता को दिखाता है।भाषा कोई स्थिर वस्तु नहीं होती। समाज बदलता है तो भाषा भी बदलती है। नई तकनीक आती है तो नए शब्द आते हैं। अलग-अलग समुदायों के बीच संपर्क बढ़ता है तो शब्दों का आदान-प्रदान भी होता है।

हिंदी की असली ताकत उसकी विविधता है

हिंदी दिवस के अवसर पर हिंदी को समझने का एक दिलचस्प तरीका यह भी है कि हम अपनी रोजमर्रा की भाषा पर थोड़ा ध्यान दें।हम सुबह अखबार पढ़ते हैं, चाय पीते हैं, बाजार जाते हैं, किसी दोस्त को फोन करते हैं, टिकट लेते हैं, ट्रेन पकड़ते हैं और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से मिलते हैं। हमारे एक ही दिन की बातचीत में अलग-अलग भाषाओं की विरासत से आए शब्द शामिल हो सकते हैं।यही हिंदी की खूबसूरती है।हिंदी केवल शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि सदियों से बने सामाजिक और सांस्कृतिक मेल का परिणाम है। अलग-अलग भाषाओं से आए शब्दों ने इसे अधिक व्यापक और जनसामान्य के करीब बनाया है।इसलिए हिंदी दिवस पर हिंदी को समृद्ध बनाने वाली इस विविधता को समझना भी जरूरी है। हमारी जुबान पर मौजूद हर शब्द के पीछे एक इतिहास हो सकता है—किसी शब्द की यात्रा संस्कृत से शुरू हुई होगी, कोई फारसी या अरबी से आया होगा, तो कोई पुर्तगाली या अंग्रेजी के रास्ते हिंदी में पहुंचा होगा।यही शब्दों की यात्रा हिंदी को जीवंत बनाती है और बताती है कि भाषा दीवार नहीं, बल्कि अलग-अलग संस्कृतियों को जोड़ने वाला पुल है।

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